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    Home»धर्म

    साई सबकी झोली भरते हैं…याद करके तो देखिए

    By April 20, 2018 धर्म No Comments5 Mins Read
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    अन्नदान के बिना सभी दान वैसे ही अपूर्ण हैं, जैसे कि चन्द्रमा बिना तारे, भक्तिरहित भजन, सिन्दूर बिना सुहागिन, मधुर स्वरविहीन गायन, नमक बिना पकवान। जिस प्रकार अन्य भोज्य पदार्थों में दाल उत्तम समझी जाती है, उसी प्रकार समस्त दानों में अन्नदान श्रेष्ठ है। साई बाबा अल्पाहारी थे और वे थोड़ा बहुत जो कुछ भी खाते थे, वह उन्हें केवल दो गृहों से ही भिक्षा में उपलब्ध हो जाया करता था।

    मानव धर्म-शास्त्र में भिन्न-भिन्न युगों के लिए भिन्न-भिन्न साधनाओं का उल्लेख किया गया है। सतयुग में तप, त्रेता में ज्ञान, द्घापर में यज्ञ और कलयुग में दान का विशेष माहातम्य है। सब दानों में अन्नदान को श्रेष्ठ माना गया है। जब दोपहर के समय हमें भोजन प्राप्त नहीं होता, तब हम विचलित हो जाते हैं. ऐसी ही स्थिति में अन्य प्राणियों को अनुभव कर जो भिक्षुक या भूखे को भोजन देता है। वही श्रेष्ठ दानी है। जब कोई अतिथि दोपहर के समय घर आता है तो हमारा कर्तव्य होता है कि हम उसका अभिनंदन कर उसे भोजन कराएं। अन्य दान जैसे-धन, भूमि और वस्त्र इत्यादि देने में तो पात्रता का विचार करना पड़ता है, लेकिन अन्न के लिए विशेष सोच-विचार की आवश्यकता नहीं है। दोपहर के समय कोई भी आपके द्वार पर आए, उसे शीघ्र भोजन कराना हमारा परम कर्त्तव्य है। लूले, लंगड़े, अन्धे या भिखारियों को, हाथ-पैर से स्वस्थ लोगों को और उन सभी के बाद अपने संबंधियों को भोजन कराना चाहिए। अन्य सभी की अपेक्षा पंगुओं को भोजन कराने का महत्व अधिक है।

    साई बाबा अल्पाहारी थे और वे थोड़ा बहुत जो कुछ भी खाते थे, वह उन्हें केवल दो गृहों से ही भिक्षा में उपलब्ध हो जाया करता था, लेकिन जब उनके मन में सभी भक्तों को भोजन कराने की इच्छा होती तो प्रारम्भ से लेकर अन्त तक संपूर्ण व्यवस्था वे स्वयं किया करते थे। वे किसी पर निर्भर नहीं रहते थे। वे स्वयं बाजार जाकर सब वस्तुएं नगद दाम देकर खरीद लाया करते थे। यहां तक कि पीसने का कार्य भी वे स्वयं ही किया करते थे। मस्जिद के आंगन में ही एक भट्टी बनाकर उसमें अग्नि प्रज्ज्वलित करके हांडी के ठीक नाप से पानी भर देते थे। कभी वे मीठे चावल बनाते, कभी-कभी दाल और मुटकुले भी बना लेते थे। पत्थर की सिल पर महीन मसाला पीस कर हांडी में डाल देते थे। भोजन रुचिकर बने, इसका वे पूरा प्रयास करते थे।

    ज्वार के आटे को पानी में उबाल कर उसमें छांछ मिलाकर अंबिल (आमर्टी) बनाते और भोजन के साथ सब भक्तों को समान मात्रा में बांट देते थे। भोजन ठीक बन रहा है या नहीं, यह जानने के लिए वे निर्भयता से उबलती हांडी में हाथ डाल देते और उसे चारों ओर घुमाया करते थे. ऐसा करने पर भी उनके हाथ पर न कोई जलन का चिन्ह और न चेहरे पर ही कोई व्यथा की रेखा प्रतीत हुआ करती थी। जब पूर्ण भोजन तैयार हो जाता, तब वे मस्जिद में बर्तन मंगाकर मौलवी से फातिहा पढ़ने को कहते थे, फिर वे म्हालसापति तथा तात्या पाटिल का प्रसाद रखकर शेष भोजन गरीब और अनाथ लोगों को खिलाकर उन्हें तृप्त करते थे। कितने भाग्यशाली थे वे, जिन्हें बाबा के हाथ का बना और परोसा हुआ भोजन खाने का मिला।

