कांग्रेस का अट्टहास और कुमारस्वामी के आंसू

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
कर्नाटक में जिस गठबन्धन को लेकर ढाई महीने पहले बंगलुरू में अखिल भारतीय जश्न हुआ था, उसके लिए मुख्यमंत्री कुमार स्वामी आंसू बहा रहे है। वैसे उन्होंने यह नहीं बताया कि वह ऐसी विषभरी स्थिति से कब बाहर निकलेंगे। लेकिन इतना तय हुआ कि यह गठबन्धन नैतिक आधार पर विफल हो चुका है। कुमारस्वामी ढाई वर्ष तक भाजपा गठबन्धन के साथ कर्नाटक की सरकार चला चुके है। वह उनके राजनीतिक जीवन का सर्वश्रेष्ठ कालखंड था। लेकिन कांग्रेस के साथ सरकार चलाने में मात्र ढाई महीने में उनके आंसू निकल पड़े। ये बात अलग है कि जब भाजपा के मुख्यमंत्री बनने की बारी थी तब कुमारस्वामी अपने वादे से मुकर गए थे। आज समय उनके साथ अपने को दोहरा रहा है। कांग्रेस के दबाब ने उन्हें परेशान कर दिया है।
कर्नाटक में गठबन्धन सरकार की अभी मेंहदी अभी सुखी भी नहीं थी, मुख्यमंत्री को रोना आने लगा। उन्होंने कहा कि वह गठबन्धन में विषपान कर रहे है। मई में सरकार बनी, जुलाई में अलगाव की आहट सुनाई देने लगी।  दो महीने पहले बढ़ी धूम धाम से गठबन्धन सरकार की ताजपोशी हुई थी। विपक्ष की जिन पार्टियों का कर्नाटक से कोई लेना देना नहीं था, वह भी बारातियों की तरह वहाँ पहुंच गए थे। ये सभी इस बात से आनन्दित थे कि भाजपा को सरकार बनाने से रोकने में सफलता मिली है।
मुख्यमंत्री कुमारस्वामी का दावा था कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी। लेकिन उपमुख्यमंत्री ने उन्हें पहले दिन ही आगह कर दिया था। उन्हें पांच वर्ष की गलतफहमी में न रहने की हिदायत दी थी। जबकि कुमारस्वामी कांग्रेस के इतिहास से बेखबर थे। उनका कहना था कि यह अलग तरह की गठबंधन सरकार होगी, जो देश के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करेगी। जबकि उप मुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने कहा था कि कांग्रेस पार्टी ने पूरे पांच साल तक के कार्यकाल के लिए कुमारस्वामी का समर्थन करने पर अब तक कोई फैसला नहीं लिया है। कुमारस्वामी ने भाजपा की ओर इशारा करते हुए कहा था कि आप सोच रहे होंगे कि यह सरकार दो-तीन महीनों में चली जाएगी।  मगर यह सरकार दो-तीन महीनों में नहीं जाएगी बल्कि पूरे पांच साल रहेगी। मैं एक अलग तरह की गठबंधन सरकार का वादा करता हूं, जो इस देश के लिए आदर्श होगी।  मुझे प्रदेश की जनता का पूरा विश्वास नहीं हासिल हुआ था। मैं  मैंने लोगों के सामने चुनावी रैलियों में कई मुद्दे रखे, मुझे उम्मीद थी कि मुझे उनका विश्वास हासिल होगा। मगर लोगों ने मुझ पर भरोसा नहीं किया।
इस प्रकरण ने एक साथ कई प्रश्न उठाये है। क्या विपक्ष भाजपा को रोकने के नाम पर ऐसी ही सरकार बनाएगा, दूसरा यह कि जिस सरकार में मात्र दो महीने में ही इतने मतभेद पैदा हो गए है, वह किस प्रकार बेहतर शासन का संचालन करेगी, तीसरा यह कि इस सरकार में बजट को लेकर ही विवाद है, यह स्थिति संवैधानिक रूप से भी गलत है। स्प्ष्ट है कि प्रश्न राजनीति और संविधान दोनों से संबंधित है। यह सही है कि गठबन्धन के लिए अनेक बार अप्रत्याशित निर्णय भी करने होते है। जम्मू कश्मीर में भाजपा का पीडीपी के साथ गठबन्धन सरकार बनाना ऐसा ही निर्णय था। लेकिन इस सरकार के गठन से पहले न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाया गया था। जब तक पीडीपी ने इसका पालन किया, सरकार चलती रही।
विपक्ष ने गोवा, मणिपुर , मेघालय में बनी सरकार  पर सवाल उठाए थे। लेकिन इन गठबन्धन सरकारो की तुलना भी कर्नाटक से नहीं कि जा सकती थी। कर्नाटक में एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ी पार्टियों ने नकारात्मक मुद्दे पर बिना किसी न्यूनतम साझा कार्यक्रम के सरकार बनाई थी। जबकि गोवा ,मेघालय आदि में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ी पार्टियों ने भाजपा के समर्थन का निर्णय लिया था। ऐसे में कर्नाटक पर भाजपा का नाम लेकर अपना बचाव नहीं किया जा सकता। चुनाव के पहले या चुनाव के बाद बनने वाले गठबन्धन को न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर अवश्य विचार करना चाहिए।
लेकिन विपक्ष के नेता इस समय केवल भाजपा को रोकने के नाम पर मोर्चा बना रहे है। इनके पास अन्य कोई कार्यक्रम ही नहीं है। सपा और बसपा का गठबन्धन हो रहा है, तृणमूल ने कहा कि वह पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के साथ गठबन्धन बनाने को तैयार है। क्योंकि भाजपा को रोकना होगा। ऐसे नकारात्मक मुद्दों पर बनने वाली सरकार आमजन के कल्याण नहीं कर सकती। क्योंकि इनके स्वार्थ जनहित पर भारी पड़ते है।
इसके अलावा गठबन्धन के मामले में कांग्रेस का रिकार्ड भी देखना चाहिए। गठबन्धन सरकार में यदि प्रधाममंत्री या मुख्यमन्त्री इनकी पार्टी का हुआ, तब सरकार चलने की संभावना रहती है। केंद्र की यूपीए और महाराष्ट्र में एनसीपी के साथ बनाई गई सरकार इसकी बानगी थी। लेकिन बाहर से समर्थन देने या मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री का पद न मिलने पर इन्हें  कठिनाई होती है। ऐसी दशा में बनने वाली सरकारों की असलियत कुछ दिनों में ही सामने आ जाती है। कांग्रेस ने केंद्र में चरण सिंह और चंद्रशेखर की सरकार को कुछ महीने में ही परेशान कर दिया था। कुमारस्वामी के साथ कुछ नया नहीं हो रहा है। कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने की कीमत तो उनको चुकानी होगी।

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