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    धैर्य से ही होगा शांतिपूर्ण समाधान

    By July 3, 2018 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    रामजन्म भूमि पर मंदिर निर्माण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। संतों में इस विषय को लेकर नाराजगी थी, तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं उनसे संवाद के लिए अयोध्या गए। उन्होंने संतों से कहा कि धैर्य रखें, मंदिर अवश्य बनेगा। यह सकारात्मक बयान था। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यही विकल्प भी है। लेकिन केंद्रीय मंत्री उमा भारती का बयान इस भावना से अलग था। वह अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रही, चार वर्षों से मोदी सरकार में मंत्री है। धैर्य तो उन्होंने भी खूब रखा है। अयोध्या आंदोलन की अलख जगाने वालों में उमा भारती भी अग्रणी रही है। लेकिन उसके बाद चुनावी राजनीति में आने के बाद इस विषय पर उन्होंने भी धैर्य ही धारण किया है। भव्य राम मंदिर निर्माण के प्रति उनकी आस्था अवश्य रही है। इस संबन्ध में योगी आदित्यनाथ के बयान पर उनकी टिप्पणी चर्चा में है।
    उन्होंने कहा कि धैर्य रखना योगियों के वश में है। वह धैर्य नहीं रख सकती। राम मंदिर का निर्माण जल्द होना चाहिए। उचित यही था कि उमा भारती भी योगी के बयान को आगे बढ़ाती, इसका समर्थन करती। वह केंद्र सरकार में शामिल है। सार्वजनिक रूप से कहा कि केंद्र और प्रदेश में हमारी सरकार है। जबकि अपेक्षा है कि राम मंदिर निर्माण की बाधाएं दूर हों, मंदिर निर्माण के लिए मोदी और योगी साहसिक कदम उठाए, हम जल्द से जल्द मंदिर निर्माण चाहते है। इस प्रकार के बयानों से लगता है कि नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ साहसिक कदम नहीं उठा रहे है। जबकि उमा भारती ने साहसिक कदम की व्याख्या नही की। बाबरी ढांचे के विध्वंस की तरह सीमित समय में भव्य मंदिर निर्माण नही हो सकता। इसके अलावा यह मसला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे में किसी अन्य साहसिक कदम की बात अव्यवहारिक है।
    उमा भारती ने अयोध्या में तीन सुझाव भी दिए है। पहला सुप्रीम कोर्ट का फैसला, दूसरा आपसी बातचीत और तीसरा संविधान में संशोधन। संविधान में संशोधन के लिये राष्ट्रीय संकल्प लेना होगा। इसमें सभी दलों की सहमति आवश्यक है। इनमें से किसी भी तरीके पर साहसिक कदम नहीं उठाया जा सजता। सुप्रीम कोर्ट से जल्द सुनवाई का सरकार निवेदन कर सकती है। इसके निर्णय का इंतजार करना होगा। इतने वर्षों से रखे गए धैर्य को बनाये रखना होगा। दोनों पक्षों में बातचीत की कोई संभावना नहीं है। खासतौर पर बाबरी एक्शन कमेटी ऐसा होने नहीं देगी। संसद की मौजूदा स्थिति में उमा  इस पर संविधान संशोधन की कल्पना भी कैसे कर सकती है। लोकसभा से संशोधन पारित हो जाये, तब भी राज्यसभा से इसका पारित होना असंभव है। जाहिर है कि उमा भारती ने इस विषय पर भावावेश से काम लिया है। उन्होंने भी सरकार में रहकर खूब धैर्य रखा है। फिलहाल न्यायिक निर्णय रखने तक धैर्य ही रखना होगा।
    इसी प्रकार विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया के बयान से भी सहमत नहीं हुआ जा सकता। उन्होंने कहा कि चार महीने में राम मंदिर निर्माण के लिए कानून नहीं बना तो फिर आंदोलन किया जाएगा। उमा भारती के दो सुझाव तोगड़िया ने खारिज कर दिए। कहा कि कोर्ट के आदेश या वार्ता के द्वारा मंदिर निर्माण की बात मामले को लटकाने के अलावा कुछ नहीं है।
