डॉ दिलीप अग्निहोत्री
सरकार के किसी कदम का विरोध करना अपनी जगह है। लेकिन इसे राष्ट्रीय हित के दायरे में ही होना चाहिए। लेकिन जम्मू कश्मीर राज्य के विभाजन और अस्थाई अनुच्छेद को समाप्त करने के संकल्प पर अनेक पार्टियों का रुख चौकाने वाला था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की पहली प्रतिक्रिया आई है। राहुल गांधी ने अपने ट्वीट संदेश के जरिए सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाए हैं।उन्होंने लिखा जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांटकर, चुने हुए प्रतिनिधियों को जेल में डालकर और संविधान का उलंघन करके देश को एकजुट नहीं रखा जा सकता, देश उसकी जनता से बनता है न कि जमीन के टुकड़ों से, सरकार द्वारा शक्तियों के दुरुपयोग का राष्ट्रीय सुरक्षा पर घातक परिणाम होगा। मतलब राहुल गांधी दुनिया को यह बताना चाहते है कि भारत की सुरक्षा पर खतरा आ गया है। कांग्रेस के लोकसभा में नेता कश्मीर को आज भी संयुक्त राष्ट्र संघ की निगरानी में मानते है। राज्य सभा में कांग्रेस के नेता कहते है संविधान की हत्या हो गई, यही अनुच्छेद कश्मीर को भारत से जोड़ने वाला था।
जाहिर है इस प्रकार के बयानों को पाकिस्तान और अलगाववादी भारत के विरोध में वैश्विक स्तर पर उठाएंगे। कांग्रेस एक बार फिर राष्ट्रीय भावना को समझने में नाकाम रही है।
संविधान के अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को अब तक छूने की भी इजाजत नहीं थी। कहा जाता था कि इसके हटने से कश्मीर अलग हो जाएगा, यहां कोई तिरंगा झंडा उठाने वाला नहीं मिलेगा, देश में आग लग जायेगी,आदि। जनसंघ प्रारम्भ से ही इसे हटाने की मांग करती रही है। भारतीय जनता पार्टी ने भी इसे अपनी पहचान से जोड़े रखा। लेकिन बहुमत का इंतजाम न होने के कारण वह इस दिशा में कदम उठाने की स्थिति में नहीं थी। जैसे ही बहुमत की व्यवस्था हुई, भाजपा सरकार ने इस अनुच्छेद को हटा कर दिखा दिया।
संसद में इस पर चर्चा दिलचस्प थी। संकल्प प्रस्तुत करते समय विपक्ष पूरी ऊर्जा से हंगामा कर रहा था, ज्यों ज्यों चर्चा आगे बढ़ी, विपक्ष की ऊर्जा हताशा में बदलने लगी। शाम होने से पहले ही तीन सौ सत्तर के समर्थक खेमे में खामोशी पसर गई। उन्हें राज्यसभा में सरकार की बढ़ी सफलता दिखाई देने लगी। सरकार को मिला यह समर्थन केवल संसद तक सीमित नहीं था। सरकार के समर्थन की भावनात्मक अभिव्यक्ति बाहर भी हो रही थी। देश के इस माहौल को कांग्रेस,सपा जैसी पार्टियां समझ ही नहीं सकी। उन्होंने अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को बनाये रखने की हिमायत में जमीन आसमान एक कर दिया।
लेकिन इनके तर्क निरर्थक साबित हुए। देश की जनभावना अलग थी, इनके विचार उसके विरुद्ध थे। जबकि अमित शाह ने जनभावना को समझा। जम्मू कश्मीर का विभाजन और तीन सौ सत्तर को हटाने का प्रस्ताव इसके अनुकूल था। कांग्रेस में भी अनेक बड़े नेता नाराज हुए है। राज्यसभा में कांग्रेस को हास्यास्पद स्थिति का सामना करना पड़ा। यहां सदस्यों की उपस्थिति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी जिनपर थी, उन्हीं मुख्य सचेतक कलिता ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि तीन सौ सत्तर हटाने का विरोध करके कांग्रेस बर्बादी के रास्ते पर जा रही है। उसका निर्णय देश के मिजाज के खिलाफ था। एक अन्य वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी ने भी कांग्रेस के निर्णय को गलत बताया है। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक भूल में सुधार किया है। अनेक वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम राज्यसभा में कांग्रेस के नेता गुलाम नवी आजाद तो बिल्कुल धमकी के अंदाज में बोल रहे थे।

कांग्रेस ने सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने नियमों का उल्लंघन करते हुए रातों रात एक राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया है। बल्लभ भाई पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, डॉ आंबेडकर, राम मनोहर लोहिया ने इसका विरोध किया था। इस अनुच्छेद ने कश्मीर को भारत से दूर करने का कार्य किया है। वहां भ्रष्टाचार बेकाबू था, क्योंकि केंद्र की एजेंसियां वहां जांच नहीं कर सकती है।
पिछड़ों, दलितों, गरीब सवर्णों को आरक्षण का लाभ नहीं मिला। मनीष तिवारी का यह कहना गलत है कि उस विलय में कुछ वादे किए गए थे। इसलिए उन्नीस सौ बावन में भारत के संविधान में अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को शामिल किया गया। यह सही है कि संविधान में अनुच्छेद तीन सौ इकहत्तर ए से आई भी है। यह नागालैंड, असम, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, सिक्किम आदि को विशेष अधिकार प्रदान करते हैं। लेकिन यह तीन सौ सत्तर की भांति दोहरी नागरिकता, दोहरा संविधान आदि की इजाजत नहीं देता।
