डॉ दिलीप अग्निहोत्री
कांग्रेस किसी भी मसले पर सरकार के विरोध की दिशा दशा तय करने नाकाम हो जाती है। उसका अपना अतीत ही अड़चन बनकर सामने आ जाता है। राफेल के बाद वह माल्या मसले पर भी घिर गई है। भाजपा ने रिकार्ड के आधार पर साबित कर दिया कि माल्या व जेटली की मुलाकात नहीं हुई थी। राहुल और पुनिया ने गलत बयानी की थी। इसके बाद सीबीआई का स्पष्टीकरण भी सामने आ गया। अब माल्या पर कांग्रेस को जबाब देना होगा। उसे अपने अतीत से पहले निपटना होगा। इसे यूपीए सरकार तक सीमित रखा जा सकता है। इस अवधि में राहुल गांधी अनौपचारिक रूप में प्रधानमंत्री से कम हैसियत नहीं रखते थे। यही उनकी स्थिति को दुविधापूर्ण बना देती है। कुछ दिन पहले राहुल गांधी ने राफेल डील को मुद्दा बनाया था। ऐसा लगा जैसे वह इसे बोफोर्स बना कर मानेंगे। लेकिन इसमें वह खुद जबाबदेह बन गई। दस वर्ष तक डील न करने , वायुसेना की तैयारी के प्रति लापरवाह रहने, गलत मूल्य बताने, सुरक्षा की दृष्टि से राफेल में लगे यंत्रों की गोपनीयता को उजागर करने की मांग आदि का जबाब कांग्रेस के पास नहीं था। फिर पता चला कि यह डील यूपीए के मुकाबले सस्ती, बेहतर और वायु सेना की जरूरतों के अनुरूप थी।
राफेल का मुद्दा नहीं चला। इस बीच भगोड़े विजय माल्या का बयान आ गया। इसमें उसने पहले अरुण जेटली से मुलाकात को बात कही। बाद में कहा कि औपचारिक मुलाकात नहीं हुई थी। अरुण जेटली ने जो बताया था, उंसकी ही पुष्टि हुई। इसमें भी बात आगे बढ़ी तो कांग्रेस फिर जबाबदेह हो गई। विजय माल्या पर यूपीए सरकार की देन था। कांग्रेस का अतीत यहीं तक नहीं था। कभी राहुल गांधी के करीबी रहे शहजाद पूनावाला ने आरोप लगाया। उनके अनुसार राहुल और नीरव मोदी की लंबी मुलाकात हुई थी। नीरव को भी यूपीए सरकार में लाभ मिल था।
पीएल पुनिया ने कहा था कि उन्होंने खुद एक मार्च दो हजार सोलह को संसद के सेंट्रल हॉल में माल्या और जेटली को पन्द्रह मिनट तक बातचीत करते हुए देखा था। भाजपा ने पुनिया के बयान की यह कहते हुए हवा निकाल दी कि उस दिन जेटली कभी सेंट्रल हाल में बैठे ही नहीं। भाजपा ने इसके लिए जेटली की पूरे दिन के कार्यक्रम का विस्तृत ब्यौरा जारी किया है। उस दिन संसद के सेंट्रल हाल में जेटली गए ही नहीं। ग्यारह से ग्यारह पैंतालीस तक राज्यसभा में थे। यहां से सीधे विज्ञान भवन के लिए निकल गए।
विज्ञान के कार्यक्रम के वीडियो से साफ है कि जेटली ने ठीक एक बजकर आठ मिनट पर सिविल एकाउंट्स दिवस के कार्यक्रम में भाषण शुरू किया था। दो बजे तक विज्ञान भवन में रहने के बाद जेटली सीधे नार्थ ब्लाक स्थित वित्त मंत्रालय कार्यालय चले गए थे। इसके बाद वे उस दिन संसद भवन गए ही नहीं। उस दिन जेटली के कार्यक्रम से साफ है कि वे संसद के सेंट्रल हाल में गए ही नहीं थे, इसीलिए विजय माल्या के साथ मुलाकात का पीएल पुनिया का दावा तथ्यहीन है।
अरुण जेटली ने पहले कहा था कि दो हजार चौदह के बाद उन्होंने कभी भी माल्या को वक्त नहीं दिया। जेटली के अनुसार एक दिन जब वे सदन से अपने कमरे की ओर जा रहे थे तब संसद सदस्य होने का फायदा उठाते हुए माल्या गलियारे में तेज कदम से उनके पास आ गए थे और चलते हुए ही कहा कि वह बैंकों के कर्जो का भुगतान का प्रस्ताव कर रहे हैं, लेकिन माल्या की करतूतों से अच्छी तरह वाकिफ जेटली ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही साफ कर दिया कि कोई भी प्रस्ताव वे बैंकों के सामने रखें। यहां तक कि जेटली ने माल्या के हाथ में मौजूद चंद दस्तावेजों को भी लेने से इनकार कर दिया था।
