Close Menu
Shagun News India
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Sunday, October 25
    Shagun News IndiaShagun News India
    Subscribe
    • होम
    • इंडिया
    • उत्तर प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • राजस्थान
    • खेल
    • मनोरंजन
    • ब्लॉग
    • साहित्य
    • पिक्चर गैलरी
    • करियर
    • बिजनेस
    • बचपन
    • वीडियो
    • NewsVoir
    Shagun News India
    Home»खबर कोर्ट से

    अदालतों के कंधे पर मुकदमों का बोझ

    By August 12, 2018 खबर कोर्ट से No Comments8 Mins Read
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Share
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Post Views: 599
    पंकज चतुर्वेदी

    दिल्ली से सटे गाजियाबाद में बीते एक सप्ताह से वकील अदालत में काम नहीं कर रहे हैं। अनुमान है कि हर दिन 100 से अधिक मामले फैसले के लिए टलते जा रहे हैं, जमानत और मामूली धारा वाले मामलों को तो कोई ध्यान नही नहीं रख रहा। कोई वकील साहब ढाबे में खाना खा रहे थे और गरम रोटी देने को लेकर विवाद हुआ। पुलिस वालों ने वकील साहब को पीट दिया, उसके बाद वकील हाथों में डंडे ले कर पुलिस कप्तान के पास पहुंच गए, रास्ता जाम किया। उसके बाद पुलिस ने वकीलों पर लाठी चला दी। वकील सिटी एसपी पर कार्यवाही के लिए अड़े हैं। इस तरह देखते ही देखते कुछ हजार प्रकरणों का बोझ यहां दिन दुगना-रात चौगुना हो रहा है। देष के 6़00 से अधिक जिला अदालतों में ऐसी घटनाएं होती ही रहती हैं और न्याय का मंदिर पेंडिंग मामलों का अंबार बनता जाता है।

    बीते एक साल में तीन बार देश की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश ने सरकार से अदालतों में बढते मुकदमे के बोझ तथा जजों की कमी पर गंभीरता से गौर करने के लिए सार्वजनिक बयान दिया है। देश की सबसे बड़ी अदालत- सुप्रीम कोर्ट, लंबित मामलों की संख्या 54,864, हाई कोर्ट – पेंडिंग मुकदमें – 40 लाख साठ हजार 709। देश में सर्वाधिक मामले निचली अदालतों में लंबित है, जहां इनकी संख्या करीब पौने तीन करोड़ है। यदि इसी गति से मुकदमों का निबटान होता रहा तो 320 साल चाहिए। इस बीच अदालतों में भ्रश्टाचार का मामला भी खूब उछल रहा है।  दूसरी तरफ आए रोज ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिसमें शिक्षित लोग कानून अपने हाथों में ले कर खुद ही न्याय करना चाहते हैं। लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था तीसरा स्तंभ है और उसकी ऐसी जर्जर हालत पूरे तंत्र को कमजोर कर रही है। ऐसे में अदालतों के सामाजिक सरोकार पर विचार होना जरूरी है।

    यदि विधि मंत्रालय के आंकड़ों पर ही भरोसा करें तो हमारे यहां आबादी की तुलना में न्यायाधीशों का अनुपात प्रति 10 लाख पर 17.86 न्यायाधीशों का है। मिजोरम में यह अनुपात सर्वाधिक है। वहां प्रति 10 लाख पर 57.74 न्यायाधीश हैं। दिल्ली में यह अनुपात 47.33 है और देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में प्रति 10 लाख आबादी पर मात्र 10.54 न्यायाधीश हैं। पश्चिम बंगाल में न्यायाधीशों का यह अनुपात सबसे कम है। वहां प्रति 10 लाख की आबादी पर सिर्फ 10.45 न्यायाधीश हैं। कोई भी जज हर साल 2600 से ज्यादा मुकदमों का निबटारा नहीं कर पाता , जबकि नए दर्ज मालों की संख्या इससे कहीं अधिक होती है। दरअसल, ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या संसद द्वारा कानून बनाकर ही बढ़ाई जा सकती है। विडंबना तो यह है कि काम के बोझ को देखते हुए नई नियुक्तियां तो हो नहीं रहीं, हां कुल स्वीकृत पदों पर भी जज आसीन नहीं है। देश के 24 उच्च न्यायालयों में फिलहाल 43 फीसद नियुक्तियां खाली पड़ी हैं।

    जहां इन अदालतों में जजों की संख्या 1044 होनी चाहिए थी, वहीं अभी यह संख्या केवल 599 है। सर्वाेच्च न्यायलय में 3 पद रिक्त हैं। इन रिक्तियों के बढ़ने का एक कारण एनजेएसी के गठन पर विवाद भी रहा, क्योंकि जब तक यह मामला लंबित रहा, तब तक कोई भी नियुक्ति नहीं हुई और जब कोलेजियम प्रणाली बहाल कर दी गई, तब भी समन्वय की कमी के चलते नियुक्तियां लटक जाती हैं। सर्वाेच्च न्यायलय में 2008 के संशोधन अधिनियम के द्वारा संख्या बढाकर 30 कर दी गई थी, लेकिन वर्तमान में सर्वाेच्च न्यायलय में 27 न्यायाधीश ही नियुक्त हैं, हालांकि पिछले कुछ समय से सर्वाेच्च अदालत पर मुकदमों का बोझ कम करने के लिए एक राष्ट्रीय अपील न्यायालय के गठन पर विचार चल रहा है, लेकिन यदि इस अपीलीय न्यायलय का गठन किया गया तब भी अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति करनी होगी।

