डॉ दिलीप अग्निहोत्री
किसी को यह उम्मीद नहीं थी बंगलुरू का विपक्षी उबाल इतनी जल्दी ठंडा पड़ जायेगा। एक तो बंगलुरू में ही हास्यस्पद स्थिति बन गई। इतने दिन बीतने के बाद केवल मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री ही मंत्रिमंडल की शोभा बढ़ा रहे है। दूसरी तरफ अपने अपने प्रान्तों में पहुंचते ही अनेक नेताओं के स्वर बदल गए। इनमें मायावती और ममता बनर्जी भी शामिल है। दोनों ने गठबन्धन के लिए शर्ते लगा दी है। इतना ही नहीं बसपा प्रमुख मायावती ने परिवारवाद पर सपा,कांग्रेस, रालोद को नीचा दिखाया है। अपने को उनसे अलग दिखाने का प्रयास किया। ममता बनर्जी कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को बी टीम की तरह रखना चाहती है। इससे पहले उस गठबन्धन सरकार पर संकट के बादल दिखने लगे, जिसके जश्न में विपक्षी नेता यहां एकत्रित हुए थे।सिद्धांत और बिना शर्त समर्थन की जगह मलाईदार मंत्रालय चर्चा में आ गये। इतना ही नही विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस और जेडीएस ने अपने अपने प्रत्याशी हटाने से इनकार कर दिया। जेडीएस प्रमुख देवगौड़ा ने कहा कि समझौता सरकार बनाने के लिए है। इसका चुनाव से कोई संबन्ध नहीं है। ममता बनर्जी ने कोलकत्ता पहुंच कर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मानने से इनकार कर दिया। इधर लखनऊ में बसपा प्रमुख मायावती ने गठबन्धन से उचित दूरी बनाने वाले परिवर्तन किए। उन्होंने कैराना और नूरपुर से अपनी पार्टी को अलग रखा। जबकि बंगलुरू के मंच की जुगलबंदी अलग कहानी बयां कर रही थी । ऐसा लग रहा था जैसे इन सभी नेताओं ने अपने मतभेद भुला दिए है। नेतृत्व और नीति को लेकर कोई बाधा नहीं रहेगी। सब लोग एक दूसरे से ऐसे मिल रहे थे ,जैसे मुद्दतों पहले बिछड़ गए थे। भला हो नरेंद्र मोदी का उनकी वजह से सब फिर से मिल सके है। इस मुलाकात में फोटो के माध्यम से भी कई सन्देश देने के प्रयास किये गए थे।
कुछ चित्र ज्यादा चर्चित भी हुए थे। इनमें सोनिया गांधी, ममता बनर्जी,और मायावती की फोटो, राहुल और कुमारस्वामी की फोटो, अखिलेश यादव और मायावती की एक साथ फोटो विशेष रूप से चर्चित हुई थी। अखिलेश और मायावती पहली बार एक साथ किसी मन्च पर थे। यहां तक कहा गया कि उत्तर प्रदेश में चुनाव के लिए गठबन्धन को जोरदार फोटो मिल गई है। सोनिया, ममता और मायावती की मुलाकात को भी भावी रणनीति से जोड़ा गया। वैसे कुछ लोगों ने यह भी कहा कि इन तीनों के बीच भाषा की समस्या अवश्य रही होगी। किसने क्या कहा, दूसरे ने क्या समझा होगा, इसे लेकर कौतूहल था। फिर भी तालमेल की बात मुकम्मल लग रही थी। राहुल और कुमारस्वामी दोनों उत्तराधिकारी है ।
मायावती ने लखनऊ में बसपा के राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान पार्टी के संविधान में बदलाव करते हुए अब किसी भी राष्ट्रीय अध्यक्ष के रिश्तेदार को पार्टी में पद ना देने की घोषणा की है। इसके साथ ही पार्टी के नए संविधान में किसी भी राष्ट्रीय अध्यक्ष के रिश्तेदार के चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी गई है। मायावती ने आगे का एजेंडा भी तय कर दिया। कहा कि मैं अगले बीस बाइस सालों तक पार्टी की मुखिया रहूंगी, तब तक कोई और सपना न देखे।
उन्होंने कहा कि पार्टी किसी भी राज्य में और किसी भी चुनाव में किसी भी पार्टी के साथ केवल सम्मानजनक सीटें मिलने पर ही वहां उस पार्टी के साथ कोई चुनावी गठबन्धन-समझौता करेगी अन्यथा हमारी पार्टी अकेली ही चुनाव लड़ेगी।
मायावती ने बिना नाम लिए सपा और रालोद को सन्देश दे दिया है। वह जानती है कि सदन में सदस्य संख्या के हिसाब से उनकी स्थिति सपा से कमजोर है। सपा के लोकसभा में सात सदस्य है । बसपा का वहाँ खाता भी नहीं है। विधानसभा में सपा के सैंतालीस और बसपा के उन्नीस सदस्य है। यदि इसके आधार पर सीटों का बंटवारा होगा तो बसपा घाटे में रहेगी । इसलिए मायावती ने सम्मानजनक सीटों का मसला उठा दिया है। यह दबाब की रणनीति हो सकती है। गोरखपुर और फूलपुर में मायावती ने सपा को सशर्त समर्थन दिया था। तब उनकी शर्त थी कि विधानपरिषद और राज्यसभा चुनाव में सपा उनके उम्मीदवार का समर्थन करे ,तो वह गोरखपुर और फूलपुर में सपा को समर्थन देंगी। लेकिन कुछ ही समय में मायावती ने दूसरी शर्त लगा दी । कितनी सीट सम्मानजनक मानी जायेगी ,इसका निर्णय भी मायावती ही करेंगी। कैराना और नूरपुर में बसपा ने किसी का समर्थन नहीं दिया। वह यहां के पचड़े में पड़ना नहीं चाहती थी।
इतना ही नहीं मायावती ने अपनी पार्टी को सपा, कांग्रेस, रालोद से अलग दिखाने का प्रयास किया है। मायावती ने अपने भाई को पार्टी उपाध्यक्ष पद से हटा दिया। इस कदम से यह बताया कि उनकी पार्टी में परिवारवाद नहीं है। जबकि कांग्रेस, सपा ,रालोद परिवारवादी पार्टी है। ये बात अलग है कि ऐसा करते समय मायावती बसपा को व्यक्ति आधारित पार्टी के रूप में प्रतिष्ठित कर रही थी। उन्होंने अपनी वृद्धावस्था तक का इंतजाम कर लिया है। अभी चोट के कारण घुटनों में दर्द बताया। फिर उम्र के उस पड़ाव का भी उल्लेख किया, जब उन्हें भागदौड़ में कठिनाई होगी। लेकिन तब भी पार्टी पर अंतिम नियंत्रण उन्हीं का होगा। वही राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त करेंगी । वह उनके ही मार्गदर्शन में चलेगा। बताया जाता है कि बसपा समर्थकों का एक वर्ग सपा और रालोद के साथ गठबन्धन से खुश नहीं था। इसे मायावती का अखिलेश के साथ मन्च साझा करना भी ठीक नहीं लगा था। क्योंकि गेस्ट हाउस कांड के बाद दोनों पार्टियों के बीच जो स्थिति रही है उसके साथ ऐसी तस्वीरें प्रसन्नता प्रदान नहीं करती। वैसे भी बसपा के वोटबैंक में भाजपा सेंधमारी कर चुकी है। मायावती के रुख में शायद इसी के मद्देनजर बदलाव आया है।







