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    ईद-उल-फितर के अवसर पर विशेष: खुदा रब्बुल आलमीन है!

    By June 5, 2019Updated:June 5, 2019 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    डा जगदीष गांधी

    इस्लाम शब्द का अर्थ है शान्ति : इस्लाम धर्म में अच्छा इन्सान बनने के लिए बुनियादी पांच कर्तव्यों को अमल में लाना अति आवश्यक है। पहला ईमान – अल्लाह के परम पूज्य होने का इकरार। दूसरा नमाज, तीसरा रोजा, चौथा हज और पांचवा जकात। इस्लाम के ये पांचों कर्तव्य इन्सान को इन्सान से प्रेम, सहानुभूति, सहायता तथा हमदर्दी की प्रेरणा देते हैं। इस्लाम शब्द अरबी भाषा का है। इस्लाम का अर्थ है, इताअत (दान) करना, शरण लेना, अपने-आपको ईश्वर की मर्जी पर पूरी तरह से छोड़ देना। ‘इस्लाम’ शब्द जिस मूल धातु से बना है, उसका अर्थ है- शान्ति। इस्लाम धर्म को मानने वाले जब एक-दूसरे से मिलते हैं तो कहते हैं : अस्सलाम अलैकुम जिसका अर्थ होता है- आप पर खुदा की रहमत हो। इस्लाम धर्म के मूल में भी एकता, करूणा, समता, भाईचारा और त्याग की वही सीख प्रवाहित हो रही है, जो विश्व के अन्य धर्मों के मूल में है। एक अल्लाह को मानना, सबसे भाईचारा बरतना, पसीने की कमाई खाना, सदाचार का पालन करना – इस्लाम के रसूल हजरत मोहम्मद साहब का यह आदेश है।

    वही सच्चा मुसलिम है जो अल्ला की शिक्षाओं पर ईमान लाता है :

    इस्लाम धर्म में ऐसा माना गया है कि जो आदमी नीचे लिखी पाँच बातों पर ईमान लाता है तथा इन पर
    विश्वास करता है, वही मुसलिम, वही ईमानवाला है :- (पहला) अल्लाह पर ईमान, (दूसरा) अल्लाह की किताबों पर ईमान, (तीसरा) फ़रिश्तों पर ईमान (चौथा) रसूलों पर ईमान (पांचवा) आखिरत पर ईमान – हम जीवन में जो भले- बुरे काम करते हैं, उनका फल हमें एक दिन भोगना पड़ेगा। एक दिन सबका न्याय होगा। उस दिन का नाम है – आखिरत। कोई नहीं जानना कि कब हमारे जीवन का अंतिम पल है। इसलिए रोजाना सोने के पूर्व अपने कर्मों का लेखा-जोखा कर लेना चाहिए।

    File Photo: आज़म हुसैन

    सारी सृष्टि को बनाने वाला परमात्मा एक ही है :

    मोहम्मद साहब का जन्म आज से लगभग 1400 वर्ष पूर्व मक्का में हुआ था। अल्पायु में अनाथ एवं
    यतीम हो जाने के कारण वे शिक्षा से वंचित रहे। केवल 12 वर्ष की आयु में वे अपने चचा के साथ व्यापार में लग गये थे। प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचानते हुए मूर्ति पूजा छोड़कर एक ईश्वर की उपासना की बात पर तथा अल्ला की राह पर चलने के कारण मोहम्मद साहब को मक्का में अपने नाते-रिश्तेदारों, मित्रों तथा दुष्टों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा और 13 वर्षों तक मक्का में वे मौत के साये में जिऐ। जब वे 13 वर्ष के बाद मदीने चले गये तब भी उन्हें मारने के लिए कातिलों ने मदीने तक उनका पीछा किया।

    खुदा रब्बुल आलमीन है।

    मोहम्मद साहब की पवित्र आत्मा में अल्लाह (परमात्मा) के दिव्य साम्राज्य से कुरान की आयतें 23 वर्षों
    तक एक-एक करके नाजिल हुई। कुरान में लिखा है कि खुदा रब्बुल आलमीन है। आलमीन के मायने सारी सृष्टि
    को बनाने वाला अल्लाह एक ही है। अर्थात खुदा सारी सृष्टि को बनाने वाला है तथा इस संसार के सभी इन्सान
    एक खुदा के बन्दे और भाई-भाई हैं। इसलिए हमें भी मोहम्मद साहब की तरह अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की
    इच्छा और प्रभु की आज्ञा का पालन करते हुए प्रभु का कार्य करना चाहिए। परमात्मा ने मोहम्मद साहब के द्वारा ‘कुरान’ के माध्यम से मानव जाति को ‘भाईचारे’ का सन्देश दिया है। पवित्र कुरान में वैसे तो हजारों शिक्षायें हैं किन्तु सभी मुख्य रूप से भाईचारे पर आधारित है। मोहम्मद साहब ने जो उपदेश दिये वे ‘हदीस’ में संगृहित हैं।

