जी के चक्रवर्ती
देश के किसानों द्वारा आंदोलन करते हुये 27 दिनों से भी अधिक का समय गुजरने के बाद भी केंद्र सरकार द्वारा उनकी मांगे न मानने की दशा में यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है केंद्र सरकार द्वारा लाये गये इन तीनों कृषि कानूनों को लेकर किसान सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं किसानों में मुख्य रूप से हरियाणा-पंजाब के किसान शामिल हैं। इस आंदोलन से एक बात तो बहुत स्पष्ट है कि देश के किसानों के अतिरिक्त स्वमं केन्द्र सरकार के अंदर भी इन बिलों पर समर्थन प्राप्त नही है। लेकिन वर्तमान समय मे इस मामले में हल नही निकलता देख कर दो वकीलों के अतरिक्त एक आम साधारण व्यक्ति द्वारा सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है, जिसमे एक याचिका दायर की गई है जिस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। बीजेपी के किसान मोर्चा के एक नेता ने तो यहां तक कह दिया है कि इस मामले में किसानों से पहले ही बातचीत कर ली जाती तो तो शायद यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने की नौबत ही न आती।
इस बिल को लाने के उद्देश्य पर सरकार का कहना है कि देश के किसानों को इस कानून के माध्यम से अब एपीएमसी मंडियों से पृथक अपने उपजों को ऊंचे दामों पर दूसरी जगह बेचने का हक प्रदान करना हैं,
लेकिन देश के किसानों को यह भी भय सता रहा है कि कहीं सरकार द्वारा लाये गये इस कानून के माध्यम से धीरे-धीरे यह न्यूनतम समर्थन मूल्य जिस पर सरकार किसानों से अनाज खरीद रही है उसे ही समाप्त न कर दिया जाये। यह बात अवश्य है कि केंद्र सरकार पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी है कि एमएसपी को समाप्त नहीं किया जाएगा लेकिन इस बात की क्या गारंटी है? तो दूसरी तरफ सरकार अब इसे भी लिखित रूप से देने के लिये तैयार है।
दूसरी बात यह है कि “किसान सशक्तिकरण एवं संरक्षण” मूल्य आश्वासन अनुबंध और कृषि सेवा विधेयक इस कानून का उद्देश्य यह है कि अनुबंधित खेती यानीकि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की आज्ञा देना है, अर्थात किसान की जमीन को एक निश्चित राशि पर पूंजीपति या ठेकेदार द्वारा किराये लेकर उसमे अपने हिसाब से फसलों का उत्पादन करके उसे बाजार में बेचेगा। लेकिन देश के किसान इस कानून का जोरदार विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उनका ऐसा कथन है कि फसल की कीमतों को तय करने व किसी तरह की विवाद उत्पन्न होने की स्थिति में यही बड़े संस्थान इसका भरपूर लाभ उठायेगी और ऐसी स्थिति में वे छोटे किसानों के साथ किसी तरह की समझौता भी नहीं करेंगी।
परन्तु यहां यह प्रश्न उठता है कि आखिरकार इसका शीघ्र से शीघ्र कोई स्थाई हल अवश्य निकाला जाना चाहिए इस परिपेक्ष में सरकार ने यह कहा कि वह इस पर एक कमेटी बना कर इसका हल निकालने का जिम्मा उसे देगी लेकिन इस पर किसानों का कथन है कि कमेटी का बनाये जाने का अर्थ यह होगा कि चीजों को लटका देना ऐसी स्थिति में अब एक ही रास्ता नजर आ रहा है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही इसका कोई हल निकाला जाना ही सभी के लिये हित कर होगा।







