गुजरात में कांग्रेस का ‘ईवीएम दांव’!

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श्याम कुमार

कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता तथा सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी के दाहिने हाथ अहमद पटेल ने, जो गुजरात में कांग्रेस के चुनावी मोर्चे के कर्णधार हैं, घोषणा की है कि यदि गुजरात के चुनाव में ईवीएम मशीन की धांधली नहीं हुई तो वहां कांग्रेस पार्टी की विजय होगी। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि वहां कांग्रेस हार जाएगी तो वह पराजय ईवीएम मशीन की धांधली के परिणामस्वरूप होगी। कांग्रेस अपना स्तर निरंतर अधिक से अधिक गिराती जा रही है। अब स्पश्ट होने लगा है कि कदाचित उसे गुजरात में अपनी हार का आभास होने लगा है और वह पेशबंदी के रूप में ईवीएम मशीन को निशाना बना रही है। कांग्रेस ने गुजरात का पूरा चुनाव राहुल गांधी को आगे कर उनके नेतृत्व में लड़ा।

उसने इस बात पर पूरा जोर लगा दिया कि साम, दाम, दण्ड, भेद, किसी भी प्रकार से वह गुजरात का चुनाव जीत ले। उसकी रणनीति थी कि ऐसा होने पर एक ओर मोदी का जलवा धूमिल होगा तो दूसरी ओर राहुल गांधी अपनी ‘महामूर्ख’ एवं ‘पप्पू’ वाली छवि से आजाद होकर कांग्रेस के सक्षम नेता सिद्ध होंगे। लेकिन कांग्रेस यह आभास होने पर कि वह गुजरात में हारने जा रही है, तरह-तरह की पेशबंदियां कर रही है। उसका प्रयास है कि ईवीएम मशीन के मत्थे ठीकरा फोड़कर वह राहुल गांधी पर पुनः फेल होने का ठप्पा लगने से बचा ले जाएगी। इसीलिए गुजरात के चुनाव में प्रथम चरण के मतदान में कांग्रेस ने अनेक मतदान-केन्द्रों पर यह हल्ला मचवाया कि मशीनें गड़बड़ हैं और कोई भी बटन दबाया जाये वोट भाजपा को पड़ रहा है।

लेकिन चुनाव आयोग भी पहले से सतर्क था, इसलिए आयोग के अधिकारी कांग्रेस के आरोप की जांच करने तुरन्त पहुंच गए और वहां उन्होंने आरोप लगाने वालों से अपने आरोप सही सिद्ध करने को कहा। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि वे अपने आरोप अभी सत्य नहीं सिद्ध कर पाए तो उनके विरुद्ध पुलिस में गलतफहमी फैलाने की रिपोर्ट दर्ज कराई जाएगी। यह सुनते ही आरोप लगाने वाले सभी व्यक्ति भाग खड़े हुए।

कुछ महीने पहले जब गुजरात के विधानसभा-चुनाव की चर्चा शुरू हुई थी, उस समय कल्पना भी नहीं हो सकती थी कि वहां का चुनावी माहौल वस्तुतः इतना बुरा रूप धारण कर लेगा। इसकी शुरुआत उस समय हुई। जब कांग्रेस पार्टी ने केन्द्रीय निर्वाचन आयोग पर यह आरोप लगा दिया था कि उसने भाजपा को लाभ पहुंचाने के लिए जानबूझकर हिमाचल प्रदेश के चुनाव की तिथियों की घोषणा के साथ गुजरात के चुनाव की तिथियों की घोषणा नहीं की। उस समय कांग्रेस के इस स्तरहीन आरोप की देश में आलोचना हुई, लेकिन वह आलोचना जल्दी ही शांत हो गई थी। गुजरात के चुनाव की तिथियां घोषित होने के बाद शुरू में बड़ा अच्छा माहौल था। कांग्रेस व भाजपा के बीच विकास ही मुख्य चुनावी मुद्दा प्रतीत हो रहा था। लेकिन अचानक हार्दिक पटेल का प्रवेश हो जाने से माहौल बदलने लगा। उस माहौल में हार्दिक पटेल जिस रूप में प्रवेश हुआ, उससे चुनावी माहौल का बिगड़ना स्वाभाविक था। लोगों को भूला नहीं था कि हार्दिक पटेल ने पाटीदार-आरक्षण आंदोलन शुरू कर गुजरात के शांत वातावरण में किस तरह आग लगाई थी और सारा वातावरण अशांत कर दिया था। पाटीदार-आंदोलन के चक्कर में वहां की महिला मुख्यमंत्री को पद से हटना पड़ा। भाजपा नेतृत्व ने यह सोचकर मुख्यमंत्री बदला था कि इससे पाटीदार-आंदोलन शांत हो जाएगा तथा कुछ सीमा तक ऐसा हुआ भी। लेकिन हार्दिक पटेल के रूप में गुजरात में एक ऐसा ‘अरविन्द केजरीवाल’ पैदा हो गया था, जो कुटिल राजनीति का प्रतीक बन गया।

