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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    सलाम जर्नलिस्ट तनु श्री! 

    ShagunBy ShagunOctober 4, 2020 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    Post Views: 677
    मीडिया को आईना दिखाती वरिष्ठ पत्रकार दिनेश जुयाल की खरी खरी
    एक बलत्कृत के साथ उसका सच भी तड़प कर मर गया। उसे आधी रात को पुलिस ने पेट्रोल डाल कर जला दिया । उसी का एक और सच पुलिस के पहरे में कैद है। कोरोना काल में भी बड़े लोगों की पंचायत बुला कर गरीब के  सच को पूरी तरह दहलाया गया। एक डीएम  गरीब की झोपड़ी में सच को धमाकाने जा धमका। उस सच को झूठ बनाने और उसके प्रचार के लिए  लखनऊ में एक बड़ा अफसर प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है! अखबारों, टीवी चैनलों को नियंत्रित निर्देशित किया गया…औऱ भी बहुत किया गया। ऐसे हालात में एक लड़की आधी रात को सच जानने के लिए पुलिस से जूझ रही थी। कैमरा बंद किया तो मोबाइल फ़ोन से सच को पकड़ने की कोशिश करतीं है। रात को गांव के रास्तों में , खेतों में पैदल दौड़ कर सच का पीछा करती है। वह पीड़ितों की व्यथा ही दर्ज नहीं करती आरोपित पक्ष के लिए मजमा जुटा रहे दबंगो और उन पर मेहरबान अफसरों से सवाल पूछने को हौसला करती है।
    आधी रात को बलात्कार पीड़ित लड़की के शव ले जा रही वैन का पीछा करते हुए दिल्ली से वह पुलिस के धकियाने के बावजूद उसके घर और चिता स्थल के पास तक भी पहुंच जाती है। वो देश की इकलौती पत्रकार है जिसने इस खौफनाक सच को इतने करीब से देखा। इंडिया टुडे की इस पत्रकार का नाम है तनु श्री। आइये इसे सलाम करते हैं। उसके वीडियो यूट्यूब में मिल जाएंगे। देखिये। वो साथी जरूर देखें जो पत्रकारिता कर रहे हैं या सीख रहे हैं।
    भाजपा के ट्रोल अब उसे गरिया रहें हैं। पत्रकार उसके फोन कॉल का अधूरा ऑडियो चला कर उल्टी कहानी बना रहे हैं लेकिन देश के नामी पत्रकार, रिटायर्ड पुलिस ऑफिसर समेत कई लोग इस बात पर खुश हैं कि तनु श्री ने इतनी बंदिशों में भी पत्रकारिता को गरिमा दिला दी। उसने सच दिखा ही दिया। अब इसे अदालत में सच साबित होना है
    इस पत्रकार ने गांव का सच बताया कि यहां दलित और सवर्णों में गजब की सोशल डिस्टेनसिंग है। इतनी कि अगर दलित दुकान से सामान लें तो उनके रखे पैसे उठाने के बाद दुकानदार को हाथ धोने पड़ते हैं। ये अलग बात है दलित की लड़की पर भेड़ियों की तरह टूटते समय उनका धर्म खराब नहीं होता। यहां दलितों की बस्ती में कोरोना काल में लोग घरों में कैद हैं । जो घर से निकल नहीं पा रहे उन पर दंगे की साजिश का आरोप है। सवर्णो को अभियुक्तों के पक्ष में बड़ी पंचायत करने की इजाजत मिल जाती है। ये पत्रकार इस पर भी मजिस्ट्रेट से सवाल पूछती है जिसका जवाब अफसर के पास नहीं। उसने रास्ता रोकती पुलिस, दूसरे अफसरों और गांव के सभी लोगों से सच पूछा और जो सच सामने था उसे कैमरे में कैद किया।
    पुलिस ने पीड़िता के घर वालों को एक तरह से बंधक बना कर रखा था तो उसने उसके भाई से फोन पर कहा कि तुम्हारे पिता इस घटना पर जो कह रहे है उसे रिकॉर्ड कर भेज दो तो अपने चैनल पर भौंकने वाला पत्रकार और भाजपा के ट्रोल उसे साजिशकर्ता साबित क़रने में जुट गए। ये वीडियो सरकार की कृपा के बिना चैनल तक कैसे पहुंच सकता था? कोई ये नहीं पूछ रहा कि पीड़ित पक्ष को तमाम तरह से प्रताड़ित करने के बाद सरकार किस एजेंसी से और किस कानून के तहत उनका फोन टैप कर रही है ? और उसे वायरल करके क्या भूमिका बनाई जा रही है?
