मेरी भावनाएं पता नहीं कैसे आहत ही नहीं होती हैं !

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अंशुमाली रस्तोगी

भावनाएं चारों तरफ आहत हो रही हैं। किसी की ज्यादा, किसी की कम। भावनाएं भी इतना नाजुक हो गई हैं कि बात-बात पर आहत हो बैठती हैं। सोचती ही नहीं कि कब किस बात पर आहत होना है। बस आहत होने से मतलब। कुछ की भावनाएं तो इस बात पर ही आहत हो जाती हैं कि व्हाट्सएप पर संदेश देखने के बाद भी जवाब क्यों नहीं दिया। तो कुछ की इस बात पर कि शादी को एक साल हुआ अभी तक कोई ‘गुड न्यूज’ क्यों नहीं!

दरअसल, आहत भावनाओं का भी अपना बाजार है। किस टाइप की भावना को आहत करके मशहूर होना है, इस बात का खास ध्यान रखा जाता है। सोशल मीडिया के जमाने में भावनाएं बिजली की गति से आहत होती हैं। मसलन, किसी की भावनाएं अगर बरेली में आहत हुई हैं तो नीदरलैंड वाले को तुरंत पता चल जाता है। एक ही मुद्दे पर इतने-इतने ट्वीट और रि-ट्वीट हो जाते हैं कि भावनाएं पशोपेश में पड़ जाती हैं। गजब यह है, जिनका मुद्दे से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता वे भी अपनी कथित भावनाओं को आहत कर लेते हैं। हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा।

मेरी भावनाएं पता नहीं कैसी हैं आहत ही नहीं होतीं। पूरा जोर लगाने के बाद भी नहीं। यह तब भी खामोश रहती हैं, जब बीवी इन्हें बड़ी निर्ममता से आहत करती है।

कई दफा तो मैं रास्ता चलते लोगों से इस बात पर भिड़ जाता हूं कि वे मेरी भावनाओं को आहत करें। इस बहाने थोड़ा फेमस होने का बहाना मुझे भी मिल जाए। मैंने देखा है, जिनकी भावनाएं आहत होती हैं वे रातों-रात प्रसिद्धि के शिखर पर जा बैठते हैं। हर किसी की जुबान पर बस उन्हीं के चर्चे होते हैं।

उधर अमेरिका में चचा ट्रंप की भावनाएं इतनी आहत हुईं कि उनके चाहने वालों ने संसद पर चढ़ाई कर दी। अमेरिकी लोकतंत्र की पूरी दुनिया में जग-हंसाई हुई। किसने क्या-क्या नहीं बोला। मगर क्या फायदा, आखिर चचा ट्रंप को व्हाइट हाउस छोड़ना ही पड़ा।

किसी की भावनाओं की गारंटी कोई नहीं ले सकता, कब कहां कैसे आहत हो जाएं। भावनाओं को आहत होने से बचाना है तो दिल बड़ा कीजिए जनाब।

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