हार्दिक पटेल ने ऐसे विषय को लेकर पाटीदारों को सरकार के विरुद्ध खड़ा किया, जो विषय संविधानसम्मत नहीं था। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला है कि आरक्षण 50 प्रतिषत से अधिक नहीं दिया जा सकता है। चूंकि गुजरात में यह सीमा पहले से पूरी हो चुकी, इसलिए वहां पाटीदारों को अतिरिक्त आरक्षण दिया जाना असम्भव है। कांग्रेस पक्ष की ओर से अभी यह तर्क दिया जा रहा है कि जब तमिलनाडु में 50 प्रतिषत से अधिक आरक्षण दिया जा सकता है तो गुजरात में भी वैसा हो सकता हैै। कांग्रेस यह भूल गई है कि तमिलनाडु में 50 प्रतिषत से अधिक आरक्षण तब दिया गया था, जब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला नहीं हुआ था। उस फैसले के बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत आरक्षण-सीमा का उल्लंघन करना किसी के लिए सम्भव नहीं है। कांग्रेस पार्टी ने गुजरात के चुनाव में पाटीदारों को लुभाने के लिए हार्दिक पटेल की मांग को स्वीकार करने का आष्वासन तो दे दिया है, लेकिन यदि कांग्रेस चुनाव में विजयी होती है और उसके बाद आरक्षण का यह वादा पूरा नहीं करती है, तब यही पाटीदार उसका एवं हार्दिक पटेल का जमकर बैंड बजाएंगे। वैसे, सभी पाटीदार हार्दिक पटेल की आरक्षण की मांग के समर्थक नहीं है। पाटीदार समाज के बहुतेरे लोग, विशेष कर जो लोग विदेशों में हैं, धनाढ्य हैं और वे आरक्षण की मांग को हास्यास्पद मानते हैं। हमारे देश में जातिवाद इस बुरी तरह हावी है कि उसने हिन्दू समाज में लोगों को अंधा एवं बुद्धिहीन कर दिया है। हार्दिक पटेल इसका फायदा उठाकर काफी पाटीदारों को अपने पीछे लामबंद करने में सफल हो गया।

कांग्रेस पार्टी सत्तर साल से रचनात्मक कार्यों में भले ही फिसड्डी रही हो तथा देश का समुचित विकास न कर पाई हो, लेकिन तिकड़म के मामले में उसका कोई जोड़ नहीं रहा। कांग्रेस पार्टी में जवाहरलाल नेहरू द्वारा शुरू की गई तिकड़म की राजनीत को नेहरू वंश ने ऐसा आत्मसात किया कि वह अब तक चली आ रही है। कांग्रेस ने तिकड़मी राजनीति का गुजरात में जमकर उपयोग किया। पहले उसने अहमद पटेल के राज्यसभा हेतु चुने जाने के समय बड़ी चालाकी से उसका इस्तेमाल किया, जिसमें सफलता के बाद उसे लगा कि यदि वह अपना पूरा ध्यान गुजरात पर केन्द्रित कर दे और तिकड़मों आदि के सहारे अपनी पूरी ताकत गुजरात में झोंक दे तो शायद वह वहां का चुनावी पांसा पलट सकती है। उसने सोचा कि यदि वह गुजरात में मोदी को परास्त कर देगी तो 2019 के चुनाव में नेहरू वंष को दिल्ली का राजसिंहासन पुनः प्राप्त हो सकेगा। इसके लिए उसने सबसे पहले हार्दिक पटेल को अपनी ओर मिलाकर गुजरात के चुनावी माहौल को विकास के मुद्दे के बजाय जातिवाद के मुद्दे में लपेट लिया। जातिवादी राजनीति के क्रम में ही कांग्रेस ने दलितों के नेता के रूप में जिग्नेश को एवं पिछड़ों के नेता के रूप में अल्पेश को अपनी ओर मिलाया। यहीं से गुजरात का चुनाव जातिवाद से प्रदूशित होना शुरू हुआ और फिर तो उसमें तरह-तरह के नाले-पनाले आकर गिरने लगे। वहां जातिवाद के साथ अब ईवीएम पर आरोपरूपी पनाला भी गिराया जा रहा है। लोग हंस रहे हैं कि जब उसी ईवीएम मशीन से कांग्रेस कहीं जीतती है तो उसे मशीन सही लगती है और उसे वह राहुल गांधी की सफलता बताती है, किन्तु जब हारती है तो मशीन की धांधली बताती है।

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