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    बचपन और चाचा चौधरी का साथ

    By September 14, 2017 ब्लॉग No Comments4 Mins Read
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    अंशुमाली रस्तोगी

    बचपन इंसान की जिंदगी का सबसे ‘खूबसूरत समय’ होता है। एक तरह से जिंदगी की शुरूआत ही बचपन से होती है। थोड़ा-बहुत पढ़ने-लिखने का सिलसिला भी यहीं से शुरू होता है। बचपन की ऐसी कुछ शुरूआत, एक मेरी ही नहीं, हर किसी की रही है। बचपन के साथ गुजारी कुछ बातें, गाहे-बगाहे, याद आ ही जाती हैं। इस बहाने एक बार फिर से मन ‘बचपन की स्मृतियों’ में खो सा जाता है। यों भी, हमें हमारे बचपन को कभी भूलना नहीं चाहिए। याद करते रहना चाहिए ताकि बड़प्पन ‘बोझ’ न लगे।

    यह कहना मुश्किल है कि बचपन का हर किस्सा, हर हिस्सा मुझे अब याद है। हां, कुछ याद है और कुछ काल के गाल में समा चुका है। लेकिन जो स्मृतियों में जिंदा है, उसे ही अक्सर याद कर लिया करता हूं। बहुत ‘सुकून’ मिलता है।

    यह बचपन का वो दौर था जब हल्का-हल्का पढ़ना-लिखना शुरू ही किया था। तब स्कूल में पढ़ाई ऐसी नहीं हुआ करती थी, जैसी कि आज है। काफी कुछ ‘बेफिक्री’ रहती थी पढ़ाई और स्कूल के प्रति। मन करता था पढ़ लेते थे, नहीं करता था या तो पतंग उड़ाते, गिल्ली-डंडा खेलते या फिर प्राण चचा की कॉमिक्स के संग-साथ समय काटते। तब एक दफा स्कूल की किताबें भले ही न मिलें, इतनी चिंता नहीं रहती थी, पर हां चाचा चौधरी को पढ़े बिना- अपनी पढ़ाई जरूर अधूरी लगती थी।

    वो गर्मियों की दोपहर और चाचा चौधरी के साथ-साथ लोटपोट समां बांधे रहते थे। एक कॉमिक्स के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, तीसरी के बाद चौथी, मतलब क्रेज खत्म ही नहीं होता था- कॉमिक्स-दर-कॉमिक्स पढ़ते रहने का। और, चाचा चौधरी और साबू के प्रति इतना लगाव था कि कभी-कभी खुद में दोनों को ही महसूस कर लिया करता था। “चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है”, तब कंप्यूटर का जिक्र दिल में इतना उतावलानापन पैदा करता कि बार-बार यही प्रश्न उठता कि आखिर यह कंप्यूटर क्या बला है? और हमें कहीं दिखाई क्यों नहीं देता? हां, एक बहुत हल्की-सी प्रतिछाया कंप्यूटर की (टीवी की तरह) दिमाग में स्थापित हुई थी। तब शायद कहीं सुनने को मिला गया हो, कंप्यूटर के बारे में।

    लेकिन चाचा चौधरी के कॉमिक्स पढ़ने की दीवानगी दिलो-दिमाग पर हर समय तारी रहती थी। यहां तक कि कभी-कभार चाचा चौधरी को हम क्लास में (चुपके से) भी पढ़ लिया करते थे। गाहे-बगाहे चाचा चौधरी के तमाम चरित्रों को आपस में ही जीते थे। कोई साबू हो जाता, कोई रमन, कोई राका, कोई पिंकी, कोई श्रीमतीजी…।

    चाचा चौधरी को पढ़ने की जो बेकरारी मन में निरंतर बनी रहती थी- वो तो थी ही- पर उससे ज्यादा रहती थी किराए पर लाकर पढ़ने की। साथ-साथ यह प्रतिस्पर्धा भी कि कौन कितने कॉमिक्स दिन भर में पढ़ लेता है? कौन दुकानदार किससे कितना किराया वसूलता है? जब जेब में पैसे नहीं होते थे तब चाचा चौधरी को दोस्तों से उधार मांगकर पढ़ा करता था। या कभी जब पैसे ज्यादा हुए तो खरीद लिया। मगर किराए पर लाकर और उधार मांगकर पढ़ने का लुत्फ ही कुछ और था।

    हां, बचपन से बड़प्पन में आते-आते शौक और मनोरंजन के तरीके अवश्य बदले किंतु चाचा चौधरी और लोटपोट का क्रेज फिर भी बना रहा। चूंकि बड़प्पन बड़ी अजीब चीज होती है सो चाचा चौधरी के बीच अन्य (दूसरी) किताबों के ग्लैमर ने भी जगह बनानी शुरू कर दी। फिर पता नहीं कब मैं चाचा चौधरी के दौर से गुजरते-गुजरते फैंटसी और प्लेबॉय के दौर में चला गया। फिर कुछ जिम्मेवारी बड़े क्लास में होने की भी साथ-साथ चलती रही। हां, इन सबके बीच से निकलकर जब भी समय मिलता तो चाचा चौधरी, लोटपोट, चंपक को जरूर पढ़ता था। लगता था, दिलो-दिमाग फिर से बचपन की मस्तियों में जा रमा है। वही और उतना ही आनंद आ रहा है।

    खैर, समय तो समय होता है। उसे न पकड़ा जा सकता है न बांधा। बचपन का दौर बीता और हम बड़े हो लिए (शायद कुछ ज्यादा ही)। सोचो तो अभी भी यही लगता है कि हम बड़े क्यों हुए? क्यों बच्चे बनकर बचपन में ही नहीं रह पाए? चाचा चौधरी और साबू के साथ अपनी जिंदगी के खुशनुमा लम्हों को और क्यों नहीं जी-गुजार पाए? फिर लगता है, जो समय हमने अपने बचपन में जी लिया वो शायद सबसे यादगार था और हमेशा ही रहेगा। ऐसा हर किसी के जीवन में होता आया है।

    हां, प्राण चचा के जाने की खबर सुनकर दिल उदास जरूर हुआ किंतु मायूस नहीं। मायूस होता भी क्यों… क्योंकि प्राण चचा के चाचा चौधरी सरीखे चरित्र जो हमेशा हमारे साथ रहेंगे। अपने कार्टूनों में प्राण चचा ने हमको जो जीवंत जीवन और खूबसूरत बचपन दिया उसे कभी भूलाया नहीं जा सकता। सच में, वो हमारे समय और आज के दौर के सबसे बड़े ‘हीरो’ हैं, और हमेशा रहेंगे।

    अलविदा प्राण चचा ।

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