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    बिहार चुनाव: मोदी-शाह की जोड़ी की साख और रणनीति की अग्निपरीक्षा

    बिहार में जातिगत जनगणना, विकास योजनाएं और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को बीजेपी जोर-शोर से उठाएगी
    ShagunBy ShagunOctober 5, 2025 राजनीति No Comments6 Mins Read
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    बिहार चुनाव: मोदी-शाह की जोड़ी की साख और रणनीति की अग्निपरीक्षा
    बिहार चुनाव: मोदी-शाह की जोड़ी की साख और रणनीति की अग्निपरीक्षा
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    उपेंद्र राय

    बिहार का विधानसभा चुनाव नजदीक है। यह महज एक राज्य का चुनाव नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की साख का लिटमस टेस्ट है। घरेलू चुनौतियों और विपक्ष की घेराबंदी के बीच बीजेपी की रणनीति और मोदी का करिश्मा कितना रंग लाता है, यह देखना रोमांचक होगा। ऑपरेशन सिंदूर की सफलता और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती ताकत ने दुनिया को हैरान किया है, लेकिन क्या बिहार के मतदाता भी मोदी के जादू में बंधेंगे? यह सब कैसे होगा आज जानेंगे इस लेख में –

    बिहार में जातिगत जनगणना, विकास योजनाएं और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को बीजेपी जोर-शोर से उठाएगी

    बिहार का विधानसभा चुनाव नजदीक है, और यह महज एक राज्य का चुनाव नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की साख और रणनीतिक कौशल की कसौटी है। यह चुनाव बीजेपी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, क्योंकि इसके परिणाम न केवल बिहार की सियासत, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी गहरा प्रभाव डालेंगे। घरेलू मोर्चे पर आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों, विपक्ष की आक्रामक रणनीति और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती ताकत के बीच यह देखना रोमांचक होगा कि बीजेपी बिहार के मतदाताओं का विश्वास कैसे जीतती है। ऑपरेशन सिंदूर की शानदार सफलता और अमेरिका जैसे देशों के दबाव का सामना करने की सरकार की दृढ़ता ने वैश्विक समुदाय को भारत की ओर गर्व और आश्चर्य से देखने को मजबूर किया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या मोदी का जादुई करिश्मा और शाह की संगठनात्मक ताकत बिहार में भी उसी तरह चमकेगी?

    बिहार चुनाव: मोदी-शाह की जोड़ी की साख और रणनीति की अग्निपरीक्षा
    बिहार चुनाव: मोदी-शाह की जोड़ी की साख और रणनीति की अग्निपरीक्षा

    2014 से शुरू हुआ ‘मोदी युग’ आज भी बीजेपी की धुरी बना हुआ है। यह दौर केवल इसलिए नहीं खास है कि बीजेपी केंद्र में सत्तारूढ़ है, बल्कि इसलिए भी कि विश्व मंच पर भारत अब ‘मोदी के भारत’ के रूप में जाना जाता है। आज विश्व के कोने-कोने में भारत की पहचान प्रधानमंत्री मोदी की छवि के साथ जुड़ चुकी है। यह कोई जादूगरी नहीं, बल्कि कड़ी मेहनत, सक्षम और समर्पित टीम का गठन, और ठोस रणनीतिक नियोजन का परिणाम है। 75 वर्ष की उम्र में भी मोदी का जोश, उनकी कार्यशैली और संगठन के प्रति समर्पण बेजोड़ है।

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और संगठन उनकी राजनीतिक यात्रा की नींव रहे हैं। जब भी बीजेपी ने उन्हें कोई जिम्मेदारी सौंपी, उन्होंने अपनी रणनीतिक समझ और विश्वास जगाने की कला से उसे सफलता में बदला। मोदी का राजनीतिक कौशल सिर्फ बड़े मंचों तक सीमित नहीं है। उनकी खासियत यह है कि वे छोटे से छोटे कार्यकर्ता में भी नेतृत्व का भाव जगा देते हैं। दूसरी ओर, अमित शाह की संगठनात्मक क्षमता और कमजोरियों को पहचानकर उन्हें दूर करने की कला ने बीजेपी को हर चुनौती में विजयी बनाया। मोदी और शाह की जोड़ी का पहला बड़ा प्रयोग 1985-90 के बीच गुजरात में हुआ, जब बीजेपी वहां तीसरे नंबर की पार्टी थी। 1987 में गुजरात में भीषण सूखा पड़ा। उस समय कांग्रेस की सरकार थी, और जनता त्राहिमाम कर रही थी। तब बीजेपी के गुजरात महासचिव के रूप में नरेंद्र मोदी ने पूरे राज्य का दौरा किया।

