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    Home»ब्लॉग

    भारतीय राजनीति में विपक्ष की गिरती साख!

    By February 22, 2018Updated:February 22, 2018 ब्लॉग No Comments7 Mins Read
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    जी के चक्रवर्ती
    भारत दुनिया के सबसे बड़े एक लोकत्रांतिक देश के रूप में जाना जाता है लेकिन वर्तमान समय में इस बड़े लोकतंत्र में आदर्श न्यूनतम राजनीतिज्ञ लोगों का बोलबाला होने से शुद्ध राजनीतिक चिंतन एवं विचारधारा रखने वाले लोगों के पतन के कारण देश की राजनीति में विपक्षियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होने के वाबजूद एक जिम्मेदार एवं सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने वाले नेताओं से लेकर विभिन्न राजनितिक पार्टियो तक के लोग में देश को एक शसक्त विपक्ष देने जैसी कर्तव्य पालन करने से कतराने लगे हैं। जिसकी वजह से एक सशक्त विपक्ष की भूमिका के अभाव में भारतीय राजनीतिक क्षेत्र में एक शून्यता पैदा हुई है। भारत देश की सांस्कृतिक एवं भौगोलिक स्थिति के अनुसार देश के लोगों के विचार एवं उनकी दशा-दिशा में विविधता होने के कारण विकल्प हीनता जैसी स्थिति पैदा होने से मौजूदा सरकार के मध्य एक तरह की शिथिलता या निष्क्रियता झलकने लगा है।
    कोई भी लोकत्रांतिक व्यवस्था वाले देश में जितनी जरूरत एक मजबूत सरकार की होती है उतनी ही मजबूत विपक्ष की भी होती है, और इस तरह की अपेक्षा केवल हमारे देश से ही नहीं अपितु पूरी दुनिया के उन देशों से भी की जाती है, जिन -जिन देशों में ऐसी लोकतान्त्रिक व्यवस्थाएं स्थापित है। ऐसे किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अन्तर्गत चलने वाले देश के शासन सत्ता पर आसीन सरकार द्वारा लिए जाने वाले फैसलों में यदि हम गौर करे तो हमें यही कहना पड़ता है कि देश के साशन सत्ता संभालने वाली सरकार के द्वारा लिए जाने वाले फैसलों के विरुद्ध, विरोध दर्ज कराने वाले सशक्त एवं धारदार विपक्ष का होना अत्यन्त आवश्यक है जो की इन वक्त दिखाई नहीं दे रही है।
    भारतीय राजनीतिक क्षेत्र में विभिन्न दलों के छोटे दायरे में सिकुड़ते चले जाने के कारण विपक्ष की संख्या में भारी कमी आने लगी है जिसकी वजह से राजनीति में एक शून्यता की स्तिथि पैदा हुई है। देश के प्रमुख विपक्ष की राजनितिक दलों में विशेष कर कांग्रेस को भविष्य में न केवल अनेको चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है साथ ही साथ उन्हें विपक्ष से शून्य मौजूदा राजनिति में इस शून्यता को भरने जैसी समस्या का समाधान भी ढूंढना होगा। राहुल गांधी द्वारा कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष की कमान संम्भालने के बाद से एक लंबे समय से चले आरहे कांग्रेस पार्टी के मुखिया को लेकर फैले भ्रम एवं दुविधाओं का माहौल स्माप्त हो चुकी है। लेकिन मात्र चेहरा बदलने मात्र से कांग्रेस का सियासी कायाकल्प होने वाला नहीं है और अभी ऐसी कोई सूरत भी नहीं दिखाई दे रही है कि जिससे पार्टी की क्रियाकलापों एवं नीति से स्पष्ट है कि सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी ही कांग्रेस के कर्णधार होंगे, इसमें बात में शायद ही पार्टी के लोगों के मन में किसी प्रकार का संदेह हो। यह सच्चाई भी किसी से छुपी नहीं है कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से पार्टी की सियासत का संचालन स्वमं राहुल गांधी कर रहे हैं, एक वक्त संपूर्ण राष्ट्र की शासन सत्ता पर काबिज रही पार्टी कभी देश की एकमात्र सबसे बड़ी पार्टी के रूप में वर्ष 2017 के समाप्त होते-होते संपूर्ण देश के कुल चार सूबों तक में सिमट कर रह गई है।
    सबसे लंबे वक्त तक देश के शासन सत्ता संम्भालने वाली पार्टी के इस हालत में पहुंचने के बाद तक उसमे कोई ऐसा बुनियादी चमत्कारिक बदलाव भी नहीं हुआ है जिससे इस पार्टी से आने वाले भविष्य में कुछ खास उम्मीदें रख सके। हम इस बात को नजर अंदाज नही कर पाएंगे कि भाजपा के बाद कांग्रेस ही एक मात्र देश की दूसरी सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी है, लेकिन मामला चाहे पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में हुए चुनाव में सपा के साथ गठबंधन कर सूबे में अपने अस्तित्व को बचाये रखने जैसा कदम उठाने की बात हो या बिहार में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे और उसके बाद वर्तमान समय में जेल की हवा खाने वाले लालू प्रसाद यादव के परिवार के साथ खड़े होने का निर्णय कहाँ तक पार्टी के लिए उचित था इस तरह की बातें तो स्वमं पार्टी के लोग ही जाने लेकिन वर्तमान समय में देश के लोगों को एक बात अच्छी तरह से समझ में आ गई है कि उस वक्त पार्टी द्वारा उठाये गए इन दोनों कदमों से कांग्रेस पार्टी की बची खुची शाख में भी बट्टा लगने वाली बात ही कहलायेगी।
