गुजरात में अब जनेऊ वॉर चल रहा है बीजेपी और कांग्रेस में युद्ध इस कदर जारी है कि कब कौन सा गड़ा मुर्दा उखाड़ कर इज्जत मट्टी पलीद कर दें कुछ कहा नहीं जा सकता! मोटिव सिर्फ एक किसी तरह चुनाव जीतना, फिलहाल वाक युद्ध जारी है और चुनाव की घड़ी नजदीक!
जीके चक्रवर्ती
गुजरात विधान सभा का चुनाव इसी महीने 14 दिसंबर 17 को सम्पन्न होने वाले हैं यूपी निकाय चुनाव 2017 में भाजपा को प्रचंड जनादेश मिला है और इसी जीत के साथ अब गुजरात चुनाव पर देशभर की नजरें टिकी हुई है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस चुनाव के परिणाम राष्ट्रीय राजनीति की भविष्य की दशा-दिशा तय करने वाली है। यदि हम आगामी 14 दिसम्बर को गुजरात में होने वाले चुनाव की तुलना हम बिहार में वर्ष 2015 में हुए चुनाव से करें तो हम यह कह सकते हैं कि इस प्रदेश में दोनों ही पक्षों का चरित्र कुछ इस तरह से नजर आता है कि जहाँ वर्त्तमान समय बीजेपी की सरकार राज्य एवं केंद्र दोनों ही जगह सत्तासीन होने के अतिरिक्त अनेको संसाधनो से लैस विकास देने का नारा अपने साथ लिए है। दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी है, जो की विकास प्रक्रिया में वंचित रह गए या किसी न किसी तरह के अन्याय के शिकार हुए समुदायों को अपने साथ लेकर मैदान में खड़ी होने की कोशिश कर रही है।

अब तक हुए ज्यादातर सर्वेक्षणो से यह बात उभर कर आ रही है कि यहाँ की लड़ाई बीजेपी के लिए एकतरफा बताया जा रहा वहीं पर कुछेक को चुनाव में कांटे की टक्कर भी मिलने की संभावना होने से यह इस बात की ओर संकेत कर रहे हैं कि गुजरात का मॉडल प्रत्येक मर्ज की दवा नहीं है। पिछले दो-ढाई वर्षों के मध्य गुजरात के वर्त्तमान सरकार के खिलाफ पिछड़े, दलित, किसान एवं पाटीदार से लेकर व्यापारी वर्गों तक के लोगो ने सड़क पर उतर कर अपना विरोध दर्ज कराया हैं। वास्तव में यहां पर गुजरात मॉडल के साथ ही साथ प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिष्ठा का भी प्रश्न है।
अभी हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा जीएसटी और नोटबंदी जैसी नीतियों के लागू करने से यहाँ के जनता के प्रतिकारों की परीक्षा भी होने वाली है। खासकर कर यहाँ पर बीजेपी का नारा हर जगह की ही तरह विकास पर केंद्रित है, यहाँ के सामाजिक एवं राजनैतिक समीकरण को साधने में वह भी किसी से पीछे नहीं है। जहाँ पर उनके पास पूर्व से ही प्रत्येक वर्गों एवं जातियों के लोगों का संगठन मौजूद हैं, जिसका प्रयोग वे अपने खिलाफ होने वाले संभावित एकजुटता को तोड़ने में कर रही हैं वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के द्वारा किये हुए पिछली गलतियों से सबक लेते हुए अपनी रणनीति को बदलने में लगे होने के साथ ही साथ बीजेपी के हथियारों से उसी पर निशाना साधाने के लिए वह सोशल मीडिया पर अपना आक्रामक रूप दिखाते हुए हिंदुत्व कार्ड को खेलने जैसा रास्ता अपनाने की कोशिशों में लगी हुई है।
राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार की शुरूआत मंदिरों में पूजा-अर्चना करने से की है। उसका सबसे ज्यादा जोर मुसलमानों के मौन समर्थन के आलावा ओबीसी, दलित,एवं पाटीदार को लेकर एक समीकरण तैयार करने में लगी हुई है। इस समीकरण को फलिभूत करने के लिए युवा दलित नेता जिग्नेश मेवानी एवं पाटीदार नेता हार्दिक पटेल का समर्थन सुनिश्चित किया गया है, जबकि पिछडे समुदाय के नेता अल्पेश ठाकौर को पार्टी में शामिल कर लिया गया है। जेडीयू के बागी नेता छोटूभाई वसवा आदिवासी समुदाय से आने वाले के साथ भी कांग्रेस ने सौदा किया है। देखना यह है, ये कोशिशें वोटों में तब्दील हो भी पाती हैं या नहीं। गुजरात चुनाव की असल चुनौती एक कारगर चुनावी मशीनरी बनाने की है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी का कोई मुकाबला ही नहीं हो।







