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‘पद्मावती’ जैसा विवाद नया नहीं!

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हेमंत पाल 

संजय लीला भंसाली की इतिहास के कथानक पर बनी फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर विवाद कुछ ज्यादा ही गहरा गया। पहले समझा जा रहा था कि फिल्म की कथित तथ्यात्मक गलती ही विरोध का मुद्दा है, पर अब इस विवाद की गर्भ से राजनीति ने जन्म ले लिया। फिल्म में रानी पद्मावती के किरदार को किस तरह पेश किया गया और मुग़ल बादशाह अलाउद्दीन खिलची और पद्मावती के बीच प्रेम का स्वप्नदृश्य जैसा कोई सीन है या नहीं, अभी ये सिर्फ कयास हैं। क्योंकि, किसी ने फिल्म नहीं देखी। ‘पद्मावती’ को लेकर इन दिनों देश में जो हालात बने हैं, उसके पीछे राजनीतिक स्वार्थ और तुष्टिकरण नीति काम कर रही है। क्योंकि, जो फिल्म अभी सेंसर के पास नहीं पहुँची, किसी ने उसे देखा नहीं, फिर भी विवाद आसमान पर पहुँच गया?

ये पहला अवसर नहीं है, जब किसी फिल्म को राजनीतिक कारणों से विरोध झेलना पड़ा हो! ‘पद्मावती’ से पहले भी ऐसी कई फ़िल्में बनी हैं, जिनके परदे पर नहीं उतर पाने के पीछे राजनीतिक कारण रहे हैं। कुछ फ़िल्में तो काटछांट के बाद रिलीज हो गई, लेकिन ऐसी भी फ़िल्में हैं जिन्होंने अभी तक परदे का मुँह नहीं देखा। लेकिन, इन फिल्मों को लेकर जो भी आपत्तियाँ उठी, उन सभी में सेंसर बोर्ड की भूमिका रही! यदि उन फिल्मों को बैन भी किया गया तो वो काम भी सेंसर ने ही किया, किसी नेता ने नहीं! लेकिन, ‘पद्मावती’ संभवतः पहली फिल्म है, जिसे शूटिंग के वक़्त से ही विरोध का सामना करना पड़ा! सेंसर के सामने जाने से पहले सिर्फ अनुमान के आधार पर ही फिल्म का विरोध सड़क पर उतर आया।
हिंदी फिल्मों को बैन किए जाने का इतिहास टटोला जाए तो 1921 बनी मूक फ़िल्म ‘भक्त विदुर’ भारतीय इतिहास की पहली ऐसी फिल्म थी, जिसे बैन किया गया था। इस फिल्म में एक हिंदू पौराणिक किरदार विदुर था। उसके और महात्मा गाँधी के बीच काफ़ी समानताएं दिखाई गई थी। इस  किरदार ने गाँधी टोपी पहनी थी, और फिल्म को बैन करने की यही सबसे बड़ी वजह भी यही मानी गई थी। इसके बाद आपातकाल के समय 1977 में आई ‘किस्सा कुर्सी का’ लेकर जमकर विवाद हुआ था। अमृत नाहटा की इस फिल्म की कहानी गंगू नाम के एक किरदार की थी, है जो जनता को मूर्ख बनाकर राष्ट्रपति बन जाता है। माना गया था कि इस फिल्म जरिए इंदिरा गांधी की सरकार की आलोचना की गई थी। सेंसर ने इस फिल्म  51 आपत्तियां लगाई गए थी। फिल्म के मूल प्रिंट को संभवतः जला तक दिया गया था। आपातकाल के बाद फिल्म दोबारा बनी, रिलीज पर चली नहीं!

गुलजार की 1975 में आई फिल्म ‘आंधी’ को रिलीज के 26 हफ्ते बाद बैन कर दिया गया। संजीव कुमार और सुचित्रा सेन ने इसमें मुख्य भूमिका निभाई थी। सुचित्रा ने एक नेता आरती देवी का किरदार निभाया, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जीवन से प्रेरित बताया गया था। इसके बाद आपातकाल लग गया। 1977 में आम चुनाव हुए और नई सरकार बनी, तब इसे फिर रिलीज किया गया। 2005 में बनी टीडी कुमार की फिल्म ‘सोनिया’ की कहानी सोनिया गाँधी से प्रेरित थी, इसलिए फिल्म को सेंसर में उलझना ही था और वही हुआ भी! सेंसर ने इसे पास करने से मना कर दिया था। निर्माता से कहा कि पहले सोनिया गांधी से अनुमति ले! फिल्म में कोई भी बड़ा एक्टर नहीं था. अंततः ये रिलीज ही नहीं हुई!
इसी साल मधुर भंडारकर की फिल्म ‘इंदू सरकार’ के परदे पर आने से पहले ही विवाद हो गया था। आरोप था कि ये फिल्म संजय गाँधी को लेकर बनाई गई थी। फिल्म पर रोक लगवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका तक दाखिल की गई! अंततः फिल्म रिलीज तो हुई, पर दर्शकों को आकर्षित सकी! ये तो वो फ़िल्में हैं जो किसी राजनीतिक व्यक्ति के जीवन पर बनी, इसलिए उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा! लेकिन, अपने आपत्तिजनक विषय, अत्यधिक खुलेपन और ज्यादा हिंसात्मक दृश्यों के कारण भी कई फिल्मों को बैन किया गया है। लेकिन, ‘पद्मावती’ पहली ऐसी फिल्म है जिसे ऐतिहासिक तथ्यों पर ही संदेह किया जा रहा है और जिसे सेंसर ने भी नहीं देखा, पर विरोध का गुबार आसमान तक पहुँच गया!

हेमंत पाल जी ब्लॉग से साभार

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