संस्कृति कुंभ से समरसता सन्देश

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दावा है कि इस बार का प्रयाग कुंभ विशेष होगा। इस दावे की सच्चाई भविष्य में पता चलेगी।  लेकिन इसमें सन्देश नहीं कि अभी तक कि तैयारी में कुछ खास पहलू शामिल है। पहली बार संस्कृति कुंभ के आयोजन हो रहे है। इसे अन्य देशों या प्रदेशों के लोगों को प्रयाग कुंभ के आमंत्रण तक सीमित नहीं समझना चाहिए। इसका स्वरूप व्यापक है। विपक्ष की नजर वहां तक पहुंची ही नहीं। उन्होंने सतही तौर पर इसकी भी आलोचना शुरू कर दी। इनका कहना है कि कुंभ में लोग अपने आप ही आते है, लेकिन योगी निमंत्रण दे रहे है। वस्तुतः निमंत्रण के सन्देश पर ध्यान न देने वाले ही ऐसी टिप्पणी कर सकते है। योगी आदित्यनाथ इसके माध्यम से राष्ट्र भाव को जागृत कर रहे है।  कुंभ संस्कृति के माध्यम से व्यापक सन्देश देने का प्रयास कर रहे है। इस आमंत्रण में भारतीय संस्कृति, दर्शन, समरसता, ज्योतिष, राष्ट्रीय एकता अखंडता का विचार समाहित है। मुंबई में आयोजित हुए संस्कृति कुंभ में यह तथ्य उभर कर सामने आया।
 इस्कॉन सभागार में आयोजित समारोह में योगी आदित्यनाथ ने अपने अध्ययन के आधार पर कहा कि कुंभ स्नान  वैज्ञानिक मान्यता है।  यह मात्र  धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही आस्था का प्रतीक है, जिसे यूनेस्को ने भी अप्रतिम सांस्कृतिक धरोहर के रूप में स्वीकार किया है।
दूसरी विशेषता यह होगी कि इस बार चलनआश्रम और चित्रकूट आश्रम के भी दर्शन होंगे। हजारों वर्षों की परंपरा का यह कुंभ साक्षी होगा।  कुंभ मेला केवल धार्मिक जमावड़ा नहीं है। इसका सामाजिक, वैज्ञानिक, ज्योतिषीय और संस्कृतिक आधार है। हमारी पौराणिक मान्यताओं की प्रासंगिकता का परिचय कुंभ में होता है। इस बार हमने कुंभ का दायरा बढ़ाया है। अब तक के पांच हजार एकड़ से बढ़ाकर इसे दुगना अर्थात दस हजार एकड़ में विस्तार दिया गया है। भारत में स्थित विदेशी दूतावासों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाएगा। उनके माध्यम से दुनिया भर मे रहने वाले भारतीयों को भी आमंत्रित किया जाएगा।
भैयाजी जोशी के मार्गदर्शन में काशी, वृंदावन, अयोध्या, लखनऊ, आगरा में पांच वैचारिक कुंभ होंगे। इस बार प्रयाग कुंभ के अलावा काशी दर्शन, विंध्याचल माता मंदिर व आसपास के धार्मिक क्षेत्रों का भी दर्शन कराया जाएगा। देवेंद्र फड़णवीस ने ठीक कहा कि  भारत ने अपनी संस्कृति से दुनिया को जीतने का प्रयास किया है। हमारे संस्कार और संस्कृति ने हमें सहिष्णुता है।
 हरिद्वार और प्रयाग में हर छठे साल में अर्ध कुंभ का भी आयोजन होता है। नासिक और उज्जैन में अर्ध कुंभ का आयोजन नहीं होता। कुंभ मेला कब कहां मनाया जाए यह बृहस्पति ग्रह और सूर्य की स्थित पर निर्भर करता है। जब सूरज मेष राशि और बृहस्पति कुंभ राशि में आते हैं तो कुंभ मेला हरिद्वार में आयोजित किया जाता है। जब बृहस्पति वृषभ राशि में और सूर्य मकर राशि में हो तो प्रयाग में कुंभ मेला काआयोजन होता है।  उज्जैन में कुंभ मेला का आयोजन तब होता है जब सूर्य और बृहस्पति दोनो वृश्चिक राशि में होते हैं. और नाशिक में कुंभ का आयोजन बृहस्पति और सूर्य के सिंह राशि में स्थित होने पर किया जाता है।
योगी आदित्यनाथ ने कहा की वह इस बार के कुंभ में भक्तों को मां सरस्वती के भई दर्शन कराएंगे। इसके लिए उन्होने केंद्र सरकार के साथ बातचीत चल रही है। इसके साथ ही कुंभ में आनेवाले भक्तों को इलाहाबाद में स्थित भारद्वाज आश्रम का भी दर्शन करने का मौका मिलेगा। कहा जाता है भगवान राम चित्रकूट में बनवास जाने से पहले यहां आए थे। वर्तमान में यहां भारद्वाजेश्वर महादेव, संत भारद्वाज और देवी काली का मंदिर है। कुंभ की पौराणिक कथा आस्था से जुड़ी है। समुद्र मंथन के समय जब देवता और राक्षस मंथन से निकले अमृत कलश की खातिर एक दूसरे से लड़ रहे थे तब भगवान विष्णु अमृत का पात्र लेकर उड़ गए।  रास्ते में कलश से अमृत की बूंदे हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयाग में गिरीं। इन्हीं स्थानों पर कुंभ मेला मेला होता है। प्रत्येक तीसरे वर्ष इनमें से किसी एक स्थान पर कुंभ मेला आयोजित होता है।
यह अच्छा है कि योगी आदित्यनाथ प्रयाग कुंभ की व्यापक अवधारणा को साथ लेकर चल रहे है। आज जातीय भेद की बात उठ रही है। लेकिन प्राचीन काल से चले आ रहे कुंभ जैसे आयोजन समरसता का सन्देश देते आ रहे है। सभी वर्ग के लोग एक जगह एकत्र होते है। एक ही जगह स्नान, पूजा अनुष्ठान, भोजन, विश्राम आदि होता था। कोई भेदभाव नहीं। प्रदेश सरकार इसका भी सन्देश दे रही है। प्रयाग कुंभ उत्सव को पहले के मुकाबले व्यापक बनाया गया है। चित्रकूट से लेकर विंध्याचल क्षेत्र तक को इस तीर्थ यात्रा में शामिल किया जा रहा है। इन आधारों पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रयाग कुंभ की भव्यता का विस्तार होगा।

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