केवल ‘टाइगर जिंदा है’, से काम नहीं चलेगा?

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पीएम ने कहा, ‘‘एक था टाइगर’ के साथ शुरू हुई कहानी ‘‘टाइगर जिंदा है’ तक न रुके

अभी हाल ही में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अखिल भारतीय बाघ अनुमान रिपोर्ट 2018 जारी की थी और कहा कि हमारा भारत देश आज दुनिया में बाघों के लिए सबसे सुरक्षित और सबसे बड़े पर्यावास क्षेत्रों में से एक के रूप में उभर कर सामने आया है। वास्तव में रिपोर्ट की माने तो भारत में बाघों की संख्या 2014 के मुकाबले 2018 में काफी बढ़ी है। भारत में 2014 में जहां बाघों की संख्या 2,226 थी, वहीं 2018 में यह आंकड़ा 2,967 हो चुका है।

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उन्होंने कहा था कि, ‘आज हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि भारत करीब 3 हजार बाघों के साथ दुनिया के सबसे बड़े और सबसे सुरक्षित पर्यावास में से एक है।’’ उन्होंने कहा कि विकास या पर्यावरण की चर्चा पुरानी है। हमें सह अस्तित्व को भी स्वीकारना होगा और सहयात्रा के महत्व को भी समझना होगा।

प्रधानमंत्री ने कहा, ‘मैं इस क्षेत्र से जुड़े लोगों से यही कहूंगा कि जो कहानी ‘एक था टाइगर’ के साथ शुरू होकर ‘टाइगर जिंदा है’ तक पहुंची है, वो वहीं न रुके। केवल ‘टाइगर जिंदा है’’, से काम नहीं चलेगा।

तस्कर और शिकारियों से बचाना बड़ी चुनौती:

अभी जब रोज ही वन्य जीवों को लेकर कोई न कोई बुरी खबर पूरी दुनिया से आ रही है, तब भारत में बाघों की संख्या में तेज बढ़ोतरी की सूचना पर्यावरण प्रेमियों का हौसला बढ़ाने वाली है। विश्व बाघ संरक्षण दिवस (29 जुलाई) पर स्वयं भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार फिलहाल देश में कुल 2,967 बाघ हैं। यह संख्या 2014 में हुई पिछली गणना से लगभग एक तिहाई ज्यादा है, जबकि 2006 में बाघ बचाने का संकल्प लिए जाते वक्त की तुलना में दोगुनी से भी अधिक हो चुकी है। इसमें एक तकनीकी पेच यह है कि बाघों की पिछली गिनती में डेढ़ साल या इससे ज्यादा उम्र वाले बाघ ही गिने गए थे, जबकि इस बार एक साल तक की उम्र वाले बाघ गिने गए हैं।

गणना की जवाबदेही वाले अफसरों का कहना है कि एक और डेढ़ साल के बाघ के बीच ज्यादा फर्क नहीं होता, लिहाजा गणना की न्यूनतम आयु एक साल कर दी गई है। इसके डेढ़ साल रखने की वजह यह बताई गई थी कि इस उम्र में आकर बाघ आत्मनिर्भर हो जाता है। बहरहाल, यह सिर्फ एक तकनीकी मामला है।

बाघ संरक्षण की दृष्टि से बुरी खबर यह है कि तीन भारतीय बाघ अभयारण्यों में सारी कोशिशों के बावजूद एक भी बाघ नहीं खोजा जा सका है। एक बड़ी समस्या बाघों के रहने की जगह की है। अभी भारत में बाघ अभयारण्यों का कुल क्षेत्रफल लगभग 3 लाख 80 हजार वर्ग किलोमीटर है, जबकि गिने गए लगभग तीन हजार बाघों को रहने के लिए 200 वर्ग किलोमीटर प्रति बाघ के हिसाब से 6 लाख वर्ग किलोमीटर, यानी लगभग दोगुनी जगह की जरूरत पड़ेगी। जगह कम होने के तीन असर देखे जाते हैं। एक तो बाघ आपस में ही लड़कर मारे जाते हैं। दूसरे, अपनी खुराक पूरी करने के लिए वे इंसानी बस्तियों में जाते हैं और लोगों के गुस्से का शिकार बनते हैं।

तीसरे, कई बार उन्हें खाने को कुछ नहीं मिलता और वे लगातार भुखमरी से ग्रस्त होकर कहीं मरे पाए जाते हैं। ये सारे कारक चीनी बाजारों में बाघों के अंगों की तस्करी करने वाले फंदामार शिकारियों के अलावा हैं, जिन्होंने राजस्थान जैसे बाघों के गढ़ में इनकी जड़ ही तोड़ दी। ध्यान रहे, बाघों को जिंदा रखना हमारी सहज सोच से कहीं ज्यादा मुश्किल है।

बाघ मर जाएगा, लेकिन न तो घास खाएगा, न चूहा-गिलहरी मारकर गुजारा करेगा। उसके जिंदा रहने के लिए जंगल में हिरन, नीलगाय और सूअर जैसे मंझोले कद के शाकाहारी जानवरों का बड़ी तादाद में होना जरूरी है। लेकिन इन्हें पाल सकने वाले घने जंगलों का न तो देश की बढ़ती आबादी से कोई मेल बनता है, न ही दिनोंदिन खड़ी होती आवासीय कॉलोनियों और सड़क, रेलवे, ‘नदी जोड़ो’ जैसी परियोजनाओं से, जिन्हें समवेत रूप से हम ‘विकास’ मानने लगे हैं। इन दबावों के बीच अगर हम सचमुच बाघ बचाने में कामयाब होते हैं तो दुनिया मानेगी कि भविष्य को लेकर हमारी समझ एकांगी नहीं है।

कब कितने बाघ: 2006: 1,411, 2010: 1,706, 2014: 2,226, 2018: 2,967

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