स्मृतियों में अटल

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
देश में ऐसे असंख्य लोग है,जिन्हें अटल जी के साथ संवाद या कार्य करने का अवसर मिला। इस क्रम में लालकृष्ण आडवाणी शिखर पर है। अटल और आडवाणी जैसे बंधुत्व का राजनीति में अन्य कोई उदाहरण नहीं है। नरेंद्र मोदी के यहां तक पहुंचने का आधार अटल जी ने ही बनाया था। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक की भी उनसे मित्रता आधी शताब्दी की थी। गृह मंत्री राजनाथ सिंह के शुरुआती दौर में अटल जी का पूरा आशीर्वाद था। ये सभी नेता समय समय पर अटल जी के साथ अपनी याद साझा करते रहे है। इनके माध्यम से अटल जी के राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय विशेषताओं का बखूबी आकलन किया जा सकता है। उनकी दूरदर्शिता बेजोड़ थी।
अटल और आडवाणी संयुक्त राजनीतिक यात्रा एक मिसाल के तौर पर पहचानी जाएगी। इतने लंबे सफर में समाज और राष्ट्रसेवा का ही भाव था, स्वार्थ और अहम के लिए कोई जगह नहीं थी। ऐसा भी नहीं शतप्रतिशत मसलों पर इनकी आपसी सहमति होती थी। कई बार दोनों एक दूसरे के निर्णय से असहमत होते थे। लेकिन असहमति भी उचित फोरम तक रहती है। अटल की बात मानी गई ,तो आडवाणी पीछे हो गए, आडवाणी की बात मानी गई ,तो अटल पीछे हो गए। इस तरह इनका राजनीतिक सफर चलता रहा। इन्होंने भाजपा के वैचारिक आधार को व्यापक और मजबूत बनाया।
नरेंद्र मोदी ने ट्वीट के द्वारा अपनी स्मृतियां साझा की। मोदी संगठन के कार्य हेतु राजनीति में भेजे गए थे।  उसी में उन्हें आनन्द मिलता था। स्वयं नेपथ्य में रहकर वह पार्टी को आगे बढाने में लगे थे। यह अटल जी की पारखी नजर थी , जिसने मोदी के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचाना। मोदी ने ट्वीट पर अपने उदगार व्यक्त किये। कहा यह अटल जी ही थे जिन्होंने मुझे अक्टूबर दो हजार एक में  शाम को बुलाया और मुझे मुख्यमंत्री के रूप में गुजरात जाने को कहा। जब मैंने उनसे कहा कि मैंने हमेशा संगठन में ही काम किया है तो उन्होंने कहा कि उन्हें विश्वास है कि मैं लोगों की उम्मीदों को पूरा करूंगा। इससे अटल जी की दूरदर्शिता का अनुमान लगाया जा सकता है। अमेरिका के साथ पांच दशकों के संबंधों को पांच साल में स्थायी रणनीतिक साझेदारी में बदल दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने सोवियत संघ के बाद के दौर में रणनीतिक साझेदारी के माध्यम से रूस के साथ भारत की गहरी दोस्ती को भी आगे बढ़ाया।
दो हजार एक में रूस की यात्रा पर मोदी को उनके साथ जाने का मौका मिला था गुजरात और आस्ट्रखन के बीच समझौता किया था। सीमा वार्ता के लिए विशेष प्रतिनिधियों के तंत्र की स्थापना करके चीन के साथ शांति के लिए कदम उठाया। पहले पड़ोस नीति उनकी ही प्रेरणा हैं। शांति की तलाश में वह लाहौर गए। नब्बे के दशक के मध्य में अर्थव्यवस्था को परेशानी से बचाया, जब देश में राजनीतिक अस्थिरता और अनिश्चित वैश्विक माहौल से प्रारंभिक आर्थिक सुधार प्रक्रिया के लिए खतरा पैदा हो गया था। आर्थिक सफलता के बीज बोए। उनके लिए, विकास कमजोरों को अधिकारसंपन्न बनाने तथा वंचितों को मुख्यधारा में लाने का साधन था। यही वह दृष्टिकोण है जो हमारी सरकार की नीति को दिशा देता रहेगा।
