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    अखिलेश ने मुलायम की आह ली, …लेकिन फिर भी नई पार्टी नहीं बनेगी

    By September 27, 2017 ब्लॉग No Comments6 Mins Read
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    श्याम कुमार 

    कोई बाप जब अपने बेटे की जिन्दगी संवारता है तो उसमें उसका कोई स्वार्थ नहीं होता है, बल्कि उसके भीतर उत्कट इच्छा होती है कि बेटा बुलंदियों को छू ले। यहां तक कि अर्थाभाव से जूझ रहे पिता के मन में भी यह भाव नहीं आता है कि उसने अपने बेटे पर जो धन स्वाहा किया है और उस पर जो प्यार लुटाया है, उसके बदले में वह बेटा उसे कुछ देगा। वह अपने बेटे का सिर्फ सच्चा और भरपूर प्यार चाहता है। यही प्यार उसे घोर अर्थाभाव के दिनों में ताकत देता है और उसकी आगे जीने की इच्छा बरकरार रहती है। भारतीय संस्कृति में ऐसे उदाहरण कदाचित ही होंगे, जिनमें बेटा बाप के लिए काल बन गया हो। वरना भारतीय संस्कृति में ‘राम’ व ‘श्रवण कुमार’ की परम्परा ही बलवती रही है। जब विदेशी मुसलिम  हमलावरों का भारत में आगमन हुआ, उस समय से बेटों द्वारा बाप और भाइयों की हत्या का नृशंस चलन व्यापक रूप में शरू हुआ। औरंगजेब ने जब अपने पिता शाहजहां को कैदखाने में डाला तथा भाइयों की निर्मम हत्या कर दी, वह घटना आज तक लोगों का स्वाद बिगाड़ देती है तथा शायद ही कोई व्यक्ति अपने बेटे का नाम औरंगजेब रखता हो। औरंगजेब ने अपने जिन भाइयों की नृशंस हत्या की, उनमें सूफी पम्परा का अनुयायी एवं हिन्दू-मुसलिम एकता का कट्टर पक्षधर दारा शिकोह था, जिसकी हत्या हो जाने से देश  का भावी इतिहास बदल गया। जिस देश में प्रेम की धारा बहती रहती, वहां घृणा ने उसका स्थान ले लिया। आज देश में जो कटुता एवं देशद्रोह का वातावरण है, वह दारा शिकोह की धारा क्षीण होने एवं  औरंगजेब की धारा मजबूत हो जाने का ही दुश्परिणाम है।

    औरंगजेब ने हमारे देश के वातावरण को जो प्रदूशित किया, उसका नतीजा आज भी जब-तब परिलक्षित होता है। यही कारण है कि बेटा प्यार से बाप के गले लगने के बजाय उसकी टांग खींचकर उसे पटकनी देने में संकोच नहीं करता है।  समय इतना विशाक्त हो गया है कि कभी-कभी ऐसा लगने लगता है कि बेटा बाप के मरने का इंतजार कर रहा है।  हमारे देश में राजनीति जितने निम्न स्तर पर गिर गई है, इसके उदाहरण कुछ दशकों से मिलने शरू हो गए। मुझे चैधरी चरण सिंह का अंत याद आता है। वह दिल्ली में अस्पताल में उपेक्षित पड़े अपने दिन गिन रहे थे। जिस समय उन्हें अपने बेटे के प्यार और सहारे की सर्वाधिक आवश्यकता थी, उससे वह वंचित थे।

    यह दूसरी बात है कि उपेक्षा करने वालों ने बाप के नाम को खूब भुनाकर अपनी राजनीति मजबूत की और अभी भी नाम को भुनाने में कोई कोताही नहीं बरती जा रही है। नया उदाहरण अखिलेश  यादव का है। अखिलेश यादव ने गत दिवस सपा-सम्मेलन में कहा कि उनके पिता उनके साथ हैं। कोई भी पिता शब्दों में अपने बेटे के साथ न भी हो, वह अपने दिल से, बेटे की छवि नहीं हटने देता है। यही कारण है कि मुलायम सिंह यादव इतने महीने इस प्रतीक्षा में रहे कि शायद उनका बेटा अखिलेश उनके पास आकर क्षमा मांग लेगा। लेकिन अखिलेश मन में पहले ही दूसरा रास्ता अपनाने का कठोर फैसला कर चुके थे। उनके लिए पिता के वात्सल्य से बढ़कर कुरसी सब कुछ हो गई थी। इसके लिए उन्होंने मुलायम सिंह को पार्टी का संरक्षक तो घोशित किया, लेकिन उनकी दशा शुन्य के बराबर कर दी।