    एक डीएम किसके आदेश पर परिवार को बयान बदलने के लिए धमका रहा है? उसका भी वीडियो वायरल है।  ए डी जी साहब कानून के ज्ञाता हैं। क्या उन्हें नहीं पता कि घटना के 11 दिन बाद लिए गए सैंपल में स्पर्म नहीं मिल सकता? उन्हें नहीं मालूम कि स्पर्म न मिलने और जननांग पर जख्म न मिलने के बाद भी बलात्कार सिद्ध होता है? इस पर तो देश की सबसे बड़ी अदालत फैसला दे चुकी है। ये ए डी जी विकास दुबे मामले में सरकार के ट्रबल शूटर थे, इतना तो जानते ही होंगे!  इस तरह मीडिया के सामने सच को झुठलाना और पीड़ित पक्ष को परोक्ष रूप से गलत ठहराना उन्हें षड्यंत्रकारियों की जमात में खड़ा कर देता है!
    Image
    हाइकोर्ट ने इस मामले में 12  अक्टूबर को आला अफसर तलब किये हैं । सरकार की साख  बचाने को चोटी के लिए वकील मोर्चे पर लगेंगे। पता नहीं कोर्ट में क्या सवाल होंगे। अगर पुलिस वाले ड्यूटी बजा रहे थे तो लोकल अफसर क्या आदेश दे रहे थे? ये अफसर क्या लखनऊ के आला अफसरों से निर्देश ले रहे थे या खुद फैसला ले रहे थे? खुद फैसला ले रहे थे तो लखनऊ के अफसर कहाँ खोये थे? लखनऊ के अफसर कंट्रोल कर रहे थे तो उन्हें कौन निर्देश दे रहा था? सरकार को सब पता था? नहीं था तो क्या उत्तरप्रदेश में सरकार है ही नहीं? क्या जो लोग बड़े वोट बैंक का हिस्सा हैं उन्हें हर अपराध की छूट है? उनके लिए अलग अलिखित कानून है? उनकी खातिर कम संख्या वालों को पीड़ित होने पर भी सताया जा सकता है? सरकार अगर धर्मज्ञ है तो उसे पता है कि चिता रात को जला कर उस बेटी के लिए नर्क तय किया गया? वैसे मैं ये सब नहीं मानता।
    यह भी तो सवाल होगा कि देश भर में जो मामला चर्चा में है उसमें पीड़िता को अपराधी की तरह क्यों फूंक दिया? एक और जांच की गुंजाइश खत्म क़रने की इतनी क्या जल्दी थी?
    कोर्ट ने तनु श्री की रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया है। प्रार्थना करते हैं एक पत्रकार कोर्ट के सामने भी सच का उद्घाटन कर न्यायालय की मदद कर पाए और  न्याय के मंदिर में हमारी आस्था बनी रहे। थैंक यू तनु! सलाम!
    बाकी वो सब पत्रकार जिन्होंने मौके पर सही रिपोर्टिंग की मुझे मुआफ़ करते हुऐ तनु के साथ अपना भी नाम पढ़ लें। बाकी की बात फिर कभी।
    धिक्कार है नंबर वन अख़बार!
    तीन दिन से देश के एक नम्बर वन अखबार का दावा क़रने वाले अखबार की हरकतें देख रहा हूँ। हमारे पहाड़ में देवताओं की डोलियां उठती हैं। इसके कंधे पर दिल्ली और लखनऊ सरकार की डोली है। कंधे छिल रहे हैं तो भी लगा है। 3 तारीख का एडिटोरियल देखा खबरों की टोन देख रहा हूं। ऐसा संपादकीय तो कोई पार्टी वाला भी न लिख पाए! अरे मालिक ! क्यों पत्रकारिता का जनाजा निकाल रहा है? क्या सोचते हो सरकार तुम्हारे भरोसे चलती है। वैसे भी कई धंधे हैं, बदल लो। देश में बहुत अंधे हैं इसलिए कुछ भी करोगे! तुम दल बदलू भी हो फिर भी ये देश एक दिन तुम्हारा भी हिसाब करेगा।

    Shagun

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