सपनों के सौदागर

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राहुल कुमार गुप्त
सपने देखना अच्छी बात है पर जब कोई सपने दिखाकर वर्तमान तो वर्तमान भविष्य भी अंधकारमय कर दे तो उस सपनों के सौदागर के प्रति मन में कैसी टीस उठती है, यह भुक्तभोगी ही जानता है। आज देश में ऐसे भुक्तभोगियों की संख्या करोड़ों में है। द्वारकाधीश की नगरी से भाषण देने में निपुण एक ऐसा महारथी आया जिसका नेतृत्व नेपथ्य से धनकुबेर कर रहे थे। आज कई लोग उस महारथी को महाठग की उपमा से नवाज रहे हैं, पर ऐसा सोचना गलत होगा। धनकुबेरों की संगत ही ऐसी होती है कि थोड़ा बुद्धिमान व्यक्ति भी मिट्टी को सोना बनाकर बेच लेता है, यह उस व्यक्ति की काबलियत है। और अगर कोई मिट्टी को सोना समझकर खरीद रहा है तो यह खरीदने वाले की  मूर्खता। मिट्टी का तो मोल होता है पर सपनों का क्या कोई मोल होता है ? वो जिसे आज देश के कई लोग महाठग बता रहे हैं वो थोड़े बुद्धिमान नहीं बल्कि महाबुद्धिमान हैं, उन्होंने सपनों को बेचकर देश का ताज खरीद लिया।
यह विश्व के इतिहास में पहली बार हुआ है। इसलिए विश्व का अचम्भित होना भी लाजिमी था। मताधिकार आमजन का महत्वपूर्ण अधिकार व हथियार है जो पाँच वर्ष में एक बार ही काम आता है अर्थात यह मताधिकार धन से महत्वपूर्ण है। यह मताधिकार ही देश व करोड़ों देशवासियों के भविष्य का फैसला करता है। लोगों ने सुनहरे सपनों के चलते अपना यह बहुमूल्य मताधिकार दिया है। पर वो ठगे नहीं गए। सुनहरे सपने वो अब भी देख सकते हैं, सपना देखने में क्या है, कौन सा कोई खर्च आना है। चाहें तो आप दिनभर सपनें देखें इसमें कोई सर्विस टैक्स नहीं है और न ही अभी सरकार का कोई इरादा है सपनों में सर्विस टैक्स लगाने का। क्योंकि इन्हीं सपनों ने देश का ताज वर्तमान सरकार को दिया है तो वह भी इन सपनों के प्रति तो एहसानमंद जरूर है इसलिए हम बेहिचक सपने देख सकते हैं ।
वर्तमान का गला घोंटकर बेहतर भविष्य की कल्पना भी कर सकते हैं इसके सिवा हमारे पास और कोई चारा नहीं है। हाँ! यह जरूर है कि वादे करना और उनसे किनारा कर लेना यह मानवीयता के खिलाफ जरूर हो सकता है पर महाव्यापार में मानवीयता का मूल्य गौड़ होता है। अतः सपनों के उस सौदागर को जो लोग महाठग कहते हैं, वो लोग कहीं न कहीं व्यापारिक मामलों में कच्चे हैं। लोग करते तो करते क्या वो तो यूपीए-2 के भ्रष्टाचार व घोटालों से इतना आजिज आ चुके थे कि उन्हें सुनहरे सपनों ने एक उम्मीद दिखाई थी कि “अच्छे दिन आयेंगे !”। आज जनता उन्हीं अच्छे दिनों का इंतजार कर रही है और खुद को कोस भी रही है। दिल्ली में आप की सरकार के 49 दिनों के कार्यकाल की आलोचना करने वाले आज अपने लिए तरह-तरह की दलीलें दे रहे हैं। खुद भाषणों के महारथी ने एक अशोभनीय टिप्पणी की थी जो की उच्च पद की गरिमा से परे थी।
100 दिन में अच्छे दिन के वादे और न जाने कितने सुनहरे वादे कर जनता को अपनी ओर आकृष्ट किया। राजनीति में कोई नवसिखिया तो थे नहीं तब भी इनको जानकारी थी की जो वादे कर रहे हैं उनके पीछे की हकीकत क्या है। आज उन वादों के एकदम उलट कार्य हो रहे हैं। सत्ता में आते ही आमजन की दैनिक जीवन पर प्रहार किया गया। रेलवे का किराया अप्रत्याशित रूप से बढ़ा दिया गया। और नाम दिया गया सुविधाओं का किन्तु शायद ही आमजन को आज भी रेलवे में कोई सुविधा मिलती हो। रेलवे में वाई-फाई व बुलेट ट्रेन यह आमजन के लिए तो नहीं है। वो बेचारे तो अब एक्सप्रेस की स्लीपर तक में बैठ नहीं पाते। तो उन पर महँगाई का यह बोझा लादकर अमीरों के सफर को और मनोरंजक बनाने का निर्णय बहुत ही सराहनीय हो सकता है कुछ लोगों की नजर में ! हर चीज महँगी पर आमलोगों की आमदनी वहीं की वहीं।