    अखिलेश यादव ने जब विद्रोह द्वारा पार्टी पर कब्जा जमाया तो उन्होंने घोशणा की थी कि वह उत्तर प्रदेष के चुनाव में पार्टी को बम्पर जीत दिलाने के उद्देष्य से ऐसा कर रहे हैं तथा जब चुनाव खत्म हो जाएगा तो तीन महीने बाद वह पार्टी का अध्यक्ष पद सम्मानपूर्वक अपने पिता मुलायम सिंह को वापस सौंप देंगे। जब अखिलेश यादव सत्ता में आए थे और उन्होंने डीपी यादव को पार्टी में लेने से इनकार कर दिया था तो उनकी निर्मल छवि आकाष को छूने लगी थी। लोगों को अखिलेश का वह सरल, छलरहित एवं अहंकारविहीन चेहरा अभी तक याद है। मायावती ने लोकतंत्र की जो हत्या कर डाली थी, अखिलेश यादव ने उसे पुनर्जीवित किया था। निश्चित रूप से उसी छवि की बदौलत अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश के उक्त चुनाव में पूर्ण बहुुमत हासिल हो गया था। लेकिन अखिलेश यादव यह भूल गए कि उन्होंने जिस जमीन पर अपनी श्रेश्ठ छवि बनाई, उस जमीन को उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने ही तैयार किया था। पार्टी तैयार करना एवं उसे ताकत देना आज के समय में आसान नहीं है, बल्कि लोहे के चने चबाना है। कल्याण सिंह, उमा भारती-जैसे दिग्गज भी उस प्रयास में विफल हो गए थे।  अखिलेश यादव की जिन्दगी में उनकी दो जिदों ने उन्हें भारी क्षति पहुंचाई। पहली, वह अहंकार में चूर हो गए। उनके कार्यकाल का आखिरी दौर पूरी तरह भ्रस्टाचार एवं घोटालों में डूब गया। उनके इर्दगिर्द महाभ्रश्ट नेताओं, महाभ्रश्ट अफसरों एवं महाभ्रस्ट पत्रकारों का ऐसा जबरदस्त जमावड़ा हो गया कि सही लोगों का उनके पास फटक पाना असंभव हो गया था। अहंकार एवं भ्रश्टाचार ने अखिलेश यादव की छवि को भयंकर चोट पहुंचाई। इस पर ‘कोढ़ में खाज’ यह हुआ कि अखिलेश यादव ने अकेले चुनाव लड़ने की लाइन त्यागकर पप्पू फेंकू के साथ गठबंधन कर लिया। उन्हें उम्मीद हो गई थी कि कांगे्रस-जैसी मुर्दा पार्टी उन्हें संजीवनी प्रदान करेगी। नतीजा वही हुआ, जो होना था और समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत से गिरकर छोटे-से टापू की तरह 47 की संख्या में सिमट गई।

    अखिलेश अभी भी नहीं चेते हैं और अपनी नई छवि एवं नई योजनाएं प्रस्तुत करने के बजाय पप्पू फेंकू की भांति सिर्फ मोदी को गाली देकर अपनी नैया पार लगाना चाह रहे हैं।  मुझे अखिलेश यादव के भव्यतम विवाह-समारोह का स्मरण हो रहा है, जिसमें अमिताभ बच्चन-जैसी हस्तियां पधारी थीं तथा सहाराश्री घूमघूमकर मेजबानी कर रहे थे। वैसा भव्य आयोजन एवं भोज बहुत कम हुआ करता है। उस समय मुलायाम सिंह का सीना अपने पुत्र एवं पुत्रवधू को देखकर जितना चैड़ा हो रहा था, उसे सभी लोगों ने महसूस किया था। अखिलेश यादव ने यह नहीं सोचा कि यदि मुलायम सिंह चुनाव आयोग में अपनी पार्टी का पक्ष रखने में संकोच न करते तो आज अखिलेश की क्या दुर्दशा  पूर्ण स्थिति होती? मुलायम सिंह ने उस समय पुत्रमोह में अपनी बलि दे दी थी। यदि मुलायम सिंह ने पार्टी से निकाल दिए गए राम गोपाल यादव को आजम खां के कहने से पुनः पार्टी में वापस न ले लिया होता तो पार्टी के जिस साम्राज्य पर अखिलेश यादव हावी हो गए है, वह साम्राज्य उनसे बहुत दूर होता। इतना ही नहीं, अखिलेश यादव इस निम्न स्तर पर उतर आए कि उन्होंने मुलायम सिंह के शुरू से अब तक बेहद खास रहे वीरेन्द्र सिंह को बेइज्जत कर उनसे उनका कमरा छीन लिया और उनका सामान बाहर फेंक दिया गया। ‘न रहे बांस, न बजे बांसुरी’ की तर्ज पर वीरेन्द्र सिंह का कमरा तोड़कर वहां अन्य कोई निर्माण कराया जा रहा है। वीरेन्द्र सिंह वह व्यक्तित्व हैं, जिनकी ईमानदारी एवं कर्मठता की दूर-दूर तक चर्चा होती है। वह अभी भी स्कूटर से बहुत लम्बी यात्रा पूरी कर नित्य विक्रमादित्य मार्ग पर आते हैं। मुलायम सिंह ने उन्हें छोड़ा नहीं और ‘लोहिया न्यास’ में उन्हें बैठने की जगह दे दी है।

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