    बिहार चुनाव: मोदी-शाह की जोड़ी की साख और रणनीति की अग्निपरीक्षा
    बिहार चुनाव: मोदी-शाह की जोड़ी की साख और रणनीति की अग्निपरीक्षा

    उन्होंने कांग्रेस सरकार की नाकामियों को उजागर करते हुए ‘न्याय यात्रा’ निकाली, जिसमें अमित शाह उनके सहयोगी बने। इस यात्रा ने न केवल जनता का ध्यान खींचा, बल्कि कार्यकर्ताओं में एकजुटता और नेतृत्व का भाव भी जगाया। शाह इस बात से बेहद प्रभावित हुए कि मोदी ने कैसे छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं को भी बड़े लक्ष्य के लिए प्रेरित किया। इस एकजुटता का नतीजा 1995 के गुजरात विधानसभा चुनाव में दिखा, जब बीजेपी ने पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल कर सरकार बनाई। यहीं से मोदी की रणनीतिक समझ और शाह की संगठनात्मक ताकत का लोहा माना जाने लगा। इस जोड़ी ने बार-बार साबित किया कि वे चुनौतियों को अवसर में बदल सकते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश इसका जीता-जागता उदाहरण है। उस समय शाह यूपी के प्रभारी थे।

    उन्होंने ‘गुजरात मॉडल’ को घर-घर पहुंचाया और मोदी के 12 साल के शासन की उपलब्धियों को जनता के सामने रखा। नतीजा? बीजेपी ने यूपी की 80 में से 71 लोकसभा सीटें जीतीं। इस माहौल का असर 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी दिखा, और बीजेपी ने प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई।बिहार में भी मोदी-शाह की जोड़ी के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। हालांकि, धरातल पर अभी सत्ता विरोधी लहर नहीं दिख रही, लेकिन विपक्ष एनडीए को घेरने की हरसंभव कोशिश कर रहा है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद और कांग्रेस गठबंधन बिहार में बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को लेकर सरकार पर हमलावर है। दूसरी ओर, बीजेपी अपनी उपलब्धियों, जैसे ऑपरेशन सिंदूर और वैश्विक मंच पर भारत की मजबूत स्थिति, को भुनाने की तैयारी में है।

    शाह ने बिहार के लिए मुद्दे और नारे तय कर लिए हैं। जातिगत जनगणना, विकास योजनाएं और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को बीजेपी जोर-शोर से उठाएगी। मोदी बिहार के लिए विकास का खजाना खोल रहे हैं। हाल ही में केंद्र सरकार ने बिहार के लिए कई बड़ी परियोजनाओं की घोषणा की है, जिनमें सड़क, रेल और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं। दूसरी ओर, शाह संगठन को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। उनकी रणनीति हमेशा से कमजोरियों को पहचानकर उन्हें दूर करने की रही है। गुजरात में उनकी नींव ने बीजेपी को दो दशकों तक सत्ता में रखा। यूपी में भी उन्होंने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया। बिहार में भी शाह की टीम हर गठबंधन सहयोगी के साथ समन्वय बनाकर काम कर रही है।

    लोकसभा चुनाव में उम्मीद से कम सीटों के बाद कुछ आलोचकों ने ‘मोदी युग’ के ढलान की बात कही थी, लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों ने इसे गलत साबित किया। अब बिहार में सवाल यह है कि क्या यह जोड़ी हरियाणा जैसा जादू दोहरा पाएगी? बीजेपी की रणनीति साफ है। मोदी का करिश्मा, शाह की रणनीति और संगठन की ताकत। बिहार के मतदाता विकास और राष्ट्रीय गौरव के मुद्दों पर कितना भरोसा जताते हैं, यह नतीजे बताएंगे। लेकिन इतना तय है कि मोदी और शाह की जोड़ी इस चुनौती से सीधे टकराने को तैयार है।

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