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    प्राकृतिक आपदा से जूझ रहे केरल को चाहिए तत्काल राहत

    By August 21, 2018 Current Issues No Comments10 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    युद्ध हो, भूकंप या बाढ़ या फिर किसी भी अन्य प्रकार की प्राकृतिक आपदा, भारत के नागरिकों की खासियत है कि ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण अवसरों पर उनके हाथ पीड़ितों की मदद व सहयेाग के लिए हर समय खुले रहते हैं। छोटे-छोटे गांव-कस्बे तक आम लोंगों से इमदाद जुटाने के कैंप लग जाते हैं, गली-गली लोग झोली फैला कर घूमते हैं, अखबारों में फोटो छपते हैं कि मदद के ट्रक रवाना किए गए। फिर कुछ दिनों बाद आपदा ग्रस्त इलाकों के स्थानीय व राज्य प्रशासन की लानत-मनानत करने वाली खबरें भी छपती हैं कि राहत सामग्री लावारिस पड़ी रही और जरूरतमंदों तक पहुंची ही नहीं। हो सकता है कि कुछ जगह ऐसी कोताही भी होती हो, लेकिन वास्तविकता तो यह है कि आम लोगों को यही पता ही नहीं होता है कि किस आपदा में किस समय किस तरह की मदद की जरूरत है।

    उदाहरण के लिए बीते वर्षाें आए अब बिहार के जल प्लावन को ही लें तो देशभर में कपड़ा-अनाज जोड़ा जा रहा है, और दीगर वस्तुएं जुटाई जा रही हैं, पैसा भी। भले ही उनकी भावना अच्छी हो लेकिन यह जानने का कोई प्रयास नहीं कर रहा है कि आज वहां तत्काल किस चीज की जरूरत है और आने वाले महीनों या साल में कब क्या अनिवार्य होगा। समुद्र तट पर बसे केरल में बीते एक सदी की सबसे भयानक जल-त्रसदी है यह और शायद भारत का सबसे बड़ा राहत अभियान भी। करीब दस लाख लोग 6,000 से अधिक राहत शिविरों में रह रहे हैं। राज्य की करीब 16,000 किलोमीटर सड़क व 164 से ज्यादा पुल पूरी तरह नष्ट हो गए हैं।

    सेना और अन्य सुरक्षा बलों के एक लाख से ज्यादा जवान 24 घंटे राहत कार्य में लगे हैं। चूंकि केरल की बड़ी आबादी विदेश में है अत: समूचे विश्व से राहत सामग्री भी आ रही है। अलप्पुझा, एर्नाकुलम और त्रिशुर जिलों में सड़कें, रेलवे-पथ, पुल, सरकारी स्कूल व भवन सब कुछ तबाह हो गया है। कई हजार हेक्टेयर खेत बर्बाद होने से किसान की तबाही का आंकड़ा तो अकल्पनीय है। कई हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका ऐसा है जहां आने वाले कई महीनों तक पानी व उसके साथ आई रेत और गाद जमा रहेगी। जब बारिश थमी है तो उन गलियों-मुहल्लों में भरे पानी को निकालना, कीचड़ हटाना, मरे हुए जानवरों और इंसानों का निस्तारण करने के साथ समग्र साफ-सफाई करना सबसे बड़ा काम है और यह सबसे बड़ी चळ्नौती भी है।

    चुनौती इसलिए क्योंकि इसके लिए तत्काल जरूरत है पानी के बड़े पंपों की, जेसीबी मशीन, टिप्पर व डंपर की, ईंधन की, गेती-फावड़ा दस्ताने, गम बूट आदि की। जब तक गंदगी, मलबा और गंदा पानी इस इलाके से हटेगा नहीं, तब तक जीवन को फिर से पटरी पर लाना मुश्किल है। यह भी तय है कि किसी भी सरकारी सिस्टम में इतनी भारी व महंगी मशीनों को तत्काल खरीदना संभव नहीं होता। यदि समाज के लोग इस तरह के औजार-उपकरण खरीद कर राज्य सरकार को भेंट स्वरूप दें तो पुनर्वास कार्य सही दिशा में चल पाएंगे और एक समयसीमा के दायरे में इन कार्यों को अंजाम देते हळ्ए बड़ी आबादी की जिंदगी को व्यवस्थित किया जा सकता है।

    पानी में फंसे लोगों के लिए भोजन तो जरूरी है ही और उसकी व्यवस्था स्थानीय सरकार व कई जन संगठन कर भी रहे हैं, लेकिन इस बात पर कम ध्यान है कि वहां पीने के लिए साफ पानी की बहुत कमी है। आसपास एकत्र हळ्आ पानी बदबूदार है। दूसरी ओर राज्य के सभी वाटर ट्रीटमेंट प्लांट बंद पड़े हैं और यदि ऐसे में गंदा पानी पीया तो हैजा फैलने की आशंका रहेगी। लाखों बोतल पेयजल की रोज की मांग के साथ-साथ बिना बिजली के चलने वाले वाटर फिल्टर, बड़े आरओ, बैटरी, इन्वर्टर व आम लोगों के लिए मोमबत्तियां व माचिस की वहां बेहद जरूरत है। कारण वहां बिजली की सप्लाई सामान्य करने में बहुत सी बाधाएं हैं।