क्योंकि इस सरकार पर पूँजीपतियों का टैग पहले भी लगा था और आज भी। यूपीए सरकार की जितनी योजनाओं पर तत्कीलीन विपक्षी पार्टी ने बेमिशाल विरोध किया था वही योजनाएं लागू कर-कर के खुद ही वाहवाही लूट रहे हैं। जनता ने वो दौर भी देखा था और आज का भी दौर देख रही है। किस तरह से विदेश नीति का हवाला देते हुए खरबों रूपये खैरात में बाँटे जा रहे हैं और खुद के देश का अन्नदाता बेबशी के चलते मौत को गले लगा रहा है। और इनकी बेबशी पर ऊटपटांग के बयान देने से भी माननीय बाज नहीं आते। जनता को भटकाने के लिए तरह-तरह के आयोजनों का प्रचार-प्रसार होता है या हकीकत में कुछ अच्छा करने की दिशा में कार्य हो रहे हैं, यह जनता भी बाखूबी समझने लगी है। नोटबंदी की असली वजह से विपक्ष भी किनारा कर रही है,  जनता को बरगलाने के लिये सारे न्यूज चैनल और सोशल मीडिया ने बेतहाशा सक्रियता निभाई और विकलांग विपक्ष ने उतने ही धीमें से विरोध के सुर उठाये। विपक्ष का सत्ता पक्ष से इतना दब के रहना पहली स्वतंत्र भारत के भारतीय इतिहास में पहली बार देखा गया है। वजह जनता भी समझ रही है। एक कहावत है ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ जो यहाँ चरित्रार्थ हो रही है। किंतु जो मकसद गिनाये गये शायद ही कोई गिनाये गये मकसदों में कुछ पूरा हुआ हो।विकास भी खो चुका है, देश में हिंदू-मुस्लिम के बीच खाईं बनाकर भय का माहौल बनाया जा रहा है और न्यूज चैनल्स की डीबेट भी इन्हीं विषयों पर आधारित है। कई मीडिया ग्रुप पक्ष में माहौल बना रही है तो एकाध मीडिया ग्रुप सरकार के कार्यों की आलोचना कर रही हैं।
आवाज उठाने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही हो रही है। यहाँ एक तरह से अघोषित आपातकाल लगा है हाँ! पर उनके खिलाफ, जो सत्ता पक्ष की आलोचना करें। अव्यवस्थित जीएसटी ने भी देश की अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाई है। इसको लेकर हाल ही में आईएमएफ व विश्व बैंक का चिंता जाहिर करना एक बड़ी बात है। सरकार अपनी गलती जनता के समक्ष भले न स्वीकारे पर अब खुद में सुधार तो कर ही सकती है। सत्तापक्ष अभी इस मुगालते में है कि देश के पास एनडीए के अलावा मजबूत विकल्प नहीं है। सही भी है विपक्ष विकलांग है। ऐसे में हिंदू-मुस्लिम कार्ड ही काफी है विकास की कोई जरूरत नहीं। पर कभी-कभी दिव्यांगों ने भी विश्वव्यापी रिकाॅर्ड बनाये हैं। अतः अपने शासन के बचे दो सालों में सत्तापक्ष को जमीन में कार्य दिखाना होगा, आमजन को राहत देने वाले कार्यों में इजाफा लाना होगा, क्योंकि हकीकत में आमजनता ने जिन उम्मीदों से 2014 फतेह कराया था उनमें से कोई भी पूरी नहीं हूई,हाँ! एक उम्मीद पूरी हूई थी वो थी तत्कालीन गद्यीसीन यूपीए को धरातल पर ले आना। इस सरकार ने भी कई खामियों के साथ तीन साल का सफर पूरा किया है। अब आत्ममुग्धता से बाहर आकर ही मिशन 2019 को फतेह किया जा सकता है। क्योंकि क्षेत्रीय दलों की एकजुटता विपक्ष के पक्ष में आकर सत्ता पक्ष का विजय अभियान रोक सकती है।

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