हम जीवन भर भटकते रहेंगे…!

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एक बार की बात है कुछ नौजवान एक साथ कहीं जा रहे थे। गर्मी के दिन थे। बड़ी तेज धूप हो रही थी। सब के शरीर से पसीना बह रहा था लेकिन उन्हें गंतव्य स्थान पर पहुंचने की जल्दी थी, इसलिए देर रुक नहीं सकते थे। चलते-चलते उनमें से एक को बड़े जोर की प्यास लगी।

उसने साथियों से कहा कहीं थोड़ा पानी मिल जाता हमारा गला सूख रहा है जान निकली जा रही है। सबने इधर देखो उधर देखा, किंतु दूर-दूर तक पानी के आसार नहीं नजर आएं। थोड़ा और आगे बढ़े तो उस युवक ने कहा अब मुझसे चला नहीं जाता! प्राण गले से निकल रहे हैं!

सबने मिलकर चारों ओर निगाह दौड़ाई अचानक उन्हें कुछ दूरी पर हरियाली दिखाई दी। एक ने कहा हो ना हो वहां पानी अवश्य होगा। बिना पानी के इतनी हरियाली हो ही नहीं सकती। आशा से उनके पैरों में जान आ गयी। वहां कुआँ देखकर उनकी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा। जब उन्होंने देखा कि पेड़ों के पीछे झुरमुट के बीच एक रस्सी पड़ी है। प्यासे युवक के खोये प्राण लौट आएं। सबने चैन की साँस ली।

संयोग से कुएं में से पानी निकलने के लिए उन्हें रस्सी के साथ एक डोल भी मिल गयी। बड़ी तत्परता के साथ उन्होंने एक रस्सी में डोल को बंधा और उसे कुएं में फंसा दिया। पानी बड़ा गहरा था पर रस्सी भी बड़ी लम्बी थी। डोल पानी तक पहुंच गया। उन्होंने उसमे पानी भरा और ऊपर खीचने लगें। प्यासा युवक बड़ी उत्सुकता के साथ ऊपर आने की प्रतीक्षा करने लगा।

कुछ ही देर में डोल ऊपर आ गया लेकिन यह क्या? उसमे पानी की एक बूंद नहीं थी। आश्चर्य से उन्होंने डोल को देखा! उसकी पैंदी में चार छेद थे। बेचारा युवक प्यासे का प्यासा ही रहा।

यह कहानी प्रतीकात्मक है हम सबकी हालत उस नव युवक की जैसी है हम सब प्यासे हैं। हमारे पास घट है किंतु वह रिस्ता है। पानी टिकता भी कैसे? उसमें चार छेद हैं काम, क्रोध, लोभ और मोह के जब तक यह छेद रहेंगे। हम जीवन में भटकते रहेंगे!

1 COMMENT

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    They will shun jobs high is no benefit to town involved. The Open Video Project:
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