    बिजली के तार- खंभे, इंसुलेटर आदि विभिन्न तकनीकी चीजों की जरूरत तो है ही और उसे भी स्थापित करने के लिए अधिक कामगारों की जरूरत है। हालांकि ये सब ऐसे तकनीकी काम हैं जिनमें अभी महीनों लग सकते हैं। ऐसे में छोटे जेनरेटर और इन्वर्टर बेहद महत्वपूर्ण भूमिका में हो सकते हैं। ऐसा नहीं है कि बड़ी व्यवस्थाएं जुटाने के लिए आम पीड़ित लोगों का ध्यान ही नहीं रखा जाए। हजारों लोग ऐसे हैं जो मधुमेह, ब्लड प्रेशर, थायरायड जैसी ऐसी बीमारियों से पीड़ित हैं जिन्हें नियमित दवाई लेना होता है और बाढ़ उनकी सारी दवा बहा कर ले गई है। इसके अलावा अपना सबकुछ लुटने का दर्द और राहत शिविरों की सीमित व्यवस्था के चलते मानसिक रूप से अव्यवस्थित लोगों की संख्या भी बढ़ रही है।

    इन लोगों के लिए उनकी नियमित दवाएं, पीने के पानी की बोतलें, डेटॉल, फिनाईल, नेफथेलीन की गोलियां, क्लोरिन की गोलियां, पेट में संक्रमण, बुखार जैसी बीमारियों की दवाएं, ग्लूकोज पाउडर, सेलाईन, औरतों के लिए सेनेटरी नैपकीन, फिलहाल तत्काल जरूरत की चीजें हैं। अब यदि आम लोग अपने घर के पुराने ऊनी कपड़ों की गठरियां या गेंहू चावल आदि वहां भेजेंगे तो तत्काल उसका इस्तेमाल हो नहीं पाएगा।

    वैसे भी केरल में इतना जाड़ा कभी होता नहीं कि ऊनी कपड़े पहनने की नौबत आए। इसकी जगह वहां चादर, हल्के कंबल भेजे जाएं तो उन वस्तळ्ओं का तत्काल उपयोग हो सकता है। वरना भेजे गए बंडल लावारिस सड़ते रहेंगे और हरी झंडे दिखा कर फोटो खिंचाने वाले लोग हल्ला करते रहेंगे कि मेहनत से जुटाई गई राहत सामग्री राज्य सरकार इस्तेमाल नहीं कर पाई। यदि हकीकत में ही कोई कुछ भेजना चाहता है तो सीमेंट, लोहा जैसी निर्माण सामग्री के ट्रक भेजने के संकल्प लेना होगा।

    केरल के आंचलिक गांवों से ढाई लाख लोग अपने घर से पूरी तरह विस्थापित हुए हैं। वहां के बाजार बह गए हैं। वाहन नष्ट हो गए हैं। ऐसे में हुए जान-माल के नुकसान के बीमा दावों का तत्काल व सही निबटारा एक बड़ी राहत होता है। चूंकि राज्य सरकार का बिखरा-लुटा-पिटा अमला अभी खुद को ही संभालने में लगा है, अभी तक राज्य सरकार का अनुमान है कि नदियों के रौद्र रूप ने राज्य को 10,787 करोड़ रुपये का नुकसान कर दिया है।

    नुकसान के आकलन, दावों को प्रस्तुत करना, बीमा कंपनियों पर तत्काल भुगतान के लिए दबाव बनाने आदि कार्यों के लिए बहुत से पढ़े-लिखे लोगों की वहां जरूरत है। ऐसे लोगों की भी जरूरत है जो दूरदराज में हुए माल-असबाब के नुकसान की सूचना, सही मूल्यांकन को सरकार तक पहुंचा सकें और यह सुनिश्चित कर सकें कि केंद्र या राज्य सरकार की किन योजनाआंे का लाभ उन्हें मिल सकता है। कई जिलों में बाढ़ का पानी तो उतर रहा है लेकिन वहां अपने जीवन को फिर से पटरी पर लाने की समस्या सामने आ खड़ी हुई है।

    सरकार कहती है कि राहत का पैसा बैंक खाते में जाएगा और उसी खाते में जाएगा जिसके पास आधार कार्ड है। इसके लिए अभी तो फॉर्म भरा जाएगा। जिसका घर व सामान सबकुछ बाढ़ में बह गया, उसके पास आधार तो होने से रहा, फिर जब भूख आज लगी है तो राहत का एक महीने बाद मिला पैसा किस काम का? ऐसे में लोगों को उनकी पहचान के कागजात उपलब्ध कराने के कार्य के लिए ढेर सारे स्वयंसेवकों को आगे आना होगा, जबकि दिल्ली या अन्य शहर में बैठ कर उनके डुप्लीकेट आधार आदि कंप्यूटर से निकाल कर उन तक पहुंचा सकें।

