फूलों की घाटी में बांस के अंगारे

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  • पंकज चतुर्वेदी

पूर्वोत्तर ही नहीं, पूरे देश के सबसे खूबसूरत ट्रेकिंग इलाके और जैव विविधता की दृष्टि से समृद्ध और संवेदनशील दजुकू घाटी में 29 दिसंबर, 2020 से जो शोले भड़कने शुरू हुए, अभी भी शांत नहीं हो पा रहे हैं। 11 जनवरी, 2021 को जब आपदा प्रबंधन टीम ने यह सूचित किया कि अब कोई नई आग नहीं लग रही है, तब तक इस जंगल का 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जलकर राख हो चुका था। यह स्थान नगालैंड व मणिपुर की सीमा के करीब है। दस दिन बाद भी आग पूरी तरह शांत नहीं हुई है। यह सुरम्य घाटी दुनिया भर में केवल एकमात्र स्थान पर पाई जाने वाली दजुकू-लिली के फल के साथ अपने प्राकृतिक वातावरण, मौसमी फूलों और वनस्पतियों व जीवों के लिए जानी जाती है। गत दो दशकों के दौरान यहां यह दसवीं बड़ी आग है।

अप्रैल से सितंबर तक के मौसम में इस घाटी को ‘फूलों की घाटी’ कहा जाता है। वहीं पूरे साल यहां की घाटी व पहाड़ पर बौने बांस का साम्राज्य होता है। विदित हो बांस की यह प्रजाति पूर्वी हिमालय और उत्तर-पूर्वी भारत की दजुकू घाटी और आसपास की पहाड़ियों पर पाई जाती है। यह जंगल पूरी तरह से बौने बांस से ढके हैं, जो दूर से खुली घास के मैदान की तरह दिखाई देते हैं।

नगालैंड के जंगल में लगी आग बुझाने की कोशिश जारी, अभियान में भारतीय सेना भी  हुई शामिल - India Now24
फोटो: गूगल से साभार

प्रकृति की यह अनमोल छटा ही यहां की बर्बादी का बड़ा कारण है। बांस का जंगल इतना घना है कि कई जगह एक मीटर में सौ से पांच सौ पौधे। इस मौसम में हवा चलने से ये आपस में टकराते हैं, जिससे उपजी एक चिंगारी इस सुंदर स्थान के लिए काल बन जाती है। दजुकू घाटी और आसपास की पहाड़ियों के प्राचीन जंगलों को जंगल की आग से बड़े पैमाने पर खतरा है। यहां की अनूठी जैव विविधता जड़मूल से नष्ट हो रही है और घने जंगल के जानवर आग के ताप व धुएं से परेशान होकर जब बाहर आते हैं, तो उनका टकराव या तो इंसान से होता है या फिर हैवान रूपी शिकारी से।

इस जंगल में जब सबसे भयानक आग वर्ष 2006 में लगी थी, तो कोई 70 वर्ग किलोमीटर के इलाके में राख ही राख थी। यहां तक की जाज्फू पहाड़ी का खूबसूरत जंगल भी चपेट में आ गया था। उसके बाद जनवरी-2011, फरवरी-2012, मार्च-2017 में भी जंगल में आग लगी। नवंबर -2018 में भी जंगल सुलगे थे। इस बार की आग मणिपुर के सेनापति जिले में भी फैल गई है और राज्य की सबसे ऊंची पर्वतीय चोटी ‘माउंड इसो’ का बहुत कुछ भस्म हो गया है।

बीते दस दिनों से नगालैंड पुलिस, वन विभाग, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के साथ-साथ दक्षिणी अंगामी यूथ एसोसिएशन के सदस्य आग बुझाने में लगे है। भारतीय वायु सेना के एमआइ-15वी हेलीकाप्टर एक बार में 3,500 लीटर पानी लेकर छिड़काव कर रहे है। वहीं लगातार तेज हवा चलने से आग बेकाबू तो हो ही रही है, राहत कार्य भी प्रभावित हो रहा है।

इस समय विभिन्न संस्थाओं के दो हजार लोग आग को फैलने से रोकने में लगे है। हालांकि नगा समाज इस आग को साजिश मान रहा है। कोरोना के चलते दक्षिणी अंगामी यूथ एसोसिएशन के सदस्यों ने इस घाटी में आम लोगों के आवागमन को गत वर्ष मार्च से ही बंद किया हुआ है। नवंबर, 2018 में मणिपुर और नगालैंड सरकार के बीच हुए एक समझौते के मुताबिक, इस घाटी में प्रवेश के दो ही रास्ते खुले हैं- एक मणिपुर से, दूसरा उनके अपने राज्य से। कोरोना के समय यहां किसी का भी प्रवेश पूरी तरह रोक दिया गया था, जो अब भी जारी है।

नगा लोगों को शक है कि आग जानबूझ कर लगाई गई है व उसके पीछे दूसरे राज्य की प्रतिद्वंद्वी जनजातियां हैं। फिलहाल तो राज्य सरकार की चिंता आग के विस्तार को रोकना है। लेकिन साल दर साल जिस तरह यहां आग लग रही है, वह अकेले उत्तर-पूर्व ही नहीं, भारत देश व हिमालय क्षेत्र के अन्य देशों के लिए बड़ा खतरा है।

हालांकि भारत में तमिलनाडु से लेकर थाईलैंड तक तेजी से बढ़ते बांस और उसमें आग की घटनाओं पर नियंत्रण के लिए कई शोध हुए हैं व तकनीक भी उपलब्ध है। विडंबना है कि हमारे ये शोध पत्रिकाओं से आगे नहीं आ पाते। जंगलों की जैव विविधता पर मंडराते खतरे से उपजे कोरोना और उसके बाद पक्षियों की रहस्यमय मौत से हम सबक नहीं ले रहे और प्रकृति की अनमोल भेंट इतने प्यारे जंगलों को सहेजने के स्थायी उपाय नहीं कर पा रहे हैं।

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