राम नाईक उन्नीस सौ अस्सी  भारतीय जनता पार्टी  मुंबई के अध्यक्ष थे। तब मुंबई में आयोजित पार्टी के प्रथम अधिवेशन में अटल जी ने कहा था कि ‘अंधेरा छटेगा, सूरज उगेगा और कमल खिलेगा’। इसी अधिवेशन में न्यायमूर्ति छागला कहा था कि मेरे सामने मिनी इण्डिया है और मेरे दाहिनी ओर बैठे अटल जी में मैं भविष्य का प्रधानमंत्री देख रहा हूं। यह भविष्यवाणी बाद में सफल भी हुई। 1998 में विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव लाने पर अटल जी ने कहा था कि वे किसी अनुचित प्रकार से वोट नहीं जुटायेंगे, सरकार गिरने की स्थिति में पुनः जनता के समक्ष जायेंगे। चौबिसपार्टियों के सहयोग से बनी सरकार एक वोट से गिर गयी थी। राजनीति में सात्विकता का ऐसा उदाहरण उनके जैसा विराट व्यक्तित्व ही प्रस्तुत कर सकता है।
राम नाईक ने बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी से उनका 1962 से व्यक्तिगत एवं राजनैतिक संबंध रहा है। राम नाईक उन्नीस सौ चौरानवे में कैंसर रोग से ग्रस्त थे। तब अटल जी अनेक बार उनका हाल-चाल जानने मुंबई आवास आते थे। निराश न होने की प्रेरणा देते थे।  कैंसर रोग पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती 25 सितम्बर 1994 को आयोजित कार्यवृत्त प्रकाशन के कार्यक्रम में अटल जी आये थे। उन्होंने कहा कि आये हुये जनसमूह को देखकर ईष्र्या होती है कि रामभाऊ कितने लोकप्रिय हैं। आप मृत्यु के दरवाजे से वापस आये हैं। बोनस में मिला जीवन इस बात का संकेत है कि आगे देश और समाज के लिए और काम करना है। अटल जी के ऐसे वचन सुनकर राम नाईक ने ‘पुनश्च हरि ओम्’ कहकर अपना कार्य प्रारम्भ किया।
 नाईक उनकी सरकार में  पेट्रोलियम मंत्री थे। उनके सुझाव पर कारगिल युद्ध के शहीदों के परिजन के पुनर्वास के लिए पेट्रोल पम्प और गैस एजेन्सी देने के निर्णय को अटल जी ने स्वीकार किया था।
राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री, केंद्र में भूतल परिवहन और कृषि जैसे महत्वपूर्ण विभाग का मंत्री बनाने के निर्णय अटल जी ने लिए थे।
अस्सी के दशक में राजनाथ सिंह मिर्जापुर से चुनाव लड़ रहे थे। अटल जी नगर के घण्टाघर मैदान में जनसभा को संबोधित करने आये थे। संबोधन के बाद उन्हें बताया गया कि कुछ बैलेट पेपर बाहर पाए गए है। सरकार के इशारे पर गड़बड़ी की आशंका है। अटल जी ने कहा कि वह घण्टाघर मैदान से पैदल ही जिला निर्वाचन अधिकारी से शिकायत करने जयेगे। वह पैदल ही चल पड़े। मैं उस समय विद्यार्थी था। अटल जी की साथ सड़क पर चलने का सौभाग्य मुझे भी मिला। करीब डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर अटल जी ने वहां ज्ञापन दिया।
ये मात्र चंद स्मृतियां है। अटल जी महान राष्ट्रवादी थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने कहा था कि यह कोई आकस्मिक घटना नहीं है। इसके पीछे कई दशक की साधना है। यही अटल जी की धरोहर है। इसे आगे बढ़ना राष्ट्रवादियों का कर्तव्य है।
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