भाजपा की जीत जब राजनीतिक दलों को हज़म नहीं हुई तो EVMके बहाने घेरने की नाकाम कोशिश की और इस मामले को मीडिया ने भी खूब कैश कराया
जीके चक्रवर्ती
उत्तर प्रदेश में निकाय चुनावों के परिणाम के आने के बाद, उसमे भी राजनीति करने से हमारे नेता लोग कहाँ चूकने वाले हैं विभिन्न पार्टियों द्वारा ईवीएम मशीन को ही मुद्दा बना डाले जाने से कुछ पार्टियों के लोगो द्वारा मशीन की गड़बड़ी से अपनी हार का ठीकरा फोड़ते हुए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर ही रोना-धोना चालू कर दिया यह रोने धोने का कार्यक्रम एक दिसंबर को उसी वक्त शुरू हो गया था जब वोट की गिनती के रूझानों से यह स्पष्ट होने लगा था कि दूसरी पार्टियों से आगे भाजपा बढ़त हासिल करते हुए जीत दर्ज करती दिख रही थी।
सूर्य अस्त होते -होते जैसे जैसे भाजपा अधिकतर सीटों पर जीत दर्ज करती रही वैसे-वैसे ईवीएम मशीन पर रोने वालों की संख्यों में इजाफा होता चला गया और नेता लोग एक दूसरे पर जहर उगलना शुरू कर दिया। ऐसा करने वालो को उस समय और बल मिला जब जिला सहारनपुर की एक निर्दलीय प्रत्याशी शबाना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो आया। उसमे शबाना यह कहते हुए दिखी कि उन्हें जीरो वोट कैसे मिले? उनका दावा था की मैंने जो अपना वोट खुद को दिया था वो तो मुझे मिलना चाहिए था क्या वो भी वोट ईवीएम से भाजपा को चला गया।
जानकारों का मानना है कि ऐसा तो हो ही नहीं सकता है यदि मान भी लिया जाय कि मुझे किसी से वोट नहीं मिले तो उनके खुद का और उनके घर वाले लोगों के वोट कहां चले गए? शबाना के इस वीडियो के सोशल मीडिया पर प्रसारण होने को लेकर वास्तव में ईवीएम में गड़बड़ी के सुबूत के तौर पर उसे पेश किया जाने लगा। यह वीडियो शरारती तत्वों द्वारा सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया जिन लोगों ने उसे सच करार देकर ईवीएम मशीन एवं चुनाव आयोग पर खूब लांक्षन भी लगाये जाने लगे इसमें सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है कि इनमें से कई जाने-माने हस्तियों के आलावा स्वमं वकील प्रशांत भूषण के शामिल रहे। इन सबों के अतिरिक्त सपा, बसपा, कांग्रेस एवं आम आदमी पार्टी के कई दिग्गज नेता लोग और कुछ समर्थकों ने भी इस सोशल वीडियो को सच की तरह पेश करने की कोशिशे की। दूसरे दिन जब सभी परिणामो की खबरें आई तो पता चला कि सहारनपुर के जिस क्षेत्र से शबाना खड़ी थी उन शबाना को तो 87 वोट मिले हैैं तब उनको शून्य वोट मिलने का उनका दावा गलत साबित हुआ। अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि वर्त्तमान समय की राजनीति और चुनाव प्रत्याशी लोगों का नैतिक चरित्र और आदर्श कहाँ चले गये?
शबाना के गलत बयान की पोल पट्टी खुल जाने के बावजूद भी मीडिया एवं सोशल मीडिया में इस तरह की खबरें बार बार आती रहीं कि ईवीएम मशीन से भाजपा को लाभ पहुंचा ऐसे खबरों के सहारे मायावती, अखिलेश और राजबब्बर जैसे नेताओं के उन बयानों के माध्यम से यह कहने की कोशिश हुई कि निकाय चुनावों में जहाँ-जहाँ ईवीएम मशीनों से मतदान हुआ वहां पर भाजपा ने बढ़त हासिल की, और जहां बैलट पेपर से मतदान हुआ वहां उसका प्रदर्शन फीका रहा। जिसका परिणाम यह हुआ कि जनता के मध्य ऐसा संदेश गया कि कही हो न हो, ईवीएम ने छुपे तौर तरीके से भाजपा को लाभ पहुँचा। ऐसा कहने के क्रम में तो यहां तक कहा गया कि चुनाव आयोग धृतराष्ट्र बना हुआ है। तीन दिसंबर को ट्विटर पर ‘ईवीएम है तो बीजेपी है’ को जमकर टैग किया गया। ऐसी कथित उठने वाली बातों में किसी ने यह तक जानने की कोशिश नहीं की, कि आखिर इन बातों के पीछे कितनी सच्चाई है यहाँ पर कौआ कान ले गया जैसे मुहावरे चरितार्थ होते दिखाई दी और वह भी उस वक्त हुई जब उत्तर प्रदेश चुनाव आयोग की वेबसाइट पर चुनाव नतीजों का सारा लेखा-जोखा प्रकाशित हो चूका था।
