जीत के दावे तो सभी दल कर रहे हैं लेकिन इस बार भाजपा ने महागठबंधन को निपटाने के लिए बड़ी करारी रणनीति बनाई हैं जिसमें वह धोबी पाट पछाड़ लगाकर उसे धराशायी कर देगी! अब देखना यह है कि महागठबंधन इस दांव से बचने के लिए कौन सा पैंतरा इस्तेमाल करता है।
बता दें कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश में आगामी लोकसभा चुनाव में अपनी जीत दोहराने के लिए 51 प्रतिशत वोट हासिल करने का लक्ष्य रखा है। साथ ही सूबे में सपा-बसपा गठबंधन से निपटने के लिए भाजपा ने अपने कार्यकताओं को रणनीति के तहत काम करने का दिशा निर्देश दिया है।
कांग्रेस ने भी इस बार प्रियंका कार्ड खेलकर अपने मंसूबे जता दिए हैं। ऐसे में यह चुनावी संग्राम इस बार दिलचस्प हो सकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपना दल को साथ लेकर चुनाव लड़ा, तो कामयाबी की ऐतिहासिक इबारत लिख डाली। कांग्रेस, सपा, बसपा सभी को पटकनी देते हुए भाजपा ने 73 लोकसभा सीटों पर परचम फहराया था।
पार्टी नेता नरेन्द्र मोदी बनारस से चुनाव लड़कर पहली बार लोकसभा पहुंचे और प्रधानमंत्री बने। इसी चुनाव में बसपा शून्य पर आउट हो गई थी। कांग्रेस की झोली में भी मात्र दो सीटें ही आई, जबकि उस समय सूबे की सत्ता संभाले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव, पिता मुलायम सिंह यादव, दो चचेरे भाई अक्षय यादव व धम्रेन्द्र यादव को मिलाकर कुल पांच सीटें ही जीत पाए थे।

नेताजी (मुलायम सिंह यादव) आगमगढ़ व मैनपुरी दो जगहों से जीते थे। भाजपा ने 2014 की जीत की लय को 2017 में भी बरकरार रखा। इस बार दो सहयोगी दलों -अपना दल व सपा- को लेकर 403 विस में 335 सीटों को जीतने में कामयाब रही। यहां समझना होगा कि उत्तर प्रदेश में तब अखिलेश यादव की सरकार थी। इस बार जब लोकसभा का चुनाव है, तो केन्द्र में नरेन्द्र मोदी व यूपी में योगी आदित्यनाथ की सरकार है। भाजपा के दोनों सहयोगी दल सीटों को लेकर आंख दिखा रहे हैं, खासतौर पर सुभासपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर। वे सरकार में रहकर विपक्षी नेता की कमी को दूर कर रहे हैं।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 2014 के लोकसभा चुनाव के यूपी के प्रभारी थे और बूथ अध्यक्षों तक सीधे संवाद कर संगठन को दुरुस्त किया था। तब प्रदेश अध्यक्ष के पद पर डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी थे, तो इस बार डॉ. महेन्द्रनाथ पांडेय यूपी भाजपा की कमान संभाल रहे हैं।
2019 के चुनाव के पहले जब सपा-बसपा ने हाथ मिलाया, तभी गठबंधन की चुनौती से निपटने के लिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने 51 प्रतिशत वोट का टारगेट दिया। शाह ने इस बार अपने खास जेपी नड्डा को प्रभारी बनाकर मैदान में उतारा है। यूपी में भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 42 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, लेकिन इस बार सूरत बदली हुई है। तब यूपी में ज्यादातर सीटों पर त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय चुनाव हुए थे। इसमें भाजपा मुस्लिम बहुल रामपुर, मुरादाबाद व संभल सरीखी सीटें जीतने में कामयाब रही थी।
सूबे में जीत के घोड़े पर सवार भाजपा को लोकसभा के ही उप चुनावों में झटका लगा, जब गोरखपुर व फूलपुर दोनों सीटें पार्टी के हाथ से निकल गई। ये दोनों सीटें सीएम योगी व डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफा देने से खाली हुई थीं। इसके बाद कैराना लोकसभा सीट के उप चुनाव में भी भाजपा गच्चा खा गई।जािहर है सपा, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल के साथ आने से प्रदेश के चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। इसके मद्देनजर भाजपा अपनी रणनीति तैयार कर ही रही थी कि इसी दौरान कांग्रेस के ‘‘प्रियंका गांधी’ कार्ड ने राजनीतिक तपिश को और बढ़ा दिया है।
भाजपा के रणनीतिकार भी सूबे की राजनीतिक तस्वीर से भलीभांति वाकिफ हैं। ऐसे में केन्द्र व राज्य की योजनाओं के लाभार्थियों को भाजपा पूरी तरह इन्टैक्ट रखने की जुगत में है। इनमें उज्ज्वला योजना, सौभाग्य योजना, स्वच्छ भारत जैसी योजनाओं के करोड़ों लाभार्थी शामिल हैं। इसके अलावा भाजपा को दस फीसद सवर्ण आरक्षण, ओबीसी को संवैधानिक दर्जा व ट्रि़पल तलाक पर अध्यादेश से लाभ मिलने की उम्मीद है। पार्टी को छोटे कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने में खासी मशक्कत करनी पड़ रही है, तभी संगठन के स्तर से लगातार नए-नए कार्यक्रम देकर उन्हें जोड़े रखा जा रहा है।






