दो महीने!

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हाय, ये दो महीने 
कैसे गुजरे !
जैसे, जलती हुई भट्ठी पर
पूरा शरीर पसरे।

खाना-पीना,
सोना-जागना
हराम हो गया
गली-गली घूमना
एकमात्र काम हो गया।

हर जगह रुकना पड़ा,
हर समय झुकना पड़ा,
चरणों को पकड़े रहना पड़ा।

अलाय-बलाय-सलाय,
आंय-बांय-सांय,
सब सुनते रहना पड़ा,
दो कौड़ी की नसीहतें
गुनते रहना पड़ा,
झूठे वादों के अम्बार
खड़े करते रहना पड़ा।

लेकिन बच्चू!
वह दौर बीत गया है,
कष्टों का घड़ा रीत गया है,
बन्दा अब जीत गया है।

अब तो मनमानी राह चलूंगा,
किसी से बात नहीं करूंगा।
कान में रुई पड़ी रहेगी,
कोई फरियाद नहीं सुनूंगा।

प्यारे!
तुम अपनी औकात जान लो,
मेरी औकात मान लो।
दुनिया उलट गई है,
धारा पलट गई है।

रात गई, बात गई,
सपनों की सौगात गई,
कैसा वादा
कैसा नाता
कैसी वरिष्ठता
कैसी योग्यता

मत भूलो —
अब मैं नेता हूं,
तुम जनता हो।
मैं राजा हूं,
तुम प्रजा हो।
मैं कुआं हूं,
तुम प्यासा हो।

अहम् ब्रम्हास्मि,
मैं ब्रह्म हूं !
त्वम् कूड़ास्मि,
तुम कूड़ा हो !

  • श्याम कुमार 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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