हमें सिस्टम बदलने न आएगा जब तक हम सब आवाज नहीं उठाएंगे

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”मुझे याद है कि कॉलेज के वक्त हस्तमैथुन जैसा शब्द तो हम मां-बाप के सामने बोल ही नहीं सकते थे। बहुत बोले तो कहा कि बद्तमीजी करता है, हम सबको देख के। सही पूछो तो लड़कियों को इस कदर दबाकर रखने के क्रम में ही ये बदतमीज लड़के हद दर्जे तक आगे निकलते गए ”

बीएचयू की लड़कियों ने जो किया, देश भर के कॉलेजों की लड़कियों को इसमें सामने आकर बड़ा आंदोलन करना चाहिए। औरतों को डर का दामन छोड़ना चाहिए। उत्तर भारत मे तो हम लड़कियां इतना डरा-डराकर पाली गई हैं कि डर हमारे दिमाग में कहीं जम गया है। रात में आफिस से लौटते आज भी कभी कोई बाइक बगल से सटाकर निकल जाये, तो अजीब सी डर वाली सिहरन दौड़ जाती है। हमारी परवरिश ही ऐसे हुई है।

हम बच्चों से सेक्स एजुकेशन के नाम पर बताया जाता है कि चुपचाप नीचे देखके चलो तो कोई नहीं छेड़ेगा। हंस-हंसकर बातें करते हुए काहे चलती हो। दुपट्टा ठीक से डालकर जाओ, कोई नही देखता। ज्यादा बाल कटाने की क्या जरूरत है। अंधेरा हो तो बाहर ही मत निकलो। लड़कों से दोस्ती करोगी तो यही होगा। लड़कीअच्छी हो तो कोई नही छेड़ता। फिर भी कोई बदतमीजी करे तो हमें बताना। और फिर कभी अगर लड़की गलती से घर पर छेड़छाड़ के बारे में बता दे तो कहा जाता है, अब तुम घर बैठो, कहीं वो लफंगा आगे बढ़ गया तो….
खबरों के अनुसार बीएचयू की लड़कियो ने छेड़छाड़ की शिकायत करके सुरक्षा ही तो मांगी थी। उनके हॉस्टल के बाहर लड़कियों को देखते ही लडको द्वारा हस्तमैथुन करने लगने की शिकायत की थी। यू पी की कितनी ही लड़कियों ने इस स्तर की वाहियात हरकतों को देखा होगा लेकिन कभी न कहती हैं, न कह पाती हैं।

 

मुझे याद है कि कॉलेज के वक्त हस्तमैथुन जैसा शब्द तो हम मां-बाप के सामने बोल ही नहीं सकते थे। बहुत बोले तो कहा कि बद्तमीजी करता है, हम सबको देख के। सही पूछो तो लड़कियों को इस कदर दबाकर रखने के क्रम में ही ये बदतमीज लड़के हद दर्जे तक आगे निकलते गए। आज हालत यह है कि जिसे चाहा सड़क पर डरा दिया। कभी आँख मार दी। कभी गन्दा इशारा कर दिया। पास से गुजरे तो लड़की को यहां वहां छू लिया। कभी टांग पर नोच लिया। बस पर चढ़े तो गन्दी तरह सटकर खड़े हो गए।

विरोध पर कभी तेजाब का डर दिखाया, कभी रेप की धमकी दी। लड़कियों का जीना मुश्किल कर रखा है। घर से निकलना, पढ़ना, नौकरी करना मुहाल है। इनकी हवस इस कदर बढ़ी है कि अब तो ये कमजोर लड़कों, छोटे बच्चों को भी नहीं छोड़ रहे। यह सब जो भी हो रहा है, यह जवान होती, पढ़-लिख रही, हौसलामंद लड़कियों को डराकर और खूब दबाकर रखने का नतीजा है। मुझे यकीन है कि अगर लड़कियां आक्रामक रुख अपना लें तो बहुत कुछ बदल जाएगा। अपने पिता, ससुर, भाई, भाभी, देवर, जेठ, सास, नन्द, मां, पड़ोसी, रिश्तेदार…. इन सबसे डरना छोड़कर बोलना सीख लें तो बहुत कुछ बदलेगा।

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छेड़खानी या रेप हो तो एकसाथ एकजुट होकर दोषी के खिलाफ लडने के लिए सामने आएं। छोटी मोटी बात समझकर छेड़छाड़ को इग्नोर नही करना है। हम एक साथ चीखें, चिल्लाएं, छेड़छाड़, रेप करने वालो की फोटोज उसके मुहल्ले में चिपकाएँ। रेप को लड़की की इज्जत के बजाय इसे रेपिस्ट की इज्जत से जोड़ने से काम बनेगा। वैसे भी कोई हम लोग के लिए सिस्टम बदलने न आएगा जब तक हम सब आवाज नही उठाएंगे।

एम एम, दिल्ली