    तोगड़िया ने मंदिर निर्माण हेतु विधेयक का प्रस्ताव भी जारी किया। उमा भारती और तोगड़िया को राज्यसभा के चार वर्ष से जारी क्रिया कलाप पर गौर करना चाहिए। उमा भारती को तो प्रत्यक्ष अनुभव रहा है। यह सरकार राज्यसभा से सामान्य विधेयक पारित कराने की स्थिति में नहीं था। अब जाकर वह सबसे बड़ी पार्टी बनी है, लेकिन तोगड़िया के प्रस्तावित विधयेक को पारित कराने की स्थिति में सरकार आज भी नहीं है। तोगड़िया तो नरेंद्र मोदी से निजी कुंठा भी रखते है। विधयेक दिखाने के साथ उन्होंने मोदी पर भी जम कर निशाना लगाया। ऐसा लगा कि वह मंदिर निर्माण के लिए नहीं मोदी के विरोध के लिए ज्यादा परेशान है।
    वर्तमान स्थिति में कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ व्यवहारिक कठिनाई को समझ रहे है। लेकिन तोगड़िया को इससे कोई मतलब नहीं। उनके अनुसार संसद में कानून के आलावा कोई दूसरा रास्ता मन्दिर निर्माण के लिए कारगर नहीं है। जिस प्रकार सरदार पटेल के नेतृत्व में सोमनाथ मन्दिर के निर्माण का मार्ग इसी संसद के जरिये निकाला गया था, ठीक उसी तरह राम मन्दिर निर्माण के लिए भी अब रास्ता निकालना चाहिये। राम मन्दिर के मुद्दे पर धर्म संसद का आयोजन किया जा चुका है और सन्तों का मन्दिर के बारे में किया गया वह निर्णय  अंतिम है। भाजपा नेतृत्व छद्म हिंदू है। वो अब मलमास की नहीं रमजान की चिंता करने लगा है। केंद्र में सरकार बने चार साल हो गए हैं लेकिन अभी तक राम मंदिर निर्माण को लेकर कोई कानून नहीं बना है। भाजपा ने जनता के साथ विश्वासघात किया है। उन्होंने सरकार के समक्ष मांग रखते हुए कहा कि संसद में कानून बनाकर काशी विश्वनाथ मंदिर, मथुरा में श्री कृष्ण जन्मभूमि और अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि हिंदुओं को सौंपी जाए।
    चौदह अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष पद का चुनाव हारने के बाद प्रवीण तोगड़िया ने विश्व हिंदू परिषद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद नाम से संघठन बनाया है। वह कहते है कि उन्नीस सौ चौरासी में सोमनाथ की तर्ज पर अयोध्या पर मंदिर निर्माण का निर्णय लिया गया था। यदि न्यायिक आदेश से ही मंदिर बनाना था तो जनता को वचन नहीं देना चाहिए था। कारसेवक बनाकर मुलायम की गोलियां नहीं खिलवानी चाहिए थीं। तोगड़िया ऐसे आरोप लगा रहे है, जैसे उस घटना के लिए नरेंद्र मोदी दोषी थे।
    नरेंद्र मोदी के प्रति निजी कुंठा ने प्रवीण तोगड़िया को विचलित किया है। अब तो यह लग रहा है कि उनकी प्राथमिकता में मंदिर निर्माण की जगह नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद से हटाना है। शायद उन्हें उम्मीद है कि मोदी के विरोध में बना सेकुलर मोर्चा सत्ता में आया तो मंदिर निर्माण हो  जाएगा। तब रमजान नहीं मलमास की बात होगी, काशी, मथुरा भी मुक्त हो जायेगे। गुजरात विधानसभा चुनाव में भी उनपर भाजपा को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगे थे। वह जानते थे कि ऐसा होने पर मंदिर निर्माण के घोर विरोधियों का ही मनोबल बढ़ेगा। लेकिन तोगड़िया को इसमें सफलता नहीं मिली। अब वह लोकसभा चुनाव में भाजपा की परेशानी बढ़ाने वाली नीति पर चल रहे है। इससे उनकी अपनी विश्वसनीयता ही कम हो रही है।

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