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    Home»उत्तर प्रदेश

    मिशन पत्रकारिता की चट्टान टूटी, बनी मौरंग की दलाली

    By January 14, 2019 उत्तर प्रदेश No Comments6 Mins Read
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    नवेद शिकोह 
    उत्तर प्रदेश की पिछली सरकार के खनन मामले में सीबीआई के रडार पर एक संपादक भी हैं। क्योंकि मामला हिन्दुस्तान के बड़े सम्पादक और बड़े अखबार का है इसलिए हो सकता है हाईकमान के इशारे पर ये नाम रफा-दफा कर दिया जाये। ये भी हो सकता है कि संपादक जी को जेल की हवा खानी पड़े और फिर वक्त की हवा के थपेड़े सब कुछ भुला दें। फिर ये संपादक अपनी आलीशान कुर्सी पर बैठकर अपने सम्पादकीय के जरिए करोड़ों पाठकों को नैतिकता का पाठ पढ़ाये। वैसे ही जैसे एक तिहाड़ी (तिहाड़ जेल काटने वाला) जेल काटने के बाद तमाम आरोपों से बरी हो गया और अब टीवी न्यूज चैनल पर देशभक्ति के पाठ पढ़ाता है। टीवी न्यूज चैनल का ये संपादक /एंकर ब्लैकमेलिंग के मामले में अंदर हुआ था, आज टीवी पत्रकारिता का बहुत बड़ा चेहरा है।
    खैर, अखबार वाले ये संपादक जी क्योंकि बहुत बड़े संपादक है। देश की राजधानी दिल्ली में रहते हैं और कुछ बड़े आपरेशन के लिए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आया जाया करते हैं। इनका कलम धारदार है। दर्जनों संस्करणों वाले देश के प्रतिष्ठित अखबार के ये प्रधान संपादक हैं इसलिए हुकूमतों पर इनकी विशेष पकड़ है। किसी भी सरकार के साथ सामंजस्य बनाने में भी माहिर हैं। इसलिए उम्मीद है कि इनपर से सीबीआई के संकट के बादल छंट जायेंगे और ये लम्बे समय तक सैकड़ों पत्रकारों के माई-बाप बने रहेंगे। इसलिए ही तमाम खोजी पत्रकार खनन मामले की सीबीआई जांच की रिपोर्टिंग में बड़े संपादक का नाम आने का जिक्र भी नहीं कर रहे हैं।
    सब जानते हैं कि पत्रकारिता के शिखर पर बैठे तमाम पत्रकारों की अनैतिक तस्वीरें अदृश्य होती हैं। सिद्धांतवादी लेख लिखने वालों के गले में पड़े हुकूमतों के पट्टे आम पाठक देख नहीं पाते। ये पट्टे संपादकों को इतना इख्तियार भी दे देते हैं कि ये करोड़ों-अरबों के ठेके-पट्टे तय करके सरकारों के साथ मिलकर हजारों करोड़ के घोटालों के सहभागिता निभाएं। इन बड़े कलमकारों के कलम की धार खबरें ही नहीं खोदती, अवैध खनन की बालू-मौरंग भी खोदती है। जिसके कलम के सम्पादकीय लेख नैतिकता के पाठ पढ़ाते हैं उन कलमकारों के अनैतिक कारनामें अखबारों की सुर्खियों में नहीं आ पाते। क्योंकि सत्ता, संपादक और पत्रकारों का चोली दामन का साथ होता है। अपवाद स्वरूप ही किसी बड़े मीडिया समूह के संपादक/पत्रकार किसी बड़ी जांच एजेंसी की रडार पर आते हैं।
    सत्ता परिवर्तन के बाद कोई सरकार जब अपनी प्रतिद्वंद्वी पार्टी की पूर्व सरकार के घोटालों की पातें खुलवाती हैं तो गेहूं के साथ घुन भी पिस जाते हैं। उत्तर प्रदेश की पिछली अखिलेश सरकार में खनन घोटाले पर सीबीआई जांच शुरू हो चुकी हैं। एक हमीरपुर की डीएम बी चंद्रकला के यहां छापेमारी के बाद सीबीआई की कार्रवाई पर सियासत शुरू हुई और बात दूर तक गयी। बात निकली तो ये भी खबर निकलकर आयी कि यूपी में खनन पट्टे बांटने की अनियमितताओं में एक बड़े हिन्दी अखबार के संपादक की भी सहभागिता थी।
    बताते चलें कि कलयुग की इस पत्रकारिता में बड़े पत्रकार या संपादक बनने के लिए अच्छा लिखना या बड़ी खबरें निकालना ही जरूरी नहीं, बड़ी दलाली करने की दक्षता भी पत्रकारिता के शिखर की सीढ़ी बनती है। ट्रांसफर पोस्टिंग की दलाली में प्रमोशन के बाद जब पत्रकार काफी तरक्की कर लेते हैं तो अपने कलम के सौदे के दौरान सरकार की गोद में बैठकर करोड़ों – अरबों रूपये के ठेके देने की फेहरिस्त बनाने में भी इनका कलम चलता है।
    खनन मामले में सीबीआई की चपेट में आये एक ब्रांड अखबार के मशहूर संपादक का नाम आने की चर्चायें अखबारों की सुर्खियों में तो नहीं पर पत्रकारों की गपशप में शामिल हो गयीं है। बड़े अखबारों के पत्रकार ऐसी गपशप से भी दूरी बनायें हैं। कारण ये है कि सीबीआई की रडार पर आये ये पत्रकार महोदय मौजूदा दौर के नामी गिरामी संपादक हैं।  उत्तर भारत में फैले दर्जनों संस्करणों वाले एक बड़े हिन्दी अखबार के चीफ एडीटर हैं। सैकड़ों पत्रकार और दर्जनों संपादक इनके अंडर में काम करते हैं।
     छोटे अखबारों के मीडिया कर्मी/पत्रकार/संपादक या पब्लिशर इस चर्चा की खूब जुगाली कर रहे हैं। इनके पास फुर्सत भी खूब होती है। इनके अखबार नहीं दिखते लेकिन ये फट्टरनुमा पत्रकार हर जगह थोक में दिखते हैं।
    एक ऐसे ही पत्रकार हैं जिनकी लिखी खबर तो कभी नहीं दिखती लेकिन बीस-पच्चीस वर्षों से मीडिया सेंटर में बैठते-बैठते यहां के सोफों पर इनके हिप प्रिंट दिखने लगे हैं।
    बोले-  बड़ों के सफेद कालर के पीछे कितना मैल छिपा है ये किसी को नहीं नजर आता, पर  हम चिरकुट पत्रकारों की डग्गामारी सब को दिखती है।
    डकैतों से कहीं बेहतर होते है जेबकतरे। छोटे-छोटे अखबारों के पत्रकार अक्सर प्रेस कांफ्रेंस में बंटने वाले गिफ्ट (डग्गे) पर लपकते हैं। खाने पर टूटते हैं। फर्जी सर्कुलेशन दिखाकर सरकारी विज्ञापनों से घर चलाते हैं। बड़े लोगों से भले ही रिश्ता ना हो पर उनके साथ फोटो खिचवाकर छिछोरापन करते हैं। ऐसे छोटे-मोटे छिछोरेपन में लिप्त डग्गामार पत्रकार नामी-गिरामी बड़े पत्रकारों से बेहतर हैं। हम पत