नवेद शिकोह
लक्ष्मण प्रतिमा की स्थापना पर लखनऊ के मुस्लिम भाईयों को ना सिर्फ पुरजोर स्वागत करना चाहिए है बल्कि वे प्रस्ताव रखें कि सरकारी धन के बजाय इस शुभ कार्य के लिए मुस्लिम समाज का आर्थिक सहयोग स्वीकार किया जाये।मंदिर में रोजा इफ्तार कराने वाली महंत देव्या गिरी को ये एक रिटर्न गिफ्ट होगा। गंगा के बिना जमुना कैसे गंगा-जमुनी तहज़ीब को कायम रख सकती है !
मुसलमानों को लक्ष्मण जी की प्रतिमा पर भला क्यों एतराज होगा!
पन्द्रह सौ साल पहले मुसलमानों के एक लाख से अधिक पैगम्बर कौन थे! किसी को नहीं पता। सनातन धर्म इस्लाम धर्म से कहीं ज्यादा पुराना धर्म है। ज्यादातर इस्लामिक स्कालर का यही मानना है कि श्री राम, श्री लक्ष्मण, श्री कृष्ण और शंकर जी जैसी गैरमामूली हस्तियां उन एक लाख से अधिक पैगम्बरों में शामिल हो सकती हैं।
मुसलमान अपने अनुमानित पैगम्बरों से बैर क्यों रखेंगे ! 80 के दशक में जिनके किरदार को टीवी धारावाहिक रामायण में देखने के लिये मुसलमान अपना काम छोड़ देते थे उन लक्ष्मण जी की प्रतिमा का विरोध क्यों करेंगे मुसलमान।
हां ये बात जरूर है कि जिस राजधानी लखनऊ में प्रदेश के सबसे बड़े और सबसे सम्पन्न कहे जाने वाले ट्रामा सेंटर में बेड और इलाज की पर्याप्त व्यवस्था ना होने के कारण मरीज इलाज के अभाव में तड़प-तड़प कर मर जाता हो उस राजधानी में सरकारी धन से मूर्तियां, मंदिरें, मस्जिदें, दरगाह, कर्बला, गुरूद्वारे या चर्च बने तो ये सरकार का गलत फैसला कहा जायेगा। ये सरकारी कदम पुण्य नहीं पाप जैसा लगेगा।
यकीन ना हो तो लक्ष्मण प्रतिमा स्थापित करने के प्रस्तावित स्थान से लगभग सौ मीटर की दूरी पर किंग जार्ज मेडिकल कालेज के सरकारी ट्रामा सेंटर में कभी भी जा कर देख लीजिए। जिस प्रदेश के पास सबसे अहम स्वास्थ्य के बजट के लिए इतना भी धन नहीं है कि इमर्जेंसी के गंभीर हर मरीज को बेड दे दिया जाये। समुचित इलाज की व्यवस्था तो छोड़िये जहां सारे गंभीर मरीजों को बैड तक नहीं मिल पाता और वे स्टेचर या जमीन पर अपने परिजनों के सामने तड़प कर मर जाते हैं। ऐसे गरीब प्रदेश में सरकारी पैसे की प्रतिमा, मूर्ति, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या चर्च को क्या आप जायज ठहरायेंगे!
ऐसे हालात में सरकारी धन में किसी भी धार्मिक स्थल/मूर्ति /प्रतिमा/दरगाह /मस्जिद को कोई भी नागरिक स्वीकार नहीं करेगा।
दूसरी बात ये कि भगवान /अल्लाह मन मे है। कण-कण मे है। भगवान /अल्लाह /राम/लक्ष्मण /यीशु/गुरुनानक /ईमाम/पीर…. इत्यादि के अहसास की प्रतिमा/मूर्ति /प्रतिबिंब/शबीह….. के अहसास हम अपने-अपने धार्मिक स्थल पर स्थापित करते हैं, चौराहे पर नहीं।
फिर भी मेरी राय तो ये भी है कि इस बिन्दुओं पर भी मुसलमान तो लक्ष्मण प्रतिमा का विरोध बिल्कुल भी ना करें। बल्कि गंगा-जमनी तहजीब की मिसाल देते हुए मुसलमान सरकार से मांग करें कि ये प्रतिमा सरकारी धन से नहीं लगे। मुसलमान समाज गंगा-जमुनी तहजीब को कायम रखते हुए आपस में धन एकत्र कर लक्ष्मण प्रतिमा स्थापित करने का शुभ कार्य करने का इच्छुक है।
क्योंकि सरकारी धन जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा… इत्यादि के लिए होता है, धर्मिक स्थलों या प्रतिमाओं के लिए नहीं। हां जनता खुद के पैसे में धार्मिक आस्था और सद्भावना के लिए धार्मिक काम करे तो सरकार उसे स्थान और अनुमति दे सकती है।
मुसलमान अपना दिल बड़ा करके अपने धार्मिक स्थलों के प्रांगण में भी लक्ष्मण जी की प्रतिमा लगाने का प्रस्ताव रख कर एक मिसाल कायम कर सकता है।
शर्त ये हो कि पहले हर सरकारी अस्पताल में सरकार हर मरीज के इलाज की समुचित व्यवस्था कर दे। सरकार सिर्फ इतना काम कर दे कि सरकारी अस्पतालों में आकर भी इलाज के अभाव में गरीब आदमी एड़ियां रगड़ कर दम ना तोड़े।
शहर के भूखे को रोटी दे दे।
हर बेरोजगार को सरकार रोजगार दे दे।
हर बेटी की सुरक्षा की गारंटी दे दे सरकार।
हर बच्चे-नौजवान की पढ़ाई का इंतजाम कर दे सरकार।
ये शर्तें पूरी कर दे सरकार तो मुसलमान अपने धार्मिक स्थलों के प्रांगण में कोई भी प्रतिमा लगाने को तैयार है।
एक बात और जान लीजिए लखनऊ में लक्ष्मण जी की प्रतिमा स्थापित होने का जो प्रस्ताव पास हुआ है उससे हिन्दू-मुस्लिम कटुता नहीं सौहार्द पैदा होना चाहिए है। ये प्रतिमा हिन्दू-मुसलमान सौहार्द की सबसे बड़ी मिसाल होगी। क्योंकि मुख्यमंत्री योगी जी से लखनऊ में लक्ष्मण जी की प्रतिमा की मांग एक मुसलमान ने की थी। लेकिन मांग का आशय था कि श्रद्धालुओं/लखनऊवासियों की तरफ से प्रतिमा स्थापित करने की अनुमति की घोषणा करें सरकार।
Mobile n. 9918223245








1 Comment
Bahot khob likha hai, aapka lekh bhaichara ko jodta hai.