विनायक राजहंस
किसान के तमाम मित्रों में “ढैंचा” भी एक अनन्य मित्र है। यह दलहनी फसल हरी खाद या जैविक खाद की सबसे अच्छी स्रोत होती है। मई जून के महीने में, जब बारिश होनी शुरू हो जाती है, तब ढैंचा खेतों में आश्रय पाता है और धरती का हरियाला बन्ना बन जाता है। ऐसा लगता है जैसे जमीन पर हरी चादर बिछा दी गई हो।
किसान यूरिया या अन्य रासायनिक खादों पर निर्भर न रहे तथा खेत के पोषक तत्वों में बढ़ोतरी हो, इसे लेकर कृषि विभाग खेत में ढैंचा लगवाने को प्रोत्साहित और अनुदानित करता है।

ढैंचा के बीज को खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। बीज को बोने के बाद लगभग 40 से 45 दिनों के बीच पौध को पलट देते हैं। हरी पत्तियां और डंठल गलने के बाद खाद बन जाती है। आम तौर पर इसका प्रयोग खरीफ की फसल में किया जाता है। कृषि वैज्ञानिक कहते हैं, किसान अगर फसल चक्र नहीं अपनाए तो उन्हें धान लगाने से पहले खेत में ढैंचा की बुवाई करना चाहिए।
थोड़ा तफसील में बात करें तो हरी खाद उस सहायक फसल को कहते हैं, जिसकी खेती मिट्टी में पोषक तत्त्वों को बढ़ाने और उसमें जैविक पदाथों की पूर्ति करने के लिए की जाती है। मई जून के महीने में ढैंचा और सनई जैसी हरी खाद की बुवाई की जाती है। खेत में सनई या ढैंचा लगा देने से किसानों को अगली फसल के लिए अच्छी हरी खाद मिल जाती है। इनकी जड़ों में राइजोबियम नाम का जीवाणु होता है, जो मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाता है।”
वर्तमान समय में खेती में रसायनिक उर्वरकों के बेतहाशा इस्तेमाल और सीमित उपलब्धता को देखते हुए पोषक तत्वों के अन्य विकल्प भी उपयोग में लाना आवश्यक हो गया है। तभी हम खेती की लागत को कम कर फसलों की उपज बढ़ाने के साथ ही मिट्टी की उर्वराशक्ति को भी भविष्य के लिए बरकरार रख सकेंगे।