    देश की एक प्रमुख विपक्षी दल के विकल्प के तौर पर देश की राजनीति के लिहाज से अपने पुराने ढर्रे पर सियासत करने वाली पार्टी बदलते हुए भारत की आकांक्षाओं पर आगे भविष्य में खरा उतरेगी, इसमें संदेह है। ऐसी परिस्थिति में यही कहना पड़ता है कि बिहार के नीतीश कुमार जैसे मंझे हुए एक पुराने राजनीतिज्ञ ने दुबारा कांग्रेस के साथ जाने की वजाय भाजपा के साथ जाना ही उचित समझा। इसको लेकर दो राय नहीं है कि विपक्षियों का काम सरकार की खामियां और विफलताओं को उजागर करते हुए उस पर चोट करना होता है, लेकिन विपक्ष की संपूर्ण ऊर्जा केवल इसी बात में लग कर बेकार हो जायेगी कि देश में एक वैकल्पिक सियासी एजेंडा वाली बात दिखाई न दे तो फिर ऐसी राजनीति तो केवल प्रतिक्रियाओं मात्र तक ही सीमित रह जाने वाली बात होगी। देश की जनता ऐसी राजनीति कतई पसंद नहीं करेगी।
    देश के आर्थिक ढांचे में बदलाव करने के लिए जीएसटी को लागू करने जैसा फैसला एवं देश में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ नोटबंदी जैसे कठोर फैसलों पर कांग्रेस जैसी अनुभवी पार्टी की ओर से किया गया विरोध मात्र प्रतिक्रियावादी राजनीति करने जैसा ही दिखाई देता है। इसे प्रतिक्रिया को यदि हम पार्टी के सत्ता से बाहर रहने की बेचैनी जैसी बात मान लें तो भी हकीकत यह है कि सहयोगी क्षेत्रीय दलों के दबाव में कांग्रेस अपना वैकल्पिक राजनीतिक जैसा एजेंडे को भूलती चली गई।
    बिहार के नीतीश कुमार ने एनडीए के साथ जाने से पूर्व कई दफे खुले तौर पर कांग्रेस को वैकल्पिक सकारात्मक एजेंडे की बात को लेकर जनता के मध्य जाने की सलाह दी, लेकिन उस वक्त कांग्रेस नितीश की इस सलाह की अनदेखी करने से इसका राजनीतिक प्रभाव यह हुआ कि विपक्षीयों का आपस में गोलबंद होने का अभियान नीतीश कुमार के एनडीए के पक्ष में जाते ही धराशायी हो गया। इस तरह विपक्षीयों द्वारा देश को एक मजबूत विपक्ष देने जैसी बातों पर विभिन्न पार्टियों को एकजुट करने के लिए डाली गई नींव वर्ष 2017 में ही ध्वस्त हो गई। देश में राष्ट्रपति चुनाव या उपराष्ट्रपति चुनाव में एक विपक्षी राजनीति का झंडा लहराने का संदेश देने के लिए कांग्रेस पार्टी ने 18 पार्टियों को इकट्ठा करके ऐसा माहौल तैयार करने का भरपूर प्रयास जरूर किया था, और नीतीश कुमार द्वारा दिए गये झटके से उबरने का संदेश देने की भी कोशिश की गई, लेकिन जमीनी सियासत के धरातल पर देखें तो विपक्षी गोलबंदी का यह मंच मात्र आपसी अंतर्विरोधों का अखाड़ा बन कर रह गया।
     शायद यही कारण था कि चंद मौकों को छोड़ कर अपनी-अपनी सियासत बचाने की मजबूरी के अलावा विपक्षियों द्वारा गोलबंद होने वाला यह समूह किसी प्रभावी भूमिका में नजर नहीं आया। पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस एक तरफ थी तो दूसरी ओर कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां। जैसा कि उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा की आपसी लड़ाई का इतिहास सबके सामने है। अभी हाल ही में गुजरात के चुनावी समय में यूं तो मुख्य रूप से चुनावी मुकाबला बीजेपी बनाम कांग्रेस के बीच थी लेकिन छोटे-छोटे दल भी यहां बड़ा खेल करने की कूवत रखते हैं। बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती गुजरात की सभी सीटों वर्ष 2019 में होने वाली चुनाव में लड़ने की तैयारी कर रही हैं। इस परिपेक्ष में यह कहना पड़ता है कि मायावती की बसपा पार्टी को बृहद आकार ले कर पूरे देश में अपना जनाधार बढ़ाने पड़ेंगे जिससे आने वाले भविष्य में वर्ष 2019 में होने वाले चुनाओ में बसपा एक प्रमुख विपक्षी दल के रूप में पूरे राष्ट्र में उभर कर आये।
    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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