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    कला और नग्नता का जीवंत सवाल!

    By December 22, 2017 ब्लॉग No Comments4 Mins Read
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    Post Views: 1,090
    हेमंत पाल
    फिल्मों में सेक्स एवं ग्लैमर हमेशा से ही चर्चा और विवाद का विषय बना रहा है। आजादी के बाद जब देशप्रेम वाली फिल्मों की संख्या कम हुई, तो फिल्मकारों ने नए विषयों की खोज की! इसके बाद ही नायिका के अंग-प्रत्यंग से दर्शकों को लुभाने के प्रयास शुरू हुए! इस आँधी से राजकपूर व मनोज कुमार जैसे सार्थक फिल्म बनाने वाले निर्माता भी नहीं बच सके। राजकपूर ने ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ व ‘राम तेरी गंगा मैली’ में तथा मनोज कुमार ने अपनी लगभग सभी फिल्मों में ग्लैमर, सेक्स व अंग प्रदर्शन को बखूबी से भुनाया। लेकिन, इन दोनों ही फिल्मकारों ने ग्लैमर को बहुत ही कलात्मक ढंग और ऐसे दृश्यों को फिल्माया कि उन पर जिस्म प्रदर्शन का आरोप नहीं लगा! जबकि, दूसरी तरफ हृषिकेश मुखर्जी, गुलजार, श्याम बेनेगल तथा प्रकाश झा जैसे फिल्मकारों की ऐसी जमात थी, जो इस आँधी के बीच भी मकसदपूर्ण फिल्में बनाने में लगे रहे!
    एक दौर ऐसा भी आया जब ऐसी फ़िल्में खूब बनी। 90 और 2000 के दशक को इसी रूप में जाना जाता है, जब सेक्स और व एक्शन फिल्में बहुत बनी! कहा यह गया ये सब डूबते फिल्म उद्योग व ग्लैमर व्यवसाय को बचाने के नाम पर किया गया। 2000 के बाद का दशक जरूरत से ज्यादा बोल्ड निकला। सेक्स व अंग प्रदर्शन के इस फॉमूले को इस दौर में ज्यादा विकृत तरीके से फिल्माया गया। सशक्त एवं सार्थक फिल्म बनाने वाले महेश भट्ट व उनकी अभिनेत्री बेटी पूजा भट्ट ने जिस्म, पाप, मर्डर जैसी फिल्में बनाकर इसे नया चेहरा दे दिया। इन फिल्मों की बॉक्स ऑफिस पर रिकार्डतोड़ सफलता ने फिल्म-निर्माण की दिशा में एक नया हंगामा पैदा कर दिया। बहुत सारे फिल्म निर्माता एवं निर्देशक अपनी फिल्मों में नायिकाओं एवं अन्य अभिनेत्रियों के शरीर के अधिक से अधिक कपड़े उतारने में जुट गए।
     उधर, रातों-रात शोहरत और पैसा कमाने के लालच में कई अभिनेत्रियों ने भी हर तरह के समझौते किए। देखा जाए तो कला का इससे अधिक पतन दूसरी किसी विधा में नहीं हुआ। आदिकाल से ये सवाल जिंदा रहा है कि कला वास्तव में कला के लिए है या जीवन के लिए? कंदराओं में बैठकर कोई कलाकार क्या लिखता, चित्रित करता अथवा गाता है उसका तो समाज पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता! पर, जब जनता के लिए कोई रचना गढ़ी जाती है तो उसका असर मानव मन पर ही नहीं, अंतर्मन पर भी गहरा पड़ता है। यह सर्वमान्य है कि दृश्य काव्य बहुत शीघ्र तथा अधिक काल तक अपना प्रभाव रखता है। देश में महिलाओं को अशिष्ट रूप में प्रस्तुत करने पर दंड देने के लिए कानून है। सीधा सा अर्थ है कि अश्लीलता का मतलब है नग्नता! जबकि, फिल्मों में कई बार कला और कथित स्टोरी की डिमांड के नाम पर महिला शरीरों को निर्लज्जतापूर्वक लगभग बिना कपड़ों के ही दर्शाया जाता है। इसे कौन स्वीकारेगा?
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      जबकि, ऐसी फिल्मों के समर्थक और ‘लव इन इंडिया’ और ‘गांडू’ जैसी चर्चित फिल्मों के निर्देशक कौशिक मुखर्जी का मानना है कि भारतीय फिल्मों को अगले स्तर पर ले जाने के लिए दोहरी मानसिकता से निजात पाना जरूरी है। उनका कहना है कि हम खजुराहो जाते हैं और वहां नग्न मूर्तियों को देखकर उसे कला कहते हैं। जबकि, फिल्मों में अगर नग्नता दिखाई जाए तो हम हाय-तौबा मचाते हैं! इस दोहरी मानसिकता से और इस पाखंड से हमें निकलना होगा। अब वक्त आ गया है कि सरकार और सेंसर बोर्ड को अपनी मानसिकता बदलना होगी।
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    हॉलीवुड की फिल्मों में नग्नता और हिंसा के चरम सीमा पर पहुँच जाने, फिल्म-निर्माताओं की असीम आकांक्षा, लालसा और ललक ने भी फिल्म के कलापक्ष का ताबूत खड़ा करने का प्रयास किया! लेकिन, बॉलीवुड के निर्माता यह तथ्य भूल गए कि तीन दशक पहले इसी सेक्स और हिंसा की बैसाखी पर खड़ी जापानी, फ्रेंच, स्वीडन एवं ब्राजील की फिल्मों ने भले ही विश्व बाजार में खड़े होने के पायदान ढूंढ लिए थे। लेकिन, अंततः उनकी यही लालसा उनके पतन का कारण भी बनी! अंत में सशक्त एवं संवेदनशील फिल्मों की ओर लौटकर उन्हें अपनी अस्मिता बचानी पड़ी थी। अन्यथा उस दौर में उन्मुक्त सेक्स व नग्नता का जितना खुला प्रदर्शन जापान, फ्रांस, स्वीडन, बाजील व पोलैंड की फिल्मों में हुआ था, उतना अन्यत्र कहीं नहीं! यहाँ तक कि हॉलीवुड भी इसमें पीछे रह गया था। अब इस दौराहे पर भारतीय फ़िल्मकार क्या करें? सवाल लाख टके का है, पर जवाब तो दर्शक ही देंगे कि वे क्या देखना पसंद करेंगे?
    हेमंत पाल,ब्लॉग से साभार

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