धरती से सीधे चांद की फ्लाइट !

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व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी
चांद की सतह पर पानी मिला है। मतलब- जीवन की वहां संभावना है। मनुष्य का, लगता है, अगला ठिकाना अब चांद ही होगा। धरती यों भी अब रहने लायक कहां बची। यहां पाप निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। सात-आठ माह से तो कोरोना ने ही जीवन हलकान कर रखा है। यहां न पानी सुरक्षित बचा है न जवानी। कैसे-कैसे रोगों ने मनुष्य को घेर रखा है। ऐसे में चांद ही बेहतर रिहाइश हो सकती है।
मगर एक डर भी है, चांद पर बसकर कहीं मनुष्य इसे भी धरती जैसा न कर दे। अभी वहां पानी मिला है, कल को दारू भी मिल सकती है। मनुष्य के कदम जहां-जहां पड़े, पीने-पिलाने का इंतजाम उसने पहले किया। सदियों पुरानी आदते हैं, कहां छूटती हैं भला। दारूबाजों के टशन भी ऊंचे होते हैं। हर जगह उन्हें मयखाना ही नजर आती है। अभी तो चांद में एक ही दाग दिखाई देता है, कल को वहां बार भी न दिखाई देने लगे।
जानता हूं, चांद पर बसना इतना आसान न होगा। लेकिन यह जगह मुझ जैसे लोगों के लिए बिल्कुल मुफ़ीद रहेगी, जिन्हें दुनिया-जहान से अधिक मतलब नहीं रहता। यहां जिससे मतलब रखो वो ही बेमतलब की बातें किया करता है। उसकी हां में हां मिलाते रहो तो ठीक नहीं तो दुश्मन। जरा देर में तो आदमी आदमी पर सीधा हो लेता है। इसीलिए बेहतर यही है कि खुद को खुद तक ही सीमित रखा जाए। जाति-धर्म के झगड़े भी यहां कम नहीं।
चांद पर जीवन की संभावना का दावा वैज्ञानिक पहले भी कर चुके हैं। बीच में यह भी सुना गया था कि लोग वहां जमीन लेने की प्लानिंग भी करने लगे हैं। अगर ऐसा कुछ होता है तो कितना बढ़िया रहेगा। कितने गर्व से बताया करेंगे कि हमारे फलां रिश्तेदार चांद पर रहते हैं। गर्मियों की छुट्टियों में चांद की सैर को जाया करेंगे। जाकर वो जगह भी देखेंगे जहां एक बुढ़िया बैठकर सूत कात रही है। अरबों-खरब बरस हो गए उसे सूत कातते हुए। चांद पर लिखी कविताएं और शेर जीवंत हो उठेंगे। कवियों के कविता संग्रह फिर सीधे चांद से ही छापकर आया करेंगे। पुरस्कार भी वहीं लिए-दिए जाएंगे।
लेकिन उससे पहले चांद का एक चक्कर लगा लेना ठीक रहेगा। जैसे कभी हरिशंकर परसाई ने इंस्पेक्टर मातादीन को चांद पर भेजा था। मातादीन ने वहां पहुंचकर चांद वासियों को जो पाठ पढ़ाए, वह इतिहास में आज भी अमर हैं। ऐसी ही एक यात्रा चांद की मैं भी करना चाहता हूं। मैं वहां पहुंचकर लेखन को विस्तार दूंगा। वहां लेखक न के बराबर ही होंगे। वह जगह लिखने-लिखाने के लिए धांसू रहेगी। कम से कम धरती से लेखकों का कुछ बोझ तो घटेगा। फिर अखबारों और पत्रिकाओं में रचनाएं सीधे चांद से छपने आया करेंगी।
पर, एक बड़ा खतरा भी रहेगा। मनुष्य वहां पहुंचकर प्रदूषण बढ़ाएगा। जैसे उसने धरती को नरक कर रखा है, मुझे डर है, चांद को भी न कर दे। फिर धरती से देखने पर चांद में धुएं के बादल ही नजर आया करेंगे।
कुछ भी कहिए, मनुष्य है बहुत उत्पाती जीव। जहां भी गया, विनाश साथ लेकर गया। हालांकि उसने बड़ी-बड़ी खोजे भी कीं पर दुंद भी खूब काटा। चांद पर पानी खोजकर उसने वहां का टिकट तो पक्का कर लिया है। लेकिन वहां बसकर वो उसका स्वरूप कैसा बनाएगा, इस पर भी विचार होना चाहिए।
फिलहाल, चांद पर की जा रही अपनी कल्पनाओं को जारी रखता हूं। अभी वहां पानी की खोज हकीकत बनी है। कल को रिहाइश भी हकीकत बन जाएगी। हो सकता है, धरती से सीधे चांद की फ्लाइट भी मिलने लगे। मनुष्य क्या नहीं कर सकता! सुना है, उसने उम्र बढ़ाने का फार्मूला भी खोज लिया है। वैसे, कोरोना भी तो मनुष्य की ही देन है न।

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