दिलीप अग्निहोत्री
पहले राहुल गांधी अक्सर गोपनीय विदेश यात्राओं पर निकल जाते थे। कोई नहीं जानता था वह कहाँ गए है, उनका कोई बयान नहीं आता था। बताया जाता था कि वह चिंतन मनन के लिए अज्ञातवास पर गए है। माना जाता था कि उन्हें आत्मचिंतन की सख्त जरूरत भी है। लेकिन वापसी के बाद कोई फर्क दिखाई नहीं देता था। फिर भी विदेश में उनका कुछ न बोलना देश के लिए राहत की बात थी। कई बार यह भी कहा गया था कि वह अपनी नानी को देखने इटली गए है। यह सब गनीमत थी। मुश्किल तब से है जब से राहुल ने विदेश में बोलना शुरू किया है। लगता है कि भारत वीरोधी तत्व जानबूझ कर उन्हें आमंत्रित करते है।राहुल भारत की राष्ट्रीय विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष है। इस रूप में क्या विश्व मंच से वह यह नहीं कह सकते थे कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को स्थाई सदस्यता मिलनी चाहिए, क्या आतंकवाद का बेतुका कारण बताने की जगह उंसकी निंदा नहीं कर सकते थे, क्या यह नहीं कह सकते थे कि भारत विश्व शांति का हिमायती है, भारत में आतंकवादी नहीं होते, यहां विविधता में एकता है। लेकिन राहुल इस स्तर तक पहुंच ही नहीं सकते। विश्व मंच पर वह नोटबन्दी , जीएसटी, आपराधिक घटनाओं के चित्रण तक सीमित रहे। भारत और विश्व पर बोलना था, वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर बोलते रहे। महिलाएं संघ की शाखाओं में नहीं जाती , इस बात के लिए राहुल इतना परेशान क्यों रहते है, परेशान है तो यह बात लंदन में कहने की क्या जरूरत थी।
शायद राहुल गांधी के लिए देश की सीमाएं कम पड़ गई थी,अब यूरोप तक उन्होंने अपने विचार पहुंचा दिए है। उनकी जो छवि देश में थी उसका विस्तार हुआ।देश,काल,परिस्थिति,अवसर चाहे जो हो, राहुल के विचारों पर इसका कोई असर नहीं होता।राहुल ने अपना सम्पूर्ण राजनीतिक, सामाजिक आर्थिक ज्ञान यहां उड़ेल दिया। कहा कि बेरोजगारी और गरीबी से आतंकवाद फैल रहा है। राहुल के इस भाषण विश्व हतप्रभ रह गया। लगा कि भारतीय चिंतन और विश्व शांति के लिए राहुल के पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं है। किसी भी नेता के लिए यह वैचारिक दिवालियेपन की स्थिति होती है।
राहुल ने एक बार भी नहीं सोचा कि जिस संघ पर वह विदेशी धरती पर हमला बोल रहे है, वह केरल की आपदा में सेना के साथ मिलकर प्रबंधन व राहत का कार्य कर रहा है। दूसरों की जान बचाने में अनेक स्वयं सेवकों ने जीवन बलिदान कर दिया। राष्ट्र सेवा की यह प्रेरणा इन्हें संघ में मिली। इसी संघ की तुलना राहुल मध्यपूर्व की संस्था मुस्लिम ब्रदर हुड़ से कर रहे थे। जर्मनी के हैम्बर्ग में राहुल आईएसआईएस की प्रक्रिया पर अपना शोध जग जाहिर किया।
राहुल को समझना होगा कि आतंकवाद एक विचारधारा का परिणाम है। भारत में गरीबी और बेरोजगारी है,लेकिन आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली विचारधारा का वर्चस्व नहीं है। इस लिए यहां अपराध तो हो सकते है, लेकिन के युवक आतंकवादी नहीं होते। राहुल ने अपने ही देश के युवकों का अपमान किया है।
राहुल जब गरीबी, बेरोजगारी का आरोप लगाते है ,तब वह भाजपा से ज्यादा अपनी ही पार्टी पर निशाना लगा रहे होते है। ये सभी समस्याएं चार वर्ष में पैदा नहीं हुई है। सबसे अधिक समय तक शासन करने वाली कांग्रेस सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। वह नरेंद्र मोदी द्वारा विदेश में दिए गए भाषण की बराबरी करना चाहते है। जबकि मोदी ने कभी देश की छवि नहीं बिगाड़ी। यूपीए सरकार के अंतिम वर्षो में नीतिगत पंगुता और घोटालों की वजह से निवेश रुक गया था। मोदी यही कहते थे कि अब ये कमियां दूर कर दी गई है। मोदी यह बात देश हित में कहते थे, राहुल देश की छवि से खिलवाड़ कर रहे है।