    देश की सड़कों पर आए रोज अपराध होने के बाद न्याय दिलवाने के लिए सड़कों पर गुस्सा भले ही महज पुलिस या व्यवस्था का विरोध नजर आ रहा हो, हकीकत में यह हमारी न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है – लोग अब महसूस कर रहे हैं कि देर से मिला न्याय अन्याय के बराबर ही है। यह बात भी लोग अब महसूस कर रहे हैं कि हमारी न्याय व्यवस्था में जहां अपराधी को बचने के बहुत से रास्ते खुले रहते हैं, वहीं पीड़ित की पीड़ा का अनंत सफर रहता है। हाल ही में देष की सुप्रीम कोर्ट ने हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली पर ही सवाल खड़े करते हुए कहा है कि  निचली अदालतों के दोषी को दी जाने वाली सजा के निर्धारण के लिए कोई विधायी या न्यायिक दिशा-निर्देशना होना हमारी न्याय प्रणाली की सबसे कमजोर कड़ी है। कई मामले पहले दस साल या उससे अधिक निचली अदालत में चलते हैं फिर उनकी अपील होती रहती है। कुछ मिला कर एक उम्र बीत जाती है, न्याय की आस में वहीं लंपट और पेशेवर अपराधी न्याय व्यवस्था की इस कमजोरी का फायदा उठा कर कानून से बैखोफ बने रहते हैं।
    भले ही हमारी न्याय व्यवस्था में लाख खामियां हैं, अदालतों में इंसाफ की आस कभी-कभी जीवन की संशय से भी दूर हो जाती है । इसके बावजूद देश को विधि सममत तरीके से चलाने के लिए लोग अदालतों को उम्मीद की आखिरी किरण तो मानते ही हैं । बीते कुछ सालों से देष में जिस तरह अदालत के निर्देशों पर सियासती दलों का रूख देखने को मिला हैै, वह न केवल शर्मनाक है, बल्कि इससे संभावना जन्म लेती है कि कहीं पूरे देश का गणतंत्रात्मक ढ़ांचा ही पंगु न हो जाए।
    यह विडंबना है कि देश का बहुत बड़ा तबका थोडे़ से भी न्याय की उम्मीद न्यायपालिका से कर ही नहीं पाता है। गरीब लोग तो न्यायालय तक पहुंच ही नहीं पाते। इसकी औपचारिकताओं और जटिल प्रक्रियाओं के कारण केवल वकीलों द्वारा ही न्यायालय में बात कही जा सकती है, लेकिन गरीब लोग वकीलों की बड़ी-बड़ी फीसें नहीं दे सकते, वे न्याय से वंचित रह जाते हैं। जो कुछ लोग न्यायालय तक पहुंच पाते हैं उन्हें यह उम्मीद नहीं होती कि एक निष्चित समयावधि में उनके विवाद का निपटारा हो पाएगा। मुकदमे के निर्णय में जितने समय की सजा दी जाती है उससे ज्यादा समय तो मुकदमों की सुनवाई में ही लग जाता है। अगर इस दौरान मुवक्किल जेल से बाहर हुआ तो इस सारे मुकद्मे के दौरान अपने को बचाने की कवायद की परेशानी और सजा से ज्यादा खर्चे और जुर्माना ही कष्टदायी हो जाता है। पुलिस और प्रभावशाली लोग न्यायिक प्रक्रिया को और भी ज्यादा दूरूह बना रहे हैं क्योंकि प्रभावशाली लोग पुलिस को अपने इशारों पर नचाते हैं और उन लोगों को डराने धमकाने और चुप कराने के लिए पुलिस का इस्तेमाल करते हैं जो अत्याचारी और शोशणपूर्ण व्यवस्था को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। एक तरफ न्याय प्रक्रिया जटिल है तो दूसरी ओर वकील या अदालतों पर कोई जिम्मेदारी या समयबद्धता का दवाब नहीं है। देशभर की अदालतों में वकील साल में कई दिन तो हडताल पर ही रहते हैं, यह जाने बगैर कि एक पेशी चूकने से उनके मुवक्किल की न्याय से दूरी कई साल की बढ़ जाती है। यह भी कहना गलत ना होगा कि बहुत से मामलों में वकील खुद ज्यादा पेशी की ज्यादा फीस के लालच में केस को खींचते रहते हैं।
    देश की बड़ी और घनी आबादी, भाशाई, सामाजिक और अन्य विविधताओं को देखते हुए मौजूदा कानून और दंड देने की प्रक्रिया पूरी तरह असफल रही है। ऐसे में कुछ सिनेमा याद आते हैं- 70 के दशक में एक फिल्म में हत्या के लिए दोषी पाए गए राजेश खन्ना को फरियादी के घर पर देखभाल करने के लिए रखने पर उसका ह्दय परिवर्तन हो जाता है। अभिषेक बच्चन की एक फिल्म में बड़े बाप के बिगड़ैल युवा को एक वृद्धाश्रम में रह कर बूढ़ों की सेवा करना पड़ती है। वैसे पिछले साल दिल्ली में एक लापरवाह ड्रायवर को सड़क पर खड़े हो कर 15 दिनों तक ट्राफिक का संचालन करने की सजा वाला मामला भी इसी श्रंखला में देखा जा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य कि ऐसी व्यावहारिक सजा को बाद में बड़ी अदालत ने कानून सम्मत ना मानते हुए रोक लगा दी थी। मोटर साईकलों पर उपद्रव काटने वाले सिख युवकों को कुछ दिनों के लिए गुरूद्वारे में झाड़ू-पोंछा करने का सजा की भी समाज में बेहद तारीफ हुई थी।
    क्या यह वक्त नही आ गया है कि लिखे कानून के बनिस्पत सुधार के लिए जरूरी कदमों या अपराध-निवारण को अपनाया जाए ? आज की न्यायीक व्यवस्था बेहद महंगी, डरावनी, लंबी खिंचने वाली है। गरीब लोग तो अदालतों की प्रक्रिया में सहभागी ही नहीं हो पाते हैं। उनके लिए न्याय की आस बेमानी है। साक्ष्य अधिनियम को सरल बनाना, सात साल से कम सजा वाले मामलों में सयब़ नीति बनाना, अदालतों में बगैर वकील की प्रक्रिया को प्रेरित करना, हडताल जैसी हालत में तारीख आगे बढवाने की जगह वकील को दंडित करना जैसे कदम अदालतों के प्रति आम आदमी के विश्वास को बहाल करने में मददगार हो सकते हैं। ऊंची फीस लेने वाले वकीलों का एक वर्ग ऐसी सिफारिशों को अव्यावहारिक और गैरपारदर्शी या असंवदेनशील करार दे सकता है, लेकिन देश भर में सड़कों पर उतरे लोगों की भावना ऐसी ही है और लोकतंत्र में जनभावना ही सर्वोपरि होती है।

