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    नाटकीय अंदाज का धरना

    By June 13, 2018 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री 
    भारतीय राजनीति में धरना बहुत प्रचलित शब्द है। महात्मा गांधी ने इसे अंग्रेजों के खिलाफ हथियार बनाया था। स्वतंत्रता के बाद भी अनेक परिवर्तनकारी धरने देखे गए। दिल्ली के मुख्यमंत्री को यह धरोहर समाजसेवी अन्ना हजारे से मिली। लेकिन केजरीवाल ने इसे हर बार नए कलेवर में पेश करते है। अन्ना हजारे का अनशन केजरीवाल के हांथों में पहुंच कर नाटक की भांति लगने लगा है। शायद यही कारण है कि अन्ना , अरविंद के पूर्व सहयोगी कुमार विश्वास, कांग्रेस और भाजपा सभी ने उनके धरने को नाटक करार दिया है। कुछ लोग तो इसे प्रहसन भी बता रहे है। नाट्यशास्त्र में प्रहसन का भी बड़ा महत्व है। जब कोई गंभीर नाटक बोझिल होने लगता है, तब प्रहसन का सहारा लिया जाता है। हल्के मनोरंजन से दर्शकों को बांधे रखने का प्रयास होता है। अरविंद केजरीवाल और उनके मंत्रियों को राजनिवास में धरना देते हुए देखना ऐसा ही है।
    उन्होंने धरने को नए अंदाज में प्रस्तुत किया है। समय के साथ नई नई विधाओं का समावेश होता है। जब वह पिछली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब रजाई गद्दा लेकर राजपथ के समीप खुले में धरना दिया था। तब मफलर धारण किये हुए उनका किरदार खूब चर्चित हुआ था।
    इस बार वह नए रूप में दिखाई दिए। धरना बन्द कमरे में था। जिस कमरे को रंगमंच बनाया गया ,वह केजरीवाल या उनके किसी सहयोगी का नहीं था। यह राजनिवास अर्थात दिल्ली के उपराज्यपाल का सरकारी निवास  था। पर्दा उठते ही मोहक दृश्य सामने आता है। राजनिवास के आलीशान सोफे है, एक सोफे पर अरविंद केजरीवाल लेटे है, शांतभाव, कहीं कोई परेशानी या तनाव नहीं है । जैसे योगनिद्रा को सिद्ध कर लिया है। दूसरे सोफे पर गोपाल राय पसरे है। लेकिन वह विचलित दिखाई देते है। बेचैनी में  दूसरी तरफ देख रहे है। मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन बैठे हुए है। ऐसा लग रहा है जैसे किसी प्रसन्नता को छिपाने की कोशिश कर रहे है।
    जाहिर है कि केजरीवाल और उनकी टीम नए अंदाज में है। मफलर बांध कर सड़क पर धरने की तकनीक पुरानी हुई। अब राजनिवास का वातानुकूलित कक्ष है, आरामदेह सोफा है, उस पर दिल्ली के नाम पर धरना है।
    दृश्य तो बदले है , लेकिन पटकथा लगभग वही है। केजरीवाल ने एक प्रकार से अपनी विफलता स्वीकार कर ली है। न नौ मन तेल होगा, न दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा, न अरविन्द केजरीवाल कोई काम करेंगे। राजनिवास के सोफे पर लेटे हुए उनकी फोटो का यही प्रतीकात्मक महत्व है। उनका आरोप भी उपराज्यपाल पर है। कहते है कि उपराज्यपाल कार्य नहीं करने देते। इसके पहले नजीब जंग से भी उनका विवाद चलता था।
    नजीब जंग के समय में भी अरविंद केजरीवाल सामान्य प्रक्रिया का पालन किये बिना ही प्रस्ताव भेज देते है। वह इस अंदाज में कार्य कर रहे थे, जैसे पूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री हों। लेकिन प्रक्रिया पालन न होने के कारण उनके प्रस्ताव विधिक आधार पर वापस भेज दिए जाते थे। केजरीवाल इसे ही हथियार बना लेते थे। वह कहते थे के देखिये नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कहने पर  उपराज्यपाल उनको कार्य नहीं करने दे रहे है। जबकि कमी केजरीवाल की तरफ से होती थी। यही रुख आज तक जारी है।
    ऐसा भी नहीं कि केजरीवाल के लिए ही दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का राज्य बना दिया गया है। इसी स्थिति में मदनलाल खुराना, साहब सिंह वर्मा और शिला दीक्षित ने मुख्यमंत्री के रूप में बेहतर ढंग से कार्य किया। अधिकार बढ़ाने की बात ये लोग भी करते थे । लेकिन इसके लिए कभी नाटक का सहारा नहीं लिया।
