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    आइए, प्रेमचंद को याद किया जाए

    By July 30, 2017 ब्लॉग No Comments4 Mins Read
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    अंशु माली रस्तोगी

    मेरी आदत है। हर रोज मैं किसी न किसी लेखक-साहित्यकार को याद कर लेता हूं। याद करने में कोई बुराई नहीं। दिल का दिल बहल जाता है। लेखक-साहित्यकार भी प्रसन्न हो लेते हैं। कि, इस भीषण डिजिटल समय में किसी ने हमें याद तो किया। यों, ईश्वर, खुदा, गॉड को तो हम 24X7 याद करते ही रहते हैं।

    आज सुबह से थोड़ी दुविधा में था। समझ नहीं पा रहा था। किस महान साहित्यकार को याद किया जाए। जिन बड़े साहित्यकारों के नाम मानस-पटल पर तैर रहे थे, उन सबको पहले ही याद कर चुका था। याद करने का मेरा एक उसूल है। मैं उन लेखकों-साहित्यकारों को दोबारा याद नहीं करता, जिन्हें पहले याद कर लिया गया है। सबको बराबर का सम्मान मिलना चाहिए। चिटिंग नहीं।

    टाइम गुजरा जा रहा था। किंतु कोई ऊंचा नाम दिमाग नहीं घुस रहा था। खैर, मैंने अपने दिमाग को कुछ देर के लिए शांत और अकेला छोड़ दिया। अन्य कामों में व्यस्त हो गया। तभी अचानक से मशहूर कहानीकार प्रेमचंद का ध्यान हो आया। जुलाई अंत में प्रेमचंद हमें यों भी ध्यान आ ही जाते हैं। बिना देरी किए मैंने अपने ध्यान को तुरंत प्रेमचंद की याद में तब्दील कर दिया। और प्रेमचंद को याद करने बैठ गया।

    बचपन से लेकर अब तक जितनी भी प्रेमचंद की कहानियों को पढ़ा या उनके बारे में जाना-समझा धीरे-धीरे कर सब याद आता चला गया। प्रेमचंद पर छिड़ी तमाम साहित्यिक बहसें याद आईं। अखबारों-पत्रिकाओं के प्रेमचंद अंक/विशेषांक याद आए। बीच-बीच में प्रेमचंद पर लिखा खुद का भी याद कर लिया। उन्हें भी याद किया जो प्रेमचंद के धुर विरोध रहे। हर वक्त इसी बात का रोना रोते रहे कि प्रेमचंद का साहित्य दलितों के प्रति अनुकंपा भरा रहा। प्रेमचंद का साहित्य सवर्ण लॉबी को बिलोंग करता था। आदि-इत्यादि।

    प्रेमचंद को याद करने का सिलसिला चल ही रहा था कि अचानक ऐसा महसूस टाइप हुआ कि कान में कोई बोला- मैं प्रेमचंद। याद करने के बीच कोई टोक-टाक दे तो बड़ी खीझ होती है। खैर, मैंने एवॉइड किया। होगा शरारती कोई। कुछ क्षण बाद वही आवाज पुनः कानों में गुंजी- मैं प्रेमचंद। अब तो टू मच हो गया था। गुस्सा सातवें आसमान पर। याद का ध्यान स्थागित कर आंखें खोलीं, देखा साक्षात प्रेमचंद सामने। भले ही आत्मा के तौर पर हों। आंखें खुली की खुली रह गईं। याद और ध्यान घुईयां के खेत में घुस गए।

    इतने ऊंचे साहित्यकार को सामने पाकर भला किसके होश फाख्ता न होंगे। फॉमर्ल हुए बिना मैंने उनसे डाइरेक्ट पूछ लिया- ‘सर, आप यहां? वो भी मेरे सामने?’ प्रेमचंद थोड़ा मुस्कुराए। फिर बोले- ‘क्यों? मैं नहीं आ सकता यहां?’ मैंने कहा- ‘नहीं। नहीं। सर। आपका घर है। जब चाहें तब आएं। मुझेखुशी ही  होगी।‘

    फिर हम दोनों के बीच बातचीत चल निकली। प्रेमचंद ने पूछा- ‘क्यों, मुझे याद कर रहे थे?’ मैंने कहा- ‘हां। आप ही को।‘ वे पुनः थोड़ा मुस्कुराए। बोले- ‘अच्छा है। यों भी, साहित्यिक और सभा-गोष्ठियों वाले मुझे मेरी जयंती पर ही याद किया करते हैं। याद भी क्या करते हैं। रस्म-अदायगी टाइप को जाती है मेरे नाम और काम को लेकर।‘

    मैंने कहा- ‘सर, आपका साहित्य में नाम ही इतना बड़ा है कि हर याद आपके सामने बौनी है। जो आप रच गए वो अमिट और अनंत है।‘ चेहरे पर हल्की-सी गंभीरता लाते हुए प्रेमचंद ने कहा- ‘छोड़ो यार। सब बातें हैं। कुछ लोग मेरी जयंती पर मुझे इसीलिए भी याद कर लेते हैं ताकि उनकी साहित्यिक गोष्ठियों की दुकानें चलती रहें। चलो, मैं तो निपट लिया। इस बहाने तुम लोग मुझे याद कर लेते हो। किंतु, जो वरिष्ठ साहित्यकार अभी मौजूद हैं, उन्हें कितना याद किया जाता है? बताओ जरा।‘

    कह तो प्रेमचंद सही रहे थे। याद करना तो महज अब रस्म-अदायगी ही है। ‘फिर भी, इस बहाने किसी को याद कर लेने में क्या बुराई है? आजकल लोगों के पास टाइम ही कहां है। खुद के बारे में ही सोच लें तो बहुत है।‘ यह कहकर मैंने मैंने प्रेमचंद को समझाने की कोशिश की।

    उन्होंने हमारे द्वारा उन्हें याद करने को ज्यादा दिल पर तो नहीं लिया। मगर थोड़ा दुखी तो थे ही। उनका दुखी होना स्वभाविक था। लेकिन यह भी सच है कि आज सबकुछ ‘उनके समय’ जैसा तो नहीं हो सकता न।

    नई-पुरानी तमाम बातें उनके साथ हुईं। टाइम अधिक हो चला था। अब उनके जाने का समय था। जाते-जाते वे इतना जरूर कह गए- ‘रस्मी ही सही तुम लोग मुझे याद कर रहे हो काफी है। मेरी याद को यों ही बनाए रखना आगे भी।‘

    चिकोटी से साभार

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