    Image may contain: one or more peopleयहां कोई यह शंका कर सकता है कि क्या वे शाकाहारी और मांसाहारी भोज्य पदार्थों का प्रसाद सभी को बांटा करते थे। यह एक अति पुरातन अनुभूत नियम है कि जब गुरुदेव प्रसाद वितरण कर रहे हों, अगर उस समय कोई शिष्य उसेे ग्रहण करने में शंकित हो जाए तो उसका पतन हो जाता है। यह अनुभव करने के लिए कि शिष्यगण इस नियम का किस अंश तक पालन करते हैं, वे कभी-कभी परीक्षा भी ले लिया करते थे। उदाहरणार्थ एकादशी के दिन उन्होंने दादा केलकर को कुछ रुपये देकर मांस खरीद लाने को कहा। दादा केलकर पूरे कर्मकांडी थे और प्रायः सभी नियमों का जीवन में पालन किया करते थे। उनकी यह दृढ़ भावना थी कि द्रव्य, अन्न और वस्त्र इत्यादि गुरु को भेंट करना पर्याप्त नहीं है। केवल उनकी आज्ञा ही शीघ्र कार्यान्वित करने से वे प्रसन्न हो जाते हैं। यही उनकी दक्षिणा है। दादा शीघ्र कपड़े पहन कर एक थैला लेकर बाजार जाने के लिए तैयार हो गए। तब बाबा ने उन्हें वापस बुला लिया और कहा कि तुम न जाओ, अन्य किसी को भेज दो। दादा ने अपने नौकर पांडू को इस कार्य के निमित्त भेजा। उसको जाते देखकर बाबा ने उसे भी वापस बुलाने को कहकर यह कार्यक्रम स्थगित कर दिया।

    ऐसे ही एक अन्य अवसर पर उन्होंने दादा से कहा कि देखो तो नमकीन पुलाव कैसा पका है। दादा ने यों ही मुंह देखी और कह दिया कि अच्छा है. तब वे कहने लगे कि तुमने न अपनी आंखों से ही देखा है और न जिह्वा से स्वाद लिया, फिर तुमने यह कैसे कह दिया कि उत्तम बना है। थोड़ा ढक्कन हटाकर तो देखो. बाबा ने दादा की बांह पकड़ी और बलपूर्वक बर्तन में डालकर बोले-थोड़ा सा इसमें से निकालो और अपना कट्टरपन छोड़कर चख कर देखो। जब मां का सच्चा प्रेम बच्चे पर उमड़ आता है, तब मां उसे दुलारती है, परन्तु उसका चिल्लाना या रोना देखकर वह उसे अपने हृदय से लगाती है। इसी प्रकार बाबा ने सात्विक मातृ प्रेम के वश होकर दादा का इस प्रकार हाथ पकड़ा। यथार्थ में कोई भी सन्त या गुरु कभी भी अपने कर्मकांडी शिष्य को वर्जित भोज्य के लिए आग्रह करके अपनी अपकीर्ति कराना पसन्द नहीं करेगा।

    इस प्रकार यह हांडी का कार्यक्रम सन 1910 तक चला और फिर स्थगित हो गया। दासगणू ने अपने कीर्तन द्वारा समस्त मुंबई प्रांत में बाबा की अधिक कीर्ति फैली। फलतः इस प्रान्त से लोगझुंड के झुंड शिरडी आने लगे और थोड़े ही दिनों में शिरडी पवित्र तीर्थ-क्षेत्र बन गया। भक्तगण बाबा को नैवेद्य अर्पित करने के लिए नाना प्रकार के स्वादिष्ट पदार्थ लाते थे, जो इतनी अधिक मात्रा में एकत्र हो जाता था कि फकीरों और भिखारियों को सन्तोषपूर्वक भोजन कराने पर भी बच जाता था। साई की लीला अपरंपार है और उनके दर से कोई खाली नहीं जाता।.साभार

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