    Keep Reading

    Major relief for actor Rajpal Yadav from the Supreme Court in a cheque bounce case; court orders the release of his passport.

    चेक बाउंस मामले में अभिनेता राजपाल यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, पासपोर्ट रिलीज करने का आदेश

    नीले ड्रम’ हत्याकांड पर आया फैसला : जैसी करनी, वैसी भरनी

    अकीदा बनाम अंधविश्वास: पक्के विश्वास और भटकती भीड़ की दास्तान

    नालसा का एलएडीसी सिस्टम खत्म करने का फैसला: क्या गरीब कैदियों से छिन जाएगा न्याय का सहारा?

    Nepal Flood Tragedy: The Most Harrowing Incident of Devastation

    नेपाल बाढ़ त्रासदी: तबाही का सबसे दर्दनाक हादसा

    रक्षाबंधन: परंपरा, पहचान और बाजारवाद का संगम

    Leave A Reply Cancel Reply

    Advertisment
    Google AD
    We Are Here –
    • Facebook
    • Twitter
    • YouTube
    • LinkedIn

    EMAIL SUBSCRIPTIONS

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    About



    ShagunNewsIndia.com is your all in one News website offering the latest happenings in UP.

    Editors: Upendra Rai & Neetu Singh

    Contact us: editshagun@gmail.com

    Facebook X (Twitter) LinkedIn WhatsApp
    Popular Posts
    In the age of AI, providing accurate news is more important than rushing.

    एआई के दौर में जल्दबाजी नहीं, सही खबर देना जरूरी : विशाल सिंह

    October 24, 2026
    Anupam Kher’s story will travel from the glitz of fashion to the Himalayas.

    फैशन की चमक से हिमालय तक पहुंचेगी अनुपम खेर की कहानी

    October 24, 2026

    “मेड इन रशिया” फोरम का मुख्य विषय उच्च प्रौद्योगिकी होगा

    October 24, 2026
    2nd KN Singh Memorial Cricket Tournament: Hosts Vivekananda Modern Academy defeat SR International

    दूसरा केएन सिंह स्मारक क्रिकेट टूर्नामेंट: मेजबान विवेकानंद मॉडर्न एकेडमी ने एसआर इंटरनेशनल को दी शिकस्त

    October 22, 2026

    भारतीय विशेषज्ञों ने BRICS+ फैशन समिट में AI और कारीगरी पर की चर्चा

    October 21, 2026

    Subscribe Newsletter

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    Privacy Policy | About Us | Contact Us | Terms & Conditions | Disclaimer

    © 2026 ShagunNewsIndia.com | Designed & Developed by Krishna Maurya

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

    Newsletter
    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading