प्रस्तुति : नीतू सिंह
बिहार की धरती हमेशा से शूरवीरों की जननी रही है। यहां की मिट्टी ने न सिर्फ क्रांतिकारियों को जन्म दिया, बल्कि ऐसे कर्मयोगियों को भी, जो पहाड़ों से लड़कर इतिहास रच देते हैं। दशरथ मांझी ने पत्नी की याद में पहाड़ चीरकर रास्ता बनाया, तो अब गया जिले का 71 वर्षीय लौंगी भुइयां (जिन्हें लोग लौंगी मांझी भी कहते हैं) ने अकेले 30 साल की मेहनत से 3 किलोमीटर लंबी नहर खोदकर साबित कर दिया कि हौसला हो तो असंभव भी संभव हो जाता है।

कोठीलवा गांव (लुतुआ पंचायत, बैंकेबाजार प्रखंड, गया) में पानी की भारी किल्लत थी। बारिश का पानी पहाड़ों से बहकर बर्बाद हो जाता, खेत सूखे पड़े रहते और युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर जाते। लौंगी भुइयां ने ये सब देखा और फैसला किया कि “अगर दशरथ मांझी कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं?” उन्होंने खुद नक्शा बनाया, कुदाल, चप्पल और दउरी थाम ली और जंगल में मवेशियों को चराते-चराते नहर खोदने लगे। दिन में जब भी समय मिलता, वो पहाड़ी पर चले जाते। कोई साथी नहीं, कोई सरकारी मदद नहीं और सिर्फ़ अकेली लगन और अटूट विश्वास।
घर की ‘पागलपंथी’ की कहानी
लौंगी की पत्नी रामरती देवी शुरू में इनकी इस ‘दीवानगी’ से बहुत नाराज थीं। वो कहती थीं, “पागल हो गए हो क्या? घर-परिवार का क्या? बच्चों का पेट कैसे भरेगा?” कई बार उन्होंने खाना तक बंद कर दिया था, ताकि लौंगी काम छोड़ दें। लेकिन लौंगी ने हार नहीं मानी। वो कहते हैं, “मैं जंगल जाता, मवेशी चराता और खोदता रहता। भूखा रहकर भी काम करता। क्योंकि गांव के लिए पानी लाना मेरी मजबूरी बन गया था।” पत्नी की मृत्यु के बाद भी उन्होंने रुकना नहीं सीखा।
गांव वालों का ताना-मज़ाक से सलाम तक का सफर
शुरुआती दिनों में गांव वाले उन्हें देखकर हंसते और कहते, “ये पागल हो गया है, पहाड़ खोदने चला है!” कोई मदद को आगे नहीं आया। 30 साल तक अकेले उन्होंने चट्टानें तोड़ीं, मिट्टी हटाई और नहर बनाई। लेकिन जब नहर पूरी हुई और पहाड़ी का पानी खेतों तक पहुंचने लगा, तो वही लोग अब कहते हैं कि “लौंगी ने कई गांवों की किस्मत बदल दी। सरकार को इनके लिए पेंशन और आवास योजना का फायदा देना चाहिए।” आज वो नहर सब्जी, धान और गेहूं की खेती को हरा-भरा रख रही है।
71 साल की उम्र में भी रुकने का नाम नहीं!
नहर पूरी करने के बाद लौंगी रुके नहीं। अब वो खजरहा जंगल में दो नए तालाब खोद रहे हैं जो लगभग 100 फीट चौड़े और 12 फीट गहरे। मकसद? कई गांवों तक पानी पहुंचाना और मछली पालन शुरू करना। सुबह आंख खुलते ही कुदाल उठाकर निकल पड़ते हैं। वो कहते हैं, “मेरा मकसद सिर्फ अपने गांव तक सीमित नहीं। कई गांवों को पानी चाहिए। मैं यहीं रहूंगा, यहीं मरूंगा।”
बता दें कि लौंगी महादलित समुदाय से हैं, पढ़े-लिखे नहीं, लेकिन उनके जज्बे ने पूरे बिहार को प्रेरित किया। मीडिया में ‘कैनाल मैन’ और ‘दूसरा दशरथ मांझी’ कहकर उनकी तारीफ हो रही है। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी समेत कई नेता उनके गांव पहुंच चुके हैं। लेकिन लौंगी अभी भी साधारण झोपड़ी में रहते हैं। उनकी मांग साफ है कि सरकार उन्हें सम्मान और आर्थिक मदद दे, ताकि बुढ़ापे में संघर्ष न करना पड़े।
बिहार की असली शान हैं लौंगी भुइयां
लौंगी भुइयां सिर्फ नहर नहीं, उम्मीद की नहर खोद रहे हैं। ऐसे लोग बिहार की असली शान हैं, जो बिना सरकारी सहायता के समाज की सेवा करते हैं। सरकार को न सिर्फ पेंशन और आवास देना चाहिए, बल्कि उन्हें ‘जल पुरुष’ या ‘कर्मयोगी सम्मान’ जैसे पुरस्कार देकर प्रेरणा का प्रतीक बनाना चाहिए। क्योंकि जब एक 71 साल का बुजुर्ग पहाड़ चीर सकता है, तो हम सबको लगता है कि कुछ भी असंभव नहीं!
लौंगी भुइयां की कहानी बताती है कि सच्ची मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। आप क्या सोचते हैं? कमेंट में जरूर बताएं कि क्या सरकार को अब इन महानुभावों का ध्यान रखना चाहिए?






