राष्ट्रीय हित के अनुरूप समर्थन

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत ने इस्राइली प्रस्ताव का समर्थन किया। यह प्रस्ताव बहुमत से पारित हुआ। किंतु इसे सतही रूप  में देखना उचित नहीं होगा। ऐसा करने से परम्परागत भारतीय विदेश नीति में परिवर्तन के कयास लगेंगे। यह सही नहीं है। भारत की फलस्तीन नीति में नरेंद्र मोदी सरकार ने कोई बदलाव नहीं किया है। फलीस्तीन के साथ हमारे पहले की तरह मजबूत संबन्ध है। नरेंद्र मोदी ने अरब देशों से भी बेहतर संबन्ध बनाये है। कई अरब देशों ने नरेंद्र मोदी को अपने सर्वोच्च सम्मान से भी नवाजा है। पुलमावा आतंकी हमले के बाद इस्लामिक देशों के सम्मेलन ने भारत को विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था। इसमें तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने आतंकवाद पर भारत का पक्ष पेश किया था। जबकि पाकिस्तान संस्थापक सदस्य होने के बाद भी इस सम्मेलन से नदारत रहा था।
जाहिर है कि भारत आतंकवाद विरोधी अपनी नीति पर कायम है। नरेंद्र मोदी प्रत्येक वैश्विक मंच से यह मुद्दा उठाते रहे है। इस विषय पर उन्होंने विश्व सम्मेलन आयोजित करने का प्रस्ताव भी किया है, जिसका फ्रांस ने तत्काल समर्थन भी किया है। इसके पहले अजहर मसूद मसले पर संयुक्त राष्ट्र संघ से अभूतपूर्व समर्थन के साथ प्रस्ताव पारित हो चुका है। इसे भारत की कूटनीतिक सफलता माना गया। संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने प्रस्ताव रखा था।अंततः चीन ने भी इसका समर्थन किया था।
 इसी परिप्रेक्ष्य में इस्राइली प्रस्ताव को देखना होगा। आतंकवाद के विरोध में भारत अपनी नीति पर कायम रहा। इस कारण उसने इस्राइली प्रस्ताव का समर्थन किया। वस्तुतः इस्राइल का प्रस्ताव फलस्तीनी संगठन शहीद के विरोध में था। शहीद ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने को पर्यवेक्षक के रूप में शामिल करने की पेशकश की थी। यह संगठन फलीस्तीन की अधिकृत सरकार को भी मान्यता नहीं देता। उसके खिलाफ हिंसक गतिविधियां चलाता है। भारत के लिए उसका समर्थन करना संभव ही नहीं था। इससे आतंकवाद विरोधी भारतीय नीति और अभियान पर विपरीत असर पड़ता  यह भारत ही नही विश्व के लिए भी उचित नहीं होता।
यह सही है कि नरेंद्र मोदी ने अरब देशों और इस्राइल संबन्धी नीति को अलग किया है। दोनों के साथ भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप नीति का निर्माण किया गया। इसमें सफलता भी मिली है। अरब देश भी भारत पर विश्वास करते है।
इस्राइल ने तो भारत को आतंकवाद के खिलाफ खुला समर्थन दिया है। ऐसे में इस्राइल को आतंक विरोधी मुद्दे पर समर्थन देना भारत का नैतिक कर्तव्य भी था। यही कारण था कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक परिषद  में इजराइल के प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया है। इससे पहले तक भारत वैश्विक मंच पर इस्राइल से  दूरी बनाये रखता था। वस्तुतः  इजराइल ने फिलीस्तीन के संगठन शहीद को सलाहकार का दर्जा दिए जाने को आपत्ति की थी। उसका आरोप था कि इस संगठन ने हमास से संबन्ध है।
इसलिए इसको पर्यवेक्षक का दर्जा देने से विश्व मे गलत सन्देश जाएगा। इस प्रस्ताव के पक्ष में अठ्ठाइस और विरोध में चौदह  देशों ने मतदान किया।
पांच देशों ने इस प्रक्रिया में भाग नहीं लिया। बहुमत से यह  प्रस्ताव खारिज हो गया।  प्रस्ताव के पक्ष में ब्राजील, कनाडा, कोलंबिया, फ्रांस, जर्मनी, भारत, आयरलैंड, जापान, कोरिया, यूक्रेन, ब्रिटेन और अमरीका आए विरोध में  पाकिस्तान, चीन भी शामिल थे। इनमें एक आतंकी और दूसरा उसका बचाव करने वाला देश है। इनके साथ जाने से भारत की ही छवि खराब होती। इस कारण आतंकवाद का खुल कर विरोध करने वाले देशों के साथ मतदान का फैसला सर्वथा उचित था। इस मसले पर तटस्थ रहना भी गलत था। बहुमत से प्रस्ताव मंजूर होने के बाद  परिषद ने संगठन के आवेदन को लौटाने का फैसला किया। वैसे भी शहीद संगठन ने फोरम को अपना विवरण उपलब्ध नहीं कराया था। आतंकवाद विरोधी देशों ने भारत के कदम का स्वागत किया है। इजराइल ने खासतौर पर भारत का आभार व्यक्त किया।
यह सन्योग था कि लगभग इसी समय भारत को आतंकवाद के विरोध में  फ्रांस का खुला समर्थन मिला।  आतंकवाद से निपटने के लिए एक वैश्विक सम्मेलन रखने के  नरेंद्र मोदी के प्रस्ताव का फ्रांस ने पूजोर समर्थन  किया है। भारत दौरे पर आए फ्रांस के यूरोप एवं विदेश मामलों के मंत्री जीन बापटिस्ट लेमोयन ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ जंग फ्रांस की शीर्ष प्राथमिकताओं में शामिल है। नरेंद्र मोदी ने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने जलवायु परिवर्तन के खतरे पर कई वैश्विक समझौते और कई सम्मेलन किए हैं तो आतंकवाद के मुद्दे पर भी सम्मलेन क्यों नहीं हो सकता। लेमोयन ने कहा कि आतंकवाद से लड़ने की इस  पहल का स्वागत है। आतंकवाद  विश्व के प्रत्येक देश के लिए खतरा बन चुका है। इन दोनों प्रसंगों से जाहिर है कि नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय व मानवीय हित संबन्धी अपनी नीति पर आगे बढ़ रहे है।
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