आजादी के साथ ही पांच सौ बाँसठ रियासतें मिलाई गई। वैसे ही विलय पत्र पर कश्मीर के तत्कालीन शासक ने हस्ताक्षर किए थे। तीन रियासतों को लेकर संवेदनशील स्थिति बनी जिसमें जम्मू-कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ शामिल था। कश्मीर मसला आज तक शांत नहीं हुआ।
अनुच्छेद तीन सौ तिहत्तर तीन का प्रयोग करके राष्ट्रपति को इसे सीज करने का अधिकार है। उन्होंने इसका प्रयोग किया। कांग्रेस इस प्रावधान का उपयोग उन्नीस सौ बावन और उन्नीस सौ पचपन में कर चुकी है।
महाराजा के लिए पहले सदर ए रियासत फिर उन्नीस सौ पैसठ में इसे गवर्नर नाम दिया गया। जम्मू कश्मीर में विधानसभा नहीं चल रही है। संसद में जम्मू-कश्मीर के सारे अधिकार निहित हैं। अनुच्छेद तीन सौ सत्तर सी में के अनुसार संसद कश्मीर पर कानून बनाने में सक्षम है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद सरकार संकल्प लेकर आई हैं। यह संविधान के अनुरूप है। राहुल गांधी और उनके साथी इसे असंवैधानिक बता रहे है। लोकसभा में कांग्रेस के ने अधीर रंजन का बयान ज्यादा शर्मनाक है। उनके अनुसार इसकी निगरानी संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा उन्नीस सौ अड़तालीस से की जा रही है। क्या यह आंतरिक मामला है।
अधीर रंजन के बयान का यही मतलब है कि वह कश्मीर को भारत का आंतरिक हिस्सा नहीं मानते। अधीर रंजन ने आगे कहा कि सरकार ने सभी नियमों का उल्लंघन किया। एक राज्य को रातोंरात केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया। चिदंबरम ने कहा, सरकार ने कहा कि सरकार का यह कदम अप्रत्याशित और जोखिम से भरा है। सरकार ने संविधान के अनुच्छेदों की गलत व्याख्या की है। मतलब चिदम्बरम इस अस्थाई अनुच्छेद की स्थायी रूप में व्याख्या कर रहे है।

तीन सौ सत्तर के हिमायतियों को अंबेडकर के एक पत्र का संज्ञान लेना चाहिए। अनुच्छेद तीन सौ सत्तर के बारे में शेख अब्दुल्ला को लिखे पत्र में कहा था। उन्होंने लिखा कि आप चाहते हैं कि भारत जम्मू-कश्मीर की सीमा की सुरक्षा करे, यहां सड़कों का निर्माण करे, अनाज की सप्लाई करे,लेकिन भारत सरकार को कश्मीर में सीमित अधिकार ही मिलने चाहिए। ऐसे प्रस्ताव को भारत के साथ विश्वासघात होगा जिसे भारत का कानून मंत्री होने के नाते मैं कतई स्वीकार नहीं कर सकता। सरदार पटेल ने भी इसका विरोध किया। अंबेडकर ने अनुच्छेद तीन सौ सत्तर की बहस में हिस्सा नहीं लिया था। इस अनुच्छेद से संबंधित सभी सवालों के जवाब कृष्ण स्वामी आयंगर ने ही दिये थे।
गौरतलब है कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान अध्याय में शामिल किया गया। इस नामकरण से ही समझ लेना चाहिए कि इसे स्थायी मानना ही असंवैधानिक है। इन प्रावधानों के अनुसार संसद को जम्मू कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है। लेकिन किसी अन्य विषय से सम्बन्धित क़ानून को लागू करवाने के लिये केन्द्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिये। इसी विशेष दर्ज़े के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान का अनुच्छेद तीन सौ छप्पन लागू नहीं होता। राष्टपति शासन की जगह राज्यपाल शासन लागू होता है। उन्नीस सौ छिहत्तर का शहरी भूमि क़ानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता।
इसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि ख़रीदने का अधिकार है। भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू कश्मीर में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते। अनुच्छेद तीन सौ साठ के अनुसार लागू होने वाला वित्तीय आपातकाल जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती। यहां के लोगों को दोहरी नागरिकता हासिल था, प्रदेश का अलग ध्वज था।विधानसभा का कार्यकाल छह वर्ष था। जम्मू-कश्मीर के अन्दर भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं होता है। भारत के उच्चतम न्यायालय के आदेश जम्मू-कश्मीर के अन्दर मान्य नहीं होते हैं।
भारत की संसद को जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में अत्यन्त सीमित क्षेत्र में कानून बना सकती है।
जम्मू-कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से विवाह कर ले तो उस महिला की नागरिकता समाप्त हो जायेगी। इसके विपरीत यदि वह पकिस्तान के किसी व्यक्ति से विवाह कर ले तो उसे भी जम्मू-कश्मीर की नागरिकता मिल जायेगी आरटीआई और सीएजी की व्यवस्था यहां के लिए नहीं थी। यहां की महिलाओं पर शरियत कानून लागू था, पंचायत को अधिकार प्राप्त नहीं था।
कश्मीर में बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते थे कश्मीर में रहने वाले पाकिस्तानियों को भी भारतीय नागरिकता मिल जाती है। कश्मीर आदि काल से भारत का अभिन्न हिस्सा है।नागों के पिता कश्यप ऋषि कश्मीर के प्रथम राजा थे,इनके नाम से बना कश्मीर।इनकी एक पत्नी कद्रू के गर्भ से नागों की उत्पत्ति यानि नाग-वंश की उत्पत्ति हुई। कश्मीर में नागों के नाम पर जगहें हैं अनन्त नाग,कमरू नाग,कोकर नाग,वेरी नाग,नारा नाग,कौसर नाग आदि। ऐसे में इसे विशेष दर्जा देने गलत था।







