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    Home»ब्लॉग

    तृणमूल को भाजपा की सीधी चुनौती

    By July 17, 2018 ब्लॉग No Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    पश्चिम बंगाल के पंचायती राज चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई थी। कांग्रेस और वामपंथी मुख्य मुकाबले से बाहर हो गए थे। इस तरह भाजपा जमीनी स्तर पर यहां की मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिदनापुर रैली भी भाजपा के प्रति आमजन के उत्साह को प्रमाणित कर गई।
    ममता बनर्जी को तुष्टिकरण की सियासत का अभी तक लाभ मिला है। इसके बल पर उन्होंने कांग्रेस और वामपंथियों को हाशिये पर पहुंचा दिया था। क्योंकि इन पार्टियों की भी यही रणनीति थी। ममता बनर्जी इस दौड़ में उन पार्टियों को पछाड़ कर बहुत आगे निकल गई थी। अब स्थिति यह है कि जिन पार्टियों को पश्चिम बंगाल में विपक्ष की भूमिका निभानी थी, वह सत्ता पक्ष की बी पार्टी बन कर रह गई है।
    ममता बनर्जी के शासन में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां एक बार भी उनका कारगर विरोध नहीं कर सकी। ये भी वोटबैंक की सियासत में उलझे रहे। इस तरह तृणमूल कांग्रेस , कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां एक ही धरातल पर आ गई है। विपक्ष की भूमिका में केवल भाजपा है। ऐसे में उसे इसका लाभ मिलना तय है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में बहुत मेहनत की ही। जिसके चलते पूरे प्रदेश में भाजपा का मजबूत संघठन स्थापित हो चुका है।
    भाजपा के मुख्य विपक्षी पार्टी की भूमिका में आने का प्रमाण पश्चिम बंगाल के पंचायती राज चुनाव में भी मिला था। इसमें भाजपा कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों को पीछे छोड़ कर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई थी। यहां के चुनावी समीकरण में बड़ा बदलाव दिखाई देने लगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिदनापुर रैली से भी यही उजागर हुआ। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कैडर द्वारा राजनीतिक विद्वेष का वातावरण बना दिया गया है। इसके बाबजूद इस रैली में न केवलभारी भीड़ उमड़ी बल्कि लोगों का उत्साह देखने लायक था। यह मोदी की पिछले आम चुनाव के जैसा नजारा था। नरेंद्र मोदी ने यहां की सरकार के तुष्टिकरण, पूजा पर रोक, के अलावा कुशासन के मुद्दे भी उठाए।
    किसानों की भलाई के लिए अपनी सरकार के कार्यों और ममता सरकार की विफलता को गिनाया। यह प्रदेश निवेश और उद्योग की दृष्टि से भी बीमारू रह गया है। इस आधार पर मोदी ने यहां सत्ता परिवर्तन का आह्वान किया। इन बातों का आमजन ने उत्साह के साथ समर्थन किया। यहां पिछले आम चुनाव के समय भाजपा के पक्ष में ऐसा जनसमर्थन दिखाई नहीं दिया था। यह परिवर्तन अब दिखाई दे रहा है। मिदनापुर में धान की सबसे ज्यादा खेती होती है। यह सन्योग है कि कुछ दिन पहले ही केंद्र ने धान अलावा चौदह फसलों के समर्थन मूल्य में डेढ़ गुना वृद्धि की है।
    केंद्र सरकार उच्च श्रेणी के बीज, बाजार,और भंडारण की सुविधा बढ़ाने की दिशा में कार्य कर रही है। नरेंद्र मोदी यह दावा करने की स्थिति में है कि पिछली सरकारों ने लंबे समय तक  न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात की लेकिन कुछ नहीं हुआ। भाजपा की सरकार ने किसानों की बात सुनी और न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का निर्णय लिया। मोदी का यह आरोप गलत नहीं है कि पश्चिम बंगाल में सिंडिकेट की मर्जी के बिना कुछ नहीं होता। इस कार्यसंस्कृति का विकास वामपंथियों ने अपने तीस वर्षीय शासन के दौरान किया था।
    ममता बनर्जी ने उसी तर्ज पर अपनी पार्टी के कैडर से सिंडिकेट बनाया है। यही कारण है कि दशकों के वामपंथी शासन में पश्चिम बंगाल की जो दशा है, अब  हालात उससे भी बदतर होते जा रहे है।  केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए बांस को पेड़ की जगह घास माना। जिससे किसान खेत में उसे उगा सकता है।  उसे काट कर बेच सकता है।  बाइस हजार ग्रामीण हाटों को जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ अपग्रेड करने का कार्य भी किया जा रहा है। नरेंद्र मोदी ने ममता सरकार के तुष्टिकरण पर भी हमला किया। उनके शासन में राम जुलूस , दुर्गा प्रतिमा विसर्जन करना भी मुश्किल हो गया है।
    ममता मुख्यमंत्री बनने के बाद से विभाजनकारी राजनीति करती रही हैं। वह वोट बैंक की राजनीति और तुष्टिकरण करती रही हैं। ऐसे निर्णयों से पश्चिम बंगाल के हिंदुओं में ममता के प्रति अविश्वास बढा है। कम्युनिस्ट शासन  में भी हिन्दुओं की उपेक्षा होती  थी।  तृणमूल सरकार पर  तो  मुस्लिम आक्रांताओं जैसा व्यवहार करने का आरोप लग रहा है। दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन पर रोक के फैसले के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी सरकार को अदालत की फटकार सुननी पड़ी थी। लेकिन ममता ने इस साल भी मुहर्रम के चलते विसर्जन पर पाबंदी लगी दी थी।
    कलकत्ता हाईकोर्ट की इसपर टिप्पणी बहुत गंभीर थी। उसने पाबंदी तो खारिज कर ही दी थी, सरकार को भी फटकार लगाई थी। हाईकोर्ट ने सरकार के फैसले को एकतरफा और अल्पसंख्यक तबके के तुष्टिकरण का प्रयास बताते हुए सरकार को फटकार लगायी थी। यह टिप्पणी किसी राजनीतिक पार्टी नहीं बल्कि हाईकोर्ट की थी। ममता बनर्जी को इससे सबक लेना चाहिए था। लेकिन वह अहंकार में डूबी थी। इसलिए हाईकोर्ट पर भी हमला बोला। कहा कि कोर्ट उन्हें दिशा निर्देश न दे। यह न बताए कि मुख्यमंत्री को क्या करना है या नही।
    यह प्रकरण दर्शाता है कि ममता बनर्जी तुस्टीकरण के लिए कोई भी हद पार करने को तैयार है। अराजक तत्व की हरकतों पर राज्य की पुलिस मूक दर्शक बनी रहती है। विरोध करने वालों पर हमले होते है। ऐसे माहौल में भाजपा समर्थकों का आवाज बुलंद करना बहुत मायने रखता है। ममता बनर्जी भी भाजपा की तरफ से मिल रही चुनौती को समझ रही है। इसीलिए उन्होंने कांग्रेस और वामपंथियों की तरफ से ध्यान हटा लिया है। इनको राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा वीरोधी गठजोड़ बनाने में लगा दिया है। ममता जानती है कि उन्होंने तुष्टिकरण से बहुसंख्यकों को नाराज कर लिया है। इसका लाभ भाजपा को मिल रहा है। त्रिपुरा की भांति पश्चिम बंगाल के चुनाव भी चौकाने वाले हो सकते है।

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