    केजरीवाल ने तीन मांगों को मंजूर किए जाने तक धरने पर रहने का ऐलान किया था। उनके साथ  उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन और श्रम मंत्री गोपाल राय उपराज्यपाल से मिलने राजनिवास गए थे। ये लोग राजभवन के वेटिंग रूम में बैठे रहे, जबकि उपराज्यपाल अपने दफ्तर से आवास पर चले गए। केजरीवाल तीन मांगों को लेकर धरने पर है।  पहली यह कि दिल्ली सरकार में कार्यरत भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारियों की हड़ताल खत्म कराई जाए। दूसरी, काम रोकने वाले आईएएस अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए और तीसरी मांग है कि राशन की दरवाजे पर आपूर्ति की योजना को मंजूर किया जाए। दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पर कथित मारपीट के बाद आईएएस पिछले करीब चार माह से हड़ताल पर हैं।
    दिल्ली पूर्ण राज्य बना तो हर वोट भाजपा को आप सरकार ने दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने का प्रस्ताव विधानसभा में रखा। इसके पास होने के बाद केजरीवाल ने कहा यदि केंद्र सरकार लोकसभा चुनाव से पहले दिल्ली को पूर्ण राज्य बना दे तो वह भाजपा के लिए बोट मांगेंगे।
    जबकि  कांग्रेस ने इसे नाकामियों को छुपाने वाला नाटक बताया है। भाजपा ने आम आदमी पार्टी को ड्रामा कंपनी बताया है। वैसे संवाद लेखन में कुछ कमी रह गई। एक तरफ केजरीवाल की शिकायत है कि उपराज्यपाल कार्य नहीं करने देते। फिर कहा उपराज्यपाल पर्याप्त अवरोध उत्पन्न नहीं कर पा रहे है।
     प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उपराज्यपाल अनिल बैजल से बहुत नाराज हैं, क्योंकि वह आम आदमी पार्टी सरकार के लिए पर्याप्त अवरोध पैदा नहीं कर पा रहे हैं। इसके बाद कहा कि  उपराज्यपाल के सभी अवरोधों के बावजूद, दिल्ली सरकार लोगों के लिए जबरदस्त काम कर रही है।
    केजरीवाल क्या कहना और करना चाहते है ,यह स्पष्ट नहीं है। एक तरफ वह दावा करते है कि उनकी सरकार बहुत अच्छा कार्य कर रही है। जब अच्छा कार्य कर रही है ,तो धरने और झगड़े में समय क्यों बर्बाद कर रहे है। दूसरा यह कि यदि अनिल बैजल अवरोध उतपन्न नहीं कर पा रहे है , तब तो बहुत अच्छा। बकौल केजरीवाल इसके लिए मोदी उपराज्यपाल से नाराज है ,तो बने रहें। केजरीवाल को क्या कठिनाई है। उनका काम तो चल रहा है।
    अरविंद केजरीवाल लोगों को भृमित करने का प्रयास कर रहे है। वह दिल्ली की संवैधानिक स्थिति जानते है। इसी में रहकर उनको कार्य करने का जनादेश मिला है ,और इसी में रहकर उनको कार्य करना है। लेकिन नाकामियां छिपाने के लिए वह पूर्ण राज्य का मुद्दा उठा रहे है। यही स्थिति अधिकारियों से कार्य लेने के संबन्ध में है। केजरीवाल नियमों को ताख पर रख कर कार्य करना चाहते है। यह अधिकारियों की परेशानी है। अनिल बैजल ने साफ कहा है कि केजरीवाल बेवजह मुद्दा बना रहे है। अधिकारी किसी प्रकार की हड़ताल पर नहीं है। अधिकारियों में केजरीवाल सरकार के प्रति अविश्वास का माहौल है। वह डरे हुए है। केजरीवाल उनकी सलाह के बावजूद स्थिति सामान्य बनाने में नाकाम है। इसके पहले बैजेल ने वही प्रताव वापस भेजे थे ,जिन्हें मनमाने ढंग से प्रेषित कर दिया गया था। केजरीवाल भी अपनी विश्वशनियता खो चुके है। दूसरों पर आरोप लगा कर उन्होंने राजनीति में अपनी जगह बनाई थी । अपने को ईमानदार औरों से अलग और नई राजनीति करने वाला बताया था। लेकिन उन सभी आरोपों के लिए माफी मांगनी पड़ी। प्रधानमंत्री और उपराज्यपाल पर लगाये जा रहे उनके आरोपों को भी कोई गंभीरता से नहीं ले रहा है। न उनके धरने के प्रति दिल्ली की जनता ने सहानुभूति दिखाई।

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