इसी जुलाई के पहले सप्ताह में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद जब चीन की यात्रा पर गई तो बीजिंग में उनका रेड कार्पेट स्वागत हुआ। इस दृश्य को देखकर एकाएक सवाल उठा कि एक आर्थिक और सैनिक महाशक्ति एक पिद्दी भर के देश का लाटसाहब के रूप में स्वागत क्यों कर रहा है?
चीन ने जब से नियंत्रण आर्थिक ताकत का खिताब हासिल किया है, तब से वह विश्व बैंक की तरह की ‘‘मुक्त ऋण की खिड़की’ होने का प्रदर्शन कर रहा है। सच तो यह है कि इस समय चीन हिंद महासागर से प्रशांत और अटलांटिक तक छोटे व गरीब देशों में मुक्त ऋण की खिड़की बनकर अपनी ‘‘चेकबुक डिप्लोमेसी’ को प्रभावी बना रहा है, जिसके परिणाम भयावह होंगे। इसकी तरफ इशारा तो संयुक्त राष्ट्र संघ की एक कमेटी भी कर चुकी है।
चीन अपनी ‘‘चेकबुक डिप्लोमेसी’ के जरिए दक्षिण एशियाई देशों में ही नहीं, बल्कि पूर्वी एशियाई देशों से लेकर अफ्रीका तक घुसपैठ बना रहा है। विशेष तय यह है कि चीन इन देशों को कर्ज देते समय सच भी नहीं बोलता। 2016 में जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग बांग्लादेश की यात्रा पर गए थे तो उन्होंने बांग्लादेश को 24.45 बिलियन डॉलर के प्रोजेक्ट के लिए ऋण देने पर सहमति दी थी। ध्यान रहे कि चीन द्वारा दिया गया कर्ज ‘‘गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट’ (जीटूजी) था, लेकिन बाद में चीनी अधिकारी कहते दिखे कि बीजिंग ने यह वादा नहीं किया था।

हैरत की बात यह कि इन स्थितियों को देखने-समझने के बाद भी बांग्लादेश चीन की गोद में बैठने को उत्सुक दिख रहा है और चीन उसका रेड काप्रेट पर स्वागत कर रहा है। इसी माह के पहले सप्ताह में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद जब चीन की यात्रा पर गई तो बीजिंग में उनका रेड काप्रेट स्वागत हुआ। इस दृश्य को देखकर एकाएक सवाल उठा कि एक आर्थिक और सैनिक महाशक्ति एक पिद्दी भर के देश का लाटसाहब के रूप में स्वागत क्यों कर रहा है?
शेख हसीना की इस बीजिंग यात्रा के दौरान चीन के साथ 5 एग्रीमेंट और 3 मेमोरेंडम ऑफ अण्डरस्टैंडिंग और एक डाक्यूमेंट पर हस्ताक्षर हुए। इस चेकबुक डिप्लोमेसी की दक्षिण एशिया में मुख्य दो विशेषताएं हैं। पहली-दक्षिण एशिया के देशों में चीनी निवेश तेजी से बढ़ाकर उनकी प्राकृतिक और भौतिक पूंजी को चीन की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ना; और दूसरी चीन पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश को ऋण वित्त मुहैया कराकर उन देशों में पहले विकास को प्रोत्साहन देना और फिर कर्ज चुकता न होने पर प्रोजेक्ट्स पर कब्जा मनमाफिक सरकारों का निर्माण करना और संचालित भी करना। बांग्लादेश इसकी नई बानगी बनता दिख रहा है।
बांग्लादेश और चीन के रिश्तों में वर्ष 2016 एक टर्निग प्वाइंट की तरह है। इस वर्ष से दोनों के रिश्ते पारंपरिक साझेदारी से रणनीतिक साझेदारी में बदल गए। इसका परिणाम हुआ कि जिनपिंग के बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) के हिस्से के रूप में बीजिंग और ढाका ने 21.5 बिलियन डॉलर की डील कर ली जो पावर और बेसिक इंफ्रा क्षेत्र को कवर करेगी। पद्मा ब्रिज को चीनी कंपनी बना रही है और चीन का एक्जिम बैंक उसे रेल लिंक के निर्माण के लिए 3 बिलियन डॉलर दे रहा है।
अब बीजिंग ढाका पर बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार (बीसीआईएम) इकोनॉमिक कॉरिडोर को गति देने के लिए दबाव बना रहा है जो अब तक टेक ऑफ करने में असफल रहा है। यही नहीं बांग्लादेश 2030 तक 100 स्पेशल इकोनॉमिक जोन (एसईजेड) स्थापित करने की योजना बना रहा है। जाहिर है कि यह चीन के लिए बड़ा अवसर है। यही वजह है कि बहुत सी चीनी कंपनियां इनमें निवेश को तैयार हैं जिनमें से झेजियांग जिंदून प्रेसर वेसल कंपनी ने चटगांव साइट के निकट 5 बिलियन डॉलर निवेश का प्रस्ताव भी दे दिया है। इतना ही नहीं बांग्लादेश अब साल 2022 तक 24 हजार मेगावॉट बिजली उत्पादन के अपने महत्वाकांक्षी ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करने के लिए चीन पर निर्भर हो रहा है।
आज दक्षिण एशिया में बांग्लादेश पाकिस्तान के बाद दूसरा सबसे बड़ा चीनी निवेश प्राप्तकर्ता बन चुका है। कुल मिलाकर न केवल बांग्लादेश के चटगांव या पायरा डी बल्कि हंबनटोटा, ग्वादर, मंडेब चीनी स्ट्रेटेजिक डेस्टिनेशंस हैं, जिनके जरिए वह अपनी आर्थिक एवं साम्राज्यीय महत्त्वाकांक्षाएं पूरी करने कोशिश कर रहा है। इन डेस्टिनेशंस को कनेक्ट करने के लिए ही चीन ‘‘वन बेल्ट, वन रोड’ प्रोजेक्ट के लिए प्रतिबद्ध है। इससे एक बात तो साफ दिख रही है कि भारत अपनी नेबरहुड फस्र्ट नीति में असफल हो रहा है जबकि चीन ‘‘इनसर्कल टू इंडिया नीति’ में बहुत हद तक सफल। कल्पना की जा सकती है कि आने वाले दिन कैसे रहने वाले हैं।
- रहीस सिंह







