पंकज चतुर्वेदी
दिल्ली में तो चुनी हुई सरकार ही सुप्रीम है, सुप्रीम कोर्ट ने इतना स्पष्ट फैसला दिया है कि अब किसी विवाद या तनाव कि गुन्जायिश बचना नहीं चाहिए, दिल्ली जैसे अर्ध राज्य के लिए यह दिशा निर्देश दूरगामी हैं कोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा कि उपराज्यपाल राज्य सरकार को सिर्फ सलाह दे सकते हैं न कि फैसले रोक सकते हैं। तीन जजों की पीठ ने मिलकर कहा कि कैबिनेट के साथ मिलकर उपराज्यपाल काम करें।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार ही दिल्ली चलाएगी। फैसलों पर उपराज्यपाल की सहमति जरूरी नहीं है। चुनी सरकार के पास ही असली ताकत है। उपराज्यपाल फैसले अटकाकर नहीं रख सकते हैं।
दरअसल, दिल्ली सरकार ने हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमे कहा गया था कि उपराज्यपाल के पास फैसले लेने की समस्त शक्तियां है। याचिका में दिल्ली की चुनी हुई सरकार और उपराज्यपाल के अधिकार स्पष्ट करने का आग्रह किया गया है।
पराज्यपाल मंत्रीपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य हैं। अदालत ने कहा कि उपराज्यपाल किसी खास मामले में विचार के मतभेदों की स्थिति में राष्ट्रपति को फाइल भेजने के लिए भी बाध्य हैं। इसके अलावा उपराज्यपाल एक ‘अवरोधक’ के रूप में कार्य नहीं कर सकते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार को सामंजस्यपूर्ण तरीके से काम करना होगा। उपराज्यपाल को यह महसूस करना चाहिए कि मंत्रिपरिषद लोगों के प्रति जवाबदेह हैं और वह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीटी) की सरकार के हर निर्णय को रोक नहीं सकते हैं।
पांच जजों की संविधान पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के साथ जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल थे.गौरतलब है कि इससे पहले ये मामला दिल्ली हाई कोर्ट में था, जहां एलजी को बॉस करार दिया गया था. दरअसल, दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के अधिकारों को लेकर मचे घमासान पर दिल्ली हाईकोर्ट ने 4 अगस्त, 2016 को कहा था कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के प्रशासनिक प्रमुख हैं और दिल्ली सरकार एलजी की मर्जी के बिना कानून नहीं बना सकती. आज सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि पुलिस, जमीन और पब्लिक ऑर्डर के अलावा दिल्ली विधानसभा कोई भी कानून बना सकती है। उल्लेखनीय है कि इस मामले में केजरीवाल की तरफ से गोपाल सुब्रहमन्यम और पी, चिदम्बरम ने पैरवी की थी।







