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    Home»राजनीति

    बिहार की सियासी उथल-पुथल और यूपी पर मंडराता असर

    ShagunBy ShagunNovember 2, 2025 राजनीति No Comments3 Mins Read
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    राजनीति की मौजूदा लहरें कई गहरे संकेत दे रही हैं, चाहे बात असम की हो, बिहार की, पश्चिम बंगाल की या दक्षिण भारत की। सामाजिक समीकरणों का महीन विश्लेषण करते हुए आमजन की वैचारिक सोच को अपने हित साधने के लिए जिस तरह मोड़ा जा रहा है, उसका संदेश बिलकुल साफ है कि सत्ता की होड़ में हांफते दल और उनके नेता किसी भी तरह नतीजों को अपने पक्ष में करने की जुगत में जुटे हैं। चुनावी परिणाम चाहे जो आएं, उत्तर प्रदेश की सियासत पर इसका सीधा असर पड़ना तय है। अभी बिहार चुनाव में यह जोरदार आजमाइश चल रही है और इसके नतीजे दूरगामी संदेश लेकर आएंगे, चाहे सत्ताधारी दल हो या विपक्ष, उत्तर प्रदेश इससे अछूता नहीं रहेगा। स्पष्ट है कि बिहार के परिणाम यूपी की राजनीति को गहराई से प्रभावित करेंगे और यहां के समीकरणों को नई शक्ल दे सकते हैं। हालात की नब्ज टटोलते हुए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश के कई दिग्गजों को बिहार भेजा है ताकि नतीजे अपने हक में साधे जा सकें, जिसमें संगठन के पदाधिकारी से लेकर राज्य सरकार के बड़े चेहरे शामिल हैं। हालांकि बिहार और यूपी की राजनीति व मतदाता का मिजाज काफी अलग है, लेकिन नेताओं की साख दांव पर होने से माहौल में बदलाव की गुंजाइश को खारिज नहीं किया जा सकता।

    पश्चिम बंगाल के चुनावों से इसके संकेत पहले ही मिल चुके हैं और लोकसभा चुनाव में भी यह प्रभाव दिखा था। अगर बिहार में विपक्ष का पलड़ा भारी पड़ा या कांग्रेस को बढ़त मिली, तो यूपी के नतीजों पर असर पड़ना स्वाभाविक है। शायद यही कारण है कि कांग्रेस सीमावर्ती इलाकों में अपनी जड़ें मजबूत करने की कोशिशों में जुटी है। पिछले कुछ दिनों से अचानक सक्रिय हुई बसपा भी सीटों की दौड़ में लग गई है, जबकि सपा बिहार में खासा सक्रिय होकर जमीनी स्तर पर अपने कोर वोटरों के बल पर चुनावी मैदान में जगह बनाने की तैयारी कर रही है। आगामी 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में होने वाले मतदान से बिहार का सियासी पारा चरम पर है। यूपी-बिहार सीमा का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश के जातीय समीकरणों से प्रभावित रहता है, लिहाजा महागठबंधन सपा के प्रमुख चेहरों का सहारा लेकर यादव और अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में पकड़ बनाने की रणनीति अपनाए हुए है। एक ओर जहां यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं, वहीं महागठबंधन सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव जैसे नेताओं के जरिए अल्पसंख्यक व पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को लुभाने में जुटा है।

    सच्चाई यह है कि यूपी से सटे बिहार के सात जिलों में कुल 17 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां जोरदार मुकाबला चल रहा है। पिछले चुनाव में भाजपा इनमें से पांच पर पहले स्थान पर थी। इन सीमावर्ती सीटों का असर इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि वहां भाषा, संस्कृति और राजनीतिक मुद्दे लगभग एक जैसे हैं। अनुमान है कि बिहार चुनाव का प्रभाव यूपी के पूर्वांचल जिलों जैसे कुशीनगर, देवरिया, बलिया, गाजीपुर, सोनभद्र, चंदौली और महराजगंज पर सबसे ज्यादा पड़ेगा। सियासी पंडित और विभिन्न दलों के दिग्गज अपने-अपने समीकरण गिना कर नतीजों के दावे ठोंक रहे हैं। परिवर्तन की परंपरा बिहार चुनाव के बाद कायम रहती है या नहीं, यह वक्त ही बताएगा। यूपी सरकार के प्रमुख नेताओं और योगी फैक्टर को बिहार में मतदाताओं के पक्ष में करने की कोशिशें जारी हैं, ताकि कहीं यह कमजोर न पड़ जाएं, हालांकि मौजूदा रुझान ऐसा संकेत नहीं दे रहे, लेकिन ऊंट की करवट किस ओर होगी, यह किसी को नहीं पता।

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