कांग्रेस का दोहरा मापदंड नहीं चल सकता। यदि वह विजय माल्या के पहले वाले और पीएल पुनिया के बयान को सही मान रही है तो शहजाद पूनावाला के बयान को गलत कैसे कह सकती है। इसी प्रकार उसे भाजपा के द्वारा उठाये गए प्रश्नों का भी जबाब देना होगा। संभव है कि इसमें कांग्रेस अपने को ही घिरा महसूस करने लगे।
शहजाद पूनावाला ने दावा किया कि सितंबर दो हजार तेरह को इंपीरियल होटल में नीरव मोदी की कॉकटेल पार्टी में राहुल गांधी मौजूद थे। उसके बाद वक्त नीरव और मेहुल को गलत तरीके से ऋण दिया गया था। जबकि
नरेंद्र मोदी सरकार भगोड़ा आर्थिक अपराधी कानून लाया है, तब से भगोड़े और संभावित भगोड़े बेचैन हैं। शहजाद के अनुसार राहुल व नीरव की मुलाकात का एसपीजी के पास रिकार्ड भी होगा। उन्होंने ट्वीट किया कि वह राहुल गांधी को खुली चुनौती देते हैं कि राहुल कॉकटेल पार्टी में नीरव मोदी से मिलने की बात से इनकार करें।
शहजाद अपने दावे की पुष्टि के लिए लाई डिटेक्टेटर टेस्ट से गुजरने और धर्म ग्रन्थ की कसम उठाने को भी तैयार है। बताया जाता है कि शहजाद पूनावाला कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के रिश्तेदार भी हैं। शहजाद के भाई तहसीन की शादी रॉबर्ट वाड्रा की बहन मोनिका वाड्रा से हुई थी। इसके अलावा भाजपा ने भी अनेक सवाल दागे है। फरवरी, दो हजार ग्यारह में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह बयान क्यों दिया था कि हमें किंगफिशर को मुसीबत से बाहर निकलने के तरीके खोजने है। दो हजार दस से लेकर दो हजार तेरह के बीच विजय माल्या ने कई ईमेल डॉ. मनमोहन सिंह को किए। जिसके बाद वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने नियम कायदों को दरकिनार करते हुए किंगफिशर एयरलाइंस को लोन मामले में राहत पहुंचाई।
इस नियम विरुद्ध सहायता के लिए माल्या ने मनमोहन सिंह को पत्र लिख कर धन्यवाद किया था। दो हजार बारह में यूपीए सरकार ने किंगफिशर के स्टेट बैंक अकाउंट को फ्रीज्ड से फ्री किया, उसके बेलआउट पैकेज को ग्रांट किया। जिसके बाद स्टेट बैंक ने किंगफिशर को बचाने के लिए पन्द्रह सौ करोड़ की ग्रांट दी थी।यूपीए सरकार के विमानन मंत्री वायलार रवि ने विजय माल्या से मुलाक़ात कर बैंकों के माध्यम से किंगफिशर को मदद आश्वासन दिया था। विजय माल्या को अधिकतर लोन सोनिया-मनमोहन सरकार के समय ही दिए गए थे। विजय माल्या, नीरव मोदी आदि को कांग्रेस सरकार ही पाल-पोस रही थी। सीबीआई को भी कांग्रेस के आरोपों का जबाब देना पड़ा।
लुकआउट सर्कुलर में बदलाव इसलिए किया गया था क्योंकि उस समय गिरफ्तार करने की कोई ठोस वजह नहीं थी। यह निर्णय एक प्रक्रिया के तहत उचित स्तर पर लिया गया, न कि किसी अधिकारी ने लिया, जैसा कि आरोप लगाया जा रहा है। जिन आरोपो की जांच हो रही थी उसमें माल्या सहयोग कर रहा था। इस दौरान वह तीन चार बार विदेश भी गया था। सीबीआई के किसी अफसर पर उनको भगाने में हाथ होने का सवाल ही नहीं उठता। बैंक से शिकायत मिलने के बाद हमारे द्वारा उचित ऐक्शन लिया गया था। जाहिर है कि कांग्रेस इन मसलों पर खुद घिर गई है।







