जब नुसरत ने सिंदूर लगाया तो धार्मिक बहसें हुई। जब झारखंड की एक हिंदू लड़की को अदालत ने कुरान बांटने की सजा दी तो भी बहसों में जम के हिंदू-मुसलमान हुआ। कोलकाता में एक मुस्लिम औरत ने सड़क पर हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ किया तो भी बहसें हुई
अगर अपने खबर चैनलों की पिछले पंद्रह-बीस दिन के प्राइम टाइम में आयोजित बहसों का आकलन करें तो मालूम होगा कि हमारे खबर चैनलों का अधिकांश समय कई दैनिक खबरों को हिंदू-मुसलमान का मुद्दा बनाने में गुजरा है। अब तक यह काम कुछ कट्टरतावादी हिंदू-मुसलमान नेता दूसरे समुदाय के बारे में एकाध कुबोल बोलकर किया करते थे। अब तो कहीं पत्ता भी गिरता है तो कई खबर चैनल पूरे दिन हिंदू-मुसलमान प्रवक्ताओं की कुश्ती करते रहते हैं। अब तक ऐसी बहसों में कुछ हिंदुत्ववादियों और कुछ इस्लामवादियों के साथ कुछ सेक्युलर बुद्धिजीवी, कुछ स्वतंत्र पत्रकार बहस में आते थे।
अब प्राय: हिंदुत्ववादी आते हैं, या इस्लामवादी। मानो समूचा सामाजिक जीवन सिर्फ कट्टर किस्म के धर्मिक मानी रखता हो। और इन दिनों की बहसों में एक ओर स्वनामधन्य दो-तीन ‘‘हिंदू एक्सपर्ट’ बिठा लिए जाते हैं तो दूसरी ओर दो-तीन मुस्लिम एक्सपर्ट। ये हिंदू या मुस्लिम एक्सपर्ट कौन-सी डिग्री है भाई? और इस तरह हर हिंदू या मुसलमान की अपनी विविधता पर पाटा फिरवाते रहते हैं। मानो सारे हिंदू एक जैसे हों और सारे मुसलमान एक समान हों।
पिछले पंद्रह-बीस दिनों की मुख्य टीवी बहसों का आकलन करें तो हम पाते हैं कि उनमें विभानजनकारी धार्मिक मुद्दों पर सबसे अधिक समय खर्च किया गया है। और ऐसे धार्मिक चिह्न इस बार संसद के सत्र के साथ लाइव प्रसारित होते दिखे। संसद में ‘‘जै श्री राम’ हुआ तो ‘‘अल्लाहो अकबर’ भी हुआ।
‘‘भारत माता की जय’ हुआ, ‘‘वंदे मातरम्’ हुआ तो ‘‘जय भीम जय मीम’, ‘‘जय हिंद’ हुआ। यों सामान्य व्यवहार में दो लोग आपस में एक दूसरे का अभिवादन करने के लिए ऐसे शब्दों को बोलते हैं, लेकिन यही जब प्रसारित हुए तो वे किसी अभिवादन की तरह नहीं आए बल्कि आपस में कंपटीशन करते नजर आए। और फिर यही टीवी की बहसों में आकर और भी मानीखेज हो गए। और जब यही सोशल मीडिया में आए होंगे तो क्या न हुए होंगे? लगभग हर चैनल ने इन पर बहसें कराई और दो धर्मो के कथित प्रवक्ता घंटों एक दूसरे के आमने सामने रहे। जितनी देर आमने-सामने रहे उतनी देर हमारे कान या तो अधिक हिंदू होते रहे या अधिक मुसलमान होते रहे। वे हमारी चेतना को एक न एक धार्मिक कट्टरता की ओर ठेलते रहे।
जितनी देर ऐसा हुआ, उतनी देर सांप्रदायिक वातावरण बनता रहा। जब नुसरत जहां ने सिंदूर लगाया तो भी धार्मिक बहसें हुई। जब दिल्ली के हौजकाजी में दो पड़ोसी जरा-सी बात पर झगड़ बैठे तो हर चैनल पर तीन दिन तक धार्मिक प्रतीकों को लेकर विवाद होते रहे। फिर जब झारखंड की एक हिंदू लड़की को एक हेट-पोस्ट के कारण एक अदालत ने कुरान बांटने की सजा दी तो भी बहसों में जम के हिंदू-मुसलमान हुआ। फिर जब कोलकाता में एक मुसलमान औरत ने सड़क पर जाकर हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ किया तो भी ऐसी ही धार्मिक कट्टरतावादी बहसें हुई और अब जब आजम खान ने कह दिया है कि हम अपने पुरखों के सैंतालीस में पाकिस्तान न जाने की सजा भुगत रहे हैं तो भी ऐसी ही धार्मिक विभाजनकारी बहसें होंगी।ऐसी बहसों की परिणति अक्सर इस तरह होती है कि हिंदू दर्शक को इस्लाम वालों की बातें खासी पिछड़ी हुई, कट्टरतावादी और आजादी विरोधी लगती हैं।
आम हिंदू सोचता है वे कुरान और हदीस से बाहर नहीं निकलते और इस तरह अपनी कट्टरता छिपाकर इस्लाम के मुकाबले एक उदार सा चेहरा ओढ़ लेता है। ऐसे हिंदू तकरे का एक आम मुसलमान पर वैसा ही असर होता है, जैसा आम हिंदू पर इस्लामवादी तकरे का। इस तरह ऐसा सतही बौद्धिक माहौल बनता रहता है कि जिसमें एक दूसरे के प्रति सहनशीलता, सह-अस्तित्व और मित्रता की भावना कम से कमतर होती जाती है और परस्पर बढ़ती दूरी और तीखी घृणा उनकी जगह लेने लगती है।
अगर आज जरा सी बात या अफवाह मात्र पर एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय के आदमी को लिंच कर डालते हैं, मार डालते हैं, घरों पर हमला कर देते हैं तो उसके पीछे अन्य बहुत से कारणों के अलावा खबर चैनलों द्वारा नित्य बनाया जाता ‘‘हिंदू-मुस्लिम’ वाक्युद्ध है जो अंतत: असहिष्णुता, घृणा और एक प्रकार के मानसिक ‘‘धर्मयुद्ध’ में बदलता रहता है।एक ओर ‘‘तीन ट्रिलियन’ की इकोन्ॉमी बनाने का बड़ा सपना, दूसरी ओर टीवी में आती एक से एक जहरीली बहसें एक दूसरे के प्रति विास और मित्र-भाव बढ़ाने की जगह ‘‘अविास’ और ‘‘संदेह’ ही बढाती हैं। ऐसे ‘‘अविासी’ वातावरण में ‘‘सबका विास’ कैसे अर्जित किया जा सकता है?
- सुधीश पचौरी से साभार