उत्तर प्रदेश के चुनाव आयोग द्वारा प्रकाशित आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैैं कि जहां ईवीएम मशीन से वोट डाले गए वहां पर भाजपा पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहा, लेकिन साथ ही यह पुष्टि हुई कि जहां पर बैलट पेपर बॉक्स में वोट डाले गए वहां पर भी भाजपा के अलावा बसपा, सपा, एवं कांग्रेस जैसे पार्टियों के प्रदर्शन फीके रहे अादि, हम उदाहरण स्वरुप ईवीएम मशीनों से हुए निगम पार्षदों के चुनाव में हम देखे तो यह पता चलता है कि भाजपा पार्टी से जीते प्रत्याशियों का प्रतिशत करीब 45 रहा और वही पर सपा पार्टी का 15, बसपा का 11, एवं कांग्रेस का 8 तो बैलट पेपर बॉक्स में डाले गए वोट से नगर पालिका सदस्यों के चुनाव में जहां भाजपा से जीते हुए प्रत्याशियों का प्रतिशत 17 रहा है तो वही पर बसपा, सपा एवं कांग्रेस पार्टी से जीते प्रत्याशियों का प्रतिशत क्रमश: 5,9, और 3 रहा।
इस तरह आंकड़ो से यह तो स्पष्ट हो गया कि जहां ईवीएम मशीनों से मतदान हुआ वहां भाजपा की बसपा, सपा एवं कांग्रेस पार्टी से जीते प्रत्याशियों की संख्या का प्रतिशत अधिक है एवं जहां बैलट पेपर बॉक्स में वोट डाले गये वहां भाजपा की तरह बाकी सभी दलों के जीते हुए प्रत्याशियों का भी प्रतिशत भी कम रहा। इस वास्तविक सच्चाई को बहुत ही सफाई से छुपा कर ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की गई कि बैलट पेपर से डाले गए वोटो से हुए मतदान में भाजपा के मुकाबले अन्य दलों का प्रदर्शन खराब रहा इस तरह यह साबित करने की कोशिश हुई कि ईवीएम ने भाजपा को लाभ पहुंचाया। ईवीएम मशीन के विरोधी तत्वों के शरारत भरे दुष्प्रचार की पोल-पट्टी ऐसे तथ्यों से खुलती है कि बैलट बक्सों में डाले गए वोटों से हुए मतदान वाले नगर पालिका एवं पंचायत चुनावो में जहां भाजपा के जमानत जब्त होने वाले प्रत्याशियों को मिले वोट प्रतिशत 38 है वहीं पर बसपा, सपा एवं कांग्रेस के प्रत्याशियों का क्रमश: 73, 52 और 87, लेकिन भूल से भी इन सब बातो का उल्लेख न तो मायावती और न ही अखिलेश ने किया।
ईवीएम मशीन के खिलाफ सही तथ्यों को छिपाकर इसको एक मुद्दे के रूप में छेड़ा जाने वाला यह पहला अभियान नहीं। उत्तर प्रदेश में हुए निकाय चुनाव के मध्य में मेरठ में ईवीएम मशीन में कथित गड़बड़ी होने जैसी बातों वाला एक वीडियो सामने आया था। जबकि यह वीडियो यही दिखाता हैं कि किसी भी बटन को दबाने पर भाजपा के चुनाव निशान के साथ-साथ नोटा निशान के सामने वाली लाइट भी जल उठती थी, वहीं पर सनसनी फैलाने के लिए ऐसा प्रचारित किया गया कि किसी भी बटन को दबाओ, लेकिन वोट भाजपा के ही खाते में जा रहा है।
ईवीएम मशीन के विरुद्ध दुष्प्रचार को फैलाने के लिए कुछ एक राजनीतिक पार्टियां इस हद तक गिरने को तैयार हैैं, इसके उदाहरण स्वरूप एक वाक्या उस् समय का जब आम आदमी पार्टी की ओर से दिल्ली विधानसभा का मात्र एक दिन का सत्र बुलाया गया था। उस एक दिन के सत्र में एक नकली ईवीएम मशीन के द्वारा बेहद ही भोंडे ढंग से इस बात को साबित करने की कोशिश की गई थी कि इस मशीन को आसानी से हैक कर मनचाहे चुनाव नतीजे प्राप्त करना बायें हाथ का खेल है।
ईवीएम मशीन को हैक करने जैसे का तमाश एक बीटेक डिग्री धारक द्वारा किया गया था। वही पर जब जब इस विधायक को चुनाव आयोग से चुनौती मिली तो इसे वह स्वीकार करने से पीछे हट गया था। यदि ईवीएम मशीन में कोई कमी जैसी बात हो तो उसे उजागर कर देने में हर्ज तो नहीं होना चाहिए लेकिन सही तथ्यो को तोड़-मरोड़कर कर छिपाने या छल-कपट का सहारा लेकर उसके विरुद्ध दुष प्रचार का माहौल तैयार करना एक निकृष्ट एवं घृणित राजनीति के अलावा और कुछ नहीं हो सकता है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है







