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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    गांधी व आंबेडकर की अवहेलना का उपवास

    By April 9, 2018 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    महात्मा गांधी अहिंसा और डॉ आंबेडकर संवैधानिक व्यवस्था के प्रबल हिमायती थे। दोनों महापुरुष अपने इस आग्रह से समझौता के लिए कभी तैयार नहीं थे। महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन से देश आजाद हुआ, स्वतंत्र भारत को डॉ आंबेडकर ने संवैधानिक तंत्र से चलाने का प्रावधान किया था। यह भी अहिँसा का ही मार्ग था।
    दो अप्रैल को जो अंदोलन हुआ, उसे गांधी और आंबेडकर के सिद्धांतों के अनुकूल नहीं कहा जा सकता। महात्मा गांधी होते तो इस आंदोलन को वापस ले लेते। आंबेडकर होते तो न्यायिक निर्णय के खिलाफ सड़कों पर आंदोलन की इजाजत नहीं देते। पुनर्विचार याचिका का सहारा लेने का अधिकार दिया गया है। न्यायिक निर्णयों के खिलाफ जनांदोलन होने लगे तो, देश में संवैधानिक व्यवस्था को बनाये रखना मुश्किल हो जाएगा।
    बिडंबना देखिये, हिंसा के कारण महात्मा गांधी आंदोलन वापस लेते है। राहुल गांधी की कांग्रेस ने हिसा के बाबजूद उपवास का आडंबर कर रही है।
    कांग्रेस अपने को सबसे पुरानी पार्टी कहती है। इसमें वह एओ ह्यूंम से लेकर गांधी की अवधि को जोड़ती है। ऐसे में राहुल गांधी को यह जबाब देना चाहिए कि यह महात्मा गांधी की कांग्रेस है तो, जिस आंदोलन में कई लीग मारे गए, उसके लिए उपवास का क्या मकसद है। क्या यह कांग्रेस चाहती है कि हिसा फैलाने वालों को अभयदान दिया जाय।
    इसके अलावा यह भी बताना होगा कि यह पुरानी कांग्रेस है तो डॉ आंबेडकर को दो बार संसद में पहुंचने से क्यों रोका गया। क्यों उन्हें कांग्रेस ने भारतरत्न नहीं दिया। सवाल बसपा प्रमुख मायावती से भी है। उन्हें बताना चाहिए कि क्या ऐसे आंदोलन डॉ आंबेडकर के विचारों के अनुरूप है। उनके पास यह कहने का क्या आधार है कि सरकार दलितों को फंसा रही है।
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     ये वह मायावती है, जिन्होंने एससीएसटी एक्ट के दुरुपयोग होना स्वीकार किया था, उसे रोकने का शासनादेश जारी किया था। यही मंशा सुप्रीम कोर्ट के आदेश में है। तब भाजपा दलित वीरोधी हो गई।
    कांग्रेस के उपवास, बसपा के विरोध से कई सवाल उठते है। क्या हिंसा और आगजनी करने वालों के खिलाफ कानून को अपना कार्य नहीं करना चाहिए। सरकार कह रही है कि सीसीटीवी फुटेज देखकर ही अराजक तत्वों की पहचान की जा रही है। ऐसे में यह आरोप शरारतपूर्ण है कि सरकार दलितों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है बल्कि सरकार की कार्रवाई से वह चेहरे सामने आएंगे, जिन्होंने हिंसा फैलाई।
    इसका स्वागत करना चाहिए थे। डॉ आंबेडकर में आस्था रखने वाले ऐसा नही कर सकते। जिन्होंने गड़बड़ी की, उन्हें  कठघरे में पहुंचाने का कार्य वैधानिक व्यवस्था के अनुरूप है। जो सरकार ऐसा नहीं करती, उसे कर्तव्यों के प्रति लापरवाह समझना चाहिए। इस मामले में सरकार कर्रवाई कर रही है, लेकिन यह क्यों न माना जाए, की विपक्ष अराजक तत्वों को बचाना चाहती है।
    सवाल और भी है। क्या महात्मा गांधी ने यह नहीं कहा था कि हिंसा के बल पर उन्हें आजादी मंजूर नहीं है। आज कांग्रेस का उपवास किस प्रकार के आंदोलन के पक्ष में है।
    बसपा भी जबाबदेह है। यह सत्य रिकॉर्ड पर है कि मायावती ने एक्ट का दुरुपयोग रोकने का प्रयास किया था। मतलब वह मानती थी कि दुरुपयोग होता था। दलितों का उत्पीड़न न हो, साथ में कोई निर्दोष भी परेशान न हो, यही तो न्याय की भावना है। वैसे केंद्र की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट विचार करेगा। तब तक इंतजार करना चाहिए था। लेकिन कांग्रेस को कर्नाटक की चिता है। बसपा सक्रियता नहीं दिखायेगी तो गठबन्धन में उसे मनचाही अहमियत नहीं मिलेगी।
    इन की नजर केवल चुनाव पर है। इसके लिए इन्हें गांधी आंबेडकर की अवहेलना में भी संकोच नहीं है। दोनों महापुरुष अहिंसक आंदोलन,प्रदर्शन, सत्याग्रह पर विश्वास रखते थे। महात्मा गांधी ने इसी मार्ग पर स्वयं अमल किया था। डॉ आंबेडकर ने संविधान में शांतिपूर्ण आंदोलन का अधिकार दिया।
    यहां शांतिपूर्ण आंदोलन को लेकर कोई सवाल नही है। लेकिन दो अप्रैल को जिस प्रकार आंदोलन किया गया, वह गांधी और आंबेडकर दोनो के सिद्धांतों की अवहेलना करने वाला है। इस आंदोलन में हिंसा हुई थी। दर्जनों लोग हताहत हुए। यह महात्मा गांधी के विचारों के प्रतिकूल था। असहयोग आंदोलन प्रभावी ढंग से आगे बढ़ रहा था। लेकिन तभी चौरी चौरा में हिंसा हो गई। महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया था।
    डॉ आंबेडकर अहिंसक आन्दोलन को प्रजातन्त्र के अनुकूल मानते थे। लेकिन उन्होंने हिंसा, आगजनी को दण्डनीय माना था। इसके अलावा  संविधान में कार्यपालिका, व्यवस्थापिक और न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र निर्धारित किये। इसके अनुरूप व्यवस्थापिका और कार्यपालिका की अपेक्षा न्यायपालिका की स्थिति अलग है। उसे संविधान के संरक्षक की भूमिका में रखा गया। न्यायिक निर्णय से असहमति की स्थिति में आंदोलन को उचित नहीं कहा जा सकता ।
    कांग्रेस का उपवास गांधी और आंबेडकर के विचारों को अपमानित करने वाला है।
    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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