    एक महीने के भीतर जब हालात कुछ सुधरेंगे तो स्कूल व शिक्षा की याद आएगी और तब पता चलेगा कि सैलाब में स्कूल, बच्चों के बस्ते, किताबें सब कुछ बह गया है। इस समय कोइ दो लाख बच्चों को बस्ते, कापी-किताबों, पैंसिल, पुस्तकों की जरूरत है।

    इस बार यदि ईद, दीपावली या क्रिसमस के तोहफों में हर घर से यदि एक-एक बच्चे के लिए बस्ता, कंपास, टिफिन बॉक्स, वाटर बोटल, पांच नोट बुक, पेन-पैंसिल का सेट वहां चला जाए तो केरल के भविष्य के सामने छाया धुंधलका छंटने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। वहां की पाठ्य पुस्तकों को फिर से छपवाना पड़ेगा, ब्लेक बोर्ड व फर्नीचर बनवाना पड़ेगा। इसके लिए राज्य के छोटे-छोटे क्लस्टर में, मुहल्लों में संस्थागत या निजी तौर पर बच्चों के लिए काम करने की जरूरत है। इसके साथ उनके पौष्टिक आहार के लिए बिस्किट, सूखे मेवे जैसे खराब न होने वाले भोच्य पदार्थ की मांग वहां है।

    यदि आवश्यकता के अनुरूप दान या मदद न हो तो यह समय व संसाधन दोनों का नुकसान ही होता है। यह सही है कि हमारे यहां आज तक इस बात पर कोई दिशा-निर्देश बनाए ही नहीं गए कि आपदा की स्थिति में किस तरह की तात्कालिक तथा दीर्घकालिक सहयोग की आवश्यकता होती है। असल में यह कोई दान या मदद नहीं है, हम एक मुल्क का नागरिक होने का अपना फर्ज अदा करने के लिए अपने संकटग्रस्त देशवासियों के साथ खड़े होते हैं। ऐसे में यदि हम जरूरत के मुताबिक काम करें तो हमारा सहयोग सार्थक होगा।

    जलवायु परिवर्तन व प्रकृति के साथ छेड़छाड़ से यह तो तय है कि आने वाले दिनों में देशभर में लोगों को कई किस्म की प्राकृतिक विपदाओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में जिस तरह आपदा प्रबंधन के लिए अलग से महकमे बनाए गए हैं, वैसे ही इस तरह के हालात से निबटने के लिए जरूरी सामान को देशवासियों से एकत्र करने का काम पूरे साल करना चाहिए।

    केरल में हालिया बाढ़ ने वहां लोगों की जिंदगी तबाह कर दी है। केवल सरकार के भरोसे लाखों लोगों की जिंदगी को पटरी पर लाना बहुत मुश्किल है। इसलिए बतौर नागरिक हमें भी आगे आना होगा। साथ ही यह भी समझना होगा कि वहां तत्काल किस तरह की मदद की जरूरत है और उसेकिस तरह से पूरा किया जा सकता है। इससे सबक यह भी लेने की जरूरत है कि भविष्य में आपदा के बाद राहत के लिए इंतजाम पहले से तैयार रखने होंगे।

    पश्चिमी घाट में केरल सर्वाधिक संवेदनशील जाने-माने वैज्ञानिक डॉ. माधव गाडगिल ने केरल में आई बाढ़ को मानव-जनित त्रसदी के रूप में करार दिया है। दअरसल, वन एवं पर्यावरण मंत्रलय ने दक्षिण भारत के पश्चिमी घाट इलाके में पारिस्थितिकी के संदर्भ में प्रसिद्ध वैज्ञानिक माधव गाडगिल के नेतृत्व में वर्ष 2010 में एक एक्सपर्ट पैनल का गठन किया था। मौजूदा संकट की आशंका जताते हळ्ए उन्होंने उसी समय सरकार को आगाह किया था। उस समय प्रस्तळ्त की गई अपनी रिपोर्ट में उन्होंने सरकार को इस बारे में आगाह किया था कि पश्चिमी घाट इलाके की पारिस्थितिकी व्यापक रूप से नाजळ्क है और यहां किसी तरह की छेड़छाड़ करना भविष्य में खतरनाक साबित हो सकता है।

    रिपोर्ट में कहा गया कि छह राज्यों के बीच फैले पश्चिमी घाट में केरल का इलाका सर्वाधिक संवेदनशील है। इस इलाके में जारी विविध विकास कायरें को विशेषज्ञों के सलाह से अंजाम दिए जाने पर जोर दिया गया था। लेकिन उसका अनळ्पालन नहीं किया गया, जिसका गंभीर नतीजा आज लोगों को भळ्गतना पड़ रहा है। पर्यावरण मंत्रलय ने पश्चिमी घाट में 57,000 वर्ग किमी इलाके को संवेदनशील घोषित करते हळ्ए इसमें किसी भी प्रकार के निर्माणकार्य पर रोक लगाने को कहा था, जिसमें यहां चल रही खनन गतिविधियों, बड़े निर्माणों समेत थर्मल पावर प्लांट और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर पूर्णतया पाबंदी लगाने की बात की थी।

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