    मोहम्मद साहब ने सारी मानव जाति को मिल-जुलकर रहने का संदेश दिया :

    पैगम्बर मोहम्मद ने उन बर्बर कबीलों के सामाजिक अन्याय के प्रति जिहाद करके समाज को उनसे
    मुक्त कराया। तथापि मानव जाति में भाईचारे की भावना विकसित करके आध्यात्मिक साम्राज्य स्थापित
    किया। मोहम्मद साहब का एक ही पैगाम था पैगामे भाईचारा। मोहम्मद साहब ने मक्का में जो लोग खुदा को नहीं मानते थे उनके लिए उन्होंने कहा कि वे खुदा के बन्दे नहीं हैं अर्थात वे काफिर हैं। इसी प्रकार जेहाद का मतलब अपने अंदर के शैतान को मारना है। वास्तव में मनुष्य जिस मात्रा में अल्ला की राह में स्वेच्छापूर्वक दुःख झेलता है उसी मात्रा में उसे अल्ला का प्रेम व आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    भाईचारे की राह पर चलने पर ही सारी मानव जाति की भलाई है :

    मोहम्मद साहब ने अनेक कष्ट उठाकर बताया कि खुदा के वास्ते एक-दूसरे के साथ दोस्ती से रहो।
    आपस में लड़ना खुदा की तालीम के खिलाफ है। मोहम्मद साहब की शिक्षायें किसी एक धर्म-जाति के लिए नहीं
    वरन् सारी मानव जाति के लिए है। मोहम्मद साहब की बात को मानकर जो भी भाईचारे की राह पर चलेगा उसका भला होगा। मोहम्मद साहब ने अपनी शिक्षाओं द्वारा विश्व बन्धुत्व का सन्देश सारी मानव जाति को दिया।

    अल्ला की ओर से मोहम्मद साहब पर नाजिल (अवतरित) हुई कुरान की आयतें हमें अपने अंदर की जंग जीतने का सन्देश देती है। परमात्मा की ओर से आये पवित्र ग्रन्थों की शिक्षाओं को जीवन में धारण करना ही हमारे जीवन का मकसद है। यही सच्चा जेहाद है। मुसलमान के मायने जिसका अल्ला पर ईमान सच्चा हो। केवल रफीक, अहमद आदि नाम रख लेने से कोई मुसलमान नहीं हो जाता। मुसलमान बनने के लिए अल्ला की शिक्षाओं पर चलना जरूरी है।

    सारे विश्व में शान्ति स्थापित करने के लिए उसे एकता की डोर से बांधना पड़ेगा :

    ईश्वर एक है। धर्म एक है तथा सारी मानव जाति एक है। हम सभी परमात्मा की आत्मा के पुत्र-पुत्री हैं।
    इस नाते से सारी मानव जाति हमारा कुटुम्ब है। विश्व के लोग अज्ञानतावश आपस में लड़ रहे हैं। हमें उन्हें एकता की डोर से बाँधकर एक करना है। हमें बच्चों को बाल्यावस्था से ही यह संकल्प कराना चाहिए कि एक दिन दुनियाँ एक करूँगा, धरती स्वर्ग बनाऊँगा। विश्व शान्ति का सपना एक दिन सच करके दिखलाऊँगा। परमात्मा की ओर से अवतरित पवित्र पुस्तकों का ज्ञान सारी मानव जाति के लिए हैं।

    टोटल क्वालिटी पर्सन (पूर्णतया गुणात्मक व्यक्ति) की आवश्यकता है :

    राम ने अपने जीवन द्वारा मर्यादा, कृष्ण ने गीता द्वारा न्याय, बुद्ध ने त्रिपटक द्वारा सम्यक ज्ञान
    (समता), ईशु ने बाइबिल द्वारा करूणा, मोहम्मद ने कुरान द्वारा भाईचारा, नानक ने गुरू ग्रन्थ साहिब द्वारा
    त्याग तथा बहाउल्लाह ने किताबे अकदस के द्वारा हृदय की एकता की मुख्य शिक्षायें दी हैं। यदि बच्चे
    बाल्यावस्था से ही सारे अवतारों की मुख्य शिक्षाओं को ग्रहण कर लें तो वे टोटल क्वालिटी पर्सन बन जायेंगे। इस नयी सदी में विश्व में एकता तथा शान्ति लाने के लिए टोटल क्वालिटी पर्सन (पूर्णतया गुणात्मक व्यक्ति) की आवश्यकता है।

    • लेखक वरिष्ठ शिक्षाविद एवं सीएमएस स्कूल के संस्थापक हैं।

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