डॉ दिलीप अग्निहोत्री
दिल्ली पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को आम आदमी पार्टी अपनी जीत बता रही है। वास्तविकता यह है कि जब तक अरविंद केजरीवाल दिल्ली की संवैधानिक स्थिति को स्वीकार नहीं करेंगे, वह विवाद को ही आमंत्रण देते रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के तत्काल बाद ट्रांसफर विवाद शुरू हो गया। अरविंद केजरीवाल को पूर्ण राज्य का मुख्यमंत्री मान कर राष्ट्रीय राजनीति में अपना महत्व बढ़ाना चाहते है। दिल्ली उनकी प्राथमिकता में नहीं है। यदि होता तो सबसे पहले वह इस राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सीमाएं समझते, उसके अनुरूप सरकार का संचालन करते। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का यही मूल विचार है। इसके परोक्ष और अपरोक्ष निहितार्थ आप शर्मिंदा करने वाले है। इन दोनों पर उसे आत्मचिंतन करना चाहिए था। लेकिन उसने इसे जश्न का अवसर मान कर सुधार की संभावनाओं को समाप्त कर दिया है। इसके बाद यह लगभग तय है कि आप सरकार जिस तरह अब तक चली है, उसी तर्ज पर उसका शेष कार्यकाल भी बीत जाएगा।सुप्रीम कोर्ट के कुछ शब्द विशेष रूप से ध्यान गौरतलब है। पहला यह कि अराजकता नहीं होनी चाहिए। दूसरा यह कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है, तीसरा यह कि सभी लोगों को संविधान का पालन करना चाहिए।
आश्चर्य यह कि इस प्रकार की न्यायिक टिप्पणी के बाद भी आप के नेता जीत का जश्न मना रहे है। अराजकता शब्द सीधे सीधे आप के लिए है। इसने सत्ता में आने के बाद अराजकता की मिसाल कायम की है। यह शब्द इस पार्टी की पहचान के साथ जुड़ गया है। अब तो सरकार समापन की दिशा में बढ़ रही है। ऐसे में बड़े बदलाव की उम्मीद करना बेमानी है। सुप्रीम कोर्ट ने दूसरे वाक्य में कहा कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है। यह टिप्पणी भी आप सरकार के लिए है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सबसे बड़ी मुसीबत भी यही है। वह अपने को पूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री से कम समझने को तैयार नहीं है। यह गलतफहमी उन्हें अराजकता से बाहर नहीं निकलने देती। यदि वह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के मुख्यमंत्री मानते तो सीमित अधिकारों के आधार पर कार्य करने का प्रयास करते।
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के पालन की बात कही। आप ने मान लिया की यह टिप्पणी उपराज्यपाल के लिए है। लेकिन उपराज्यपाल ने प्रशासक के रूप में अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह किया। उन्होंने सरकार के उन्ही फैसलों को नकारा, जिसमें निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा है कि दिल्ली में किसी तरह की अराजकता की कोई जगह नहीं है। सरकार और उपराज्यपाल को साथ में काम करना चाहिए। मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि संविधान का पालन सभी का कर्तव्य है। संविधान के अनुसार ही प्रशासनिक फैसले होने चाहिए। राज्यों को राज्य और समवर्ती सूची के तहत संवैधानिक अधिकार के प्रयोग का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि चुनी हुई सरकार को फ़ैसले करने का अधिकार है। राज्य सरकार के फ़ैसले उपराज्यपाल पर बाध्यकारी हैं। उपराज्यपाल कुछ फ़ैसलों से असहमत हों तो राष्ट्रीय हित में उन्हें राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं। लेकिन इस वाक्य को अलग करके पढेंगें तो स्थिति स्पष्ट नही होगी। निर्णय की अगली लाइन जोड़ कर पढ़ना होगा इसमें कहा गया कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है, विशेष दर्जे वाला केंद्र शासित प्रदेश ही है। यह न तो पूर्ण राज्य है ,न यहां पर राज्यपाल है। इसकी जगह उपराज्यपाल अर्थात र्प्रशासक हैं। ज़मीन, पुलिस और कानून-व्यवस्था उपराज्यपाल के ही पास रहने है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना संभव नहीं है। इस संदर्भ में ही संसदीय शासन प्रणाली को देखना होगा। जिसमें चुनी हुई सरकार ही राज्य को चलाने के लिए जिम्मेदार होती है। फैसले के बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने निर्णय पर खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा है कि दिल्ली में लोकतंत्र की जीत हुई है। आम आदमी पार्टी लगातार आरोप लगाती रही है कि केंद्र की मोदी सरकार उपराज्यपाल के जरिए अपना एजेंडा आगे बढ़ा रही है और राज्य सरकार को काम नहीं करने दे रही है। वस्तुतः यह अरविंद केजरीवाल की विफलता की स्वीकारोक्ति है।
सुप्रीम कोर्ट के कथन पर उनकी प्रतिक्रिया निराश करने वाली है। इससे उन्होंने कोई सबक लेने से इनकार कर दिया है। उसने अपनी विफलता स्वयं ही स्वीकार की है। वह कहते रहे है कि प्रधानमंत्री और उपराज्यपाल ने उन्हें कार्य नहीं करने दिया। इसका मतलब साफ है। आम आदमी पार्टी की सरकार ने चार वर्षों में ऐसा कुछ नहीं किया ,जिसे वह अपनी सफलता या उपलब्धि के रूप में पेश कर सके। इसलिए वह विफलता ठीकरा प्रधानमंत्री और उपराज्यपाल पर फोड़ कर अपने को बचाना चाहती है। पिछले दिनों राजनिवास पर नौ दिन चला धरना इसी रणनीति का हिस्सा था। आप की इस सच्चाई को दिल्ली के लोग बखूबी समझ चुके है। इस पार्टी को अराजकता में महारत हासिल है। लेकिन निर्धारित संवैधानिक दायरे में इन्हें सरकार चलाना नहीं आता। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भी इस सरकार में सुधार नहीं कर सकता।







