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घाटी में शांति बहाली के कदम

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टिप्पणी: डॉ दिलीप अग्निहोत्री
जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन जल्दीबाजी में लिया गया निर्णय नहीं था। केंद्र ने कुछ महीने पहले दिनेश्वर शर्मा को दूत बनाकर भेजा था। वह घाटी के सभी पक्षों से मिलकर रिपोर्ट बना रहे थे। पीडीपी से समर्थन वापसी के कुछ समय पहले ही केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह जम्मू कश्मीर गए थे। वहां उन्होंने सभी पक्षों से मिलकर हालात का जायजा लिया था। राष्ट्रपति शासन लगने के बाद राजनाथ पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत अपने निर्वाचन क्षेत्र लखनऊ आये थे।
इस दौरान उनके बयानों से स्पष्ट हुआ कि सरकार वह कदम भी उठा सकती है, जो महबूबा मुफ्ती के साथ गठबन्धन में संभव नहीं थे। चुनाव का समय करीब आते ही महबूब की अलगाववादियों, आतंवादियों, और पाकिस्तान के प्रति हमदर्दी बढ़ गई थी। वह प्रत्येक हिंसक गतिविधि के बाद वार्ता की आवश्यकता बताने लगी थी।
इससे भारत विरोधी तत्वों के हौसले बुलंद हो रहे थे। महबूबा का यह रुख न्यूनतम साझा कार्यक्रम के विरुद्ध था। ऐसे में भाजपा के सामने समर्थन वापस लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। राष्ट्रपति शासन के साथ ही बड़े बदलाव की आहट सुनाई देने लगी है। चर्चा है कि केंद्र  यहां शांति बहाली के लिए कठोर कदम उठाने का मन बना चुका। उसकी तैयारी इसी दिशा में बढ़ रही है।
राजनाथ सिंह ने कहा कि सरकार आतंकवाद बर्दाश्त नहीं करेगी। और जल्दी आंतकी सगठनों पर शामत आने वाली है। इसके लिए  अभियान चलाया जाएगा। राज्य में शांति बहाल करना मोदी सरकार के शीर्ष एजेंडे में शामिल है। आतंकवादी संगठनों को किसी भी तरह की अप्रिय घटना को लेकर चेतावनी दी गई है। यह भी कहा गया कि सुरक्षाबल ऐसे किसी भी प्रयास को विफल करने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा राज्यपाल के स्वर भी बदले है।
उन्होंने भी आतंकियों के साथ सख्ती की बात कही है। वीरप्पन को मारने वाले पुलिस अधिकारी विजय कुमार को राज्यपाल का सलाहकार बनाया गया है। ऑपरेशन आलआउट अभियान चलता रहेगा। नेशनल सिक्युरिटी गार्ड को पहली बार आतंक वीरोधी ग्रिड में शामिल किया जा रहा है। यह अन्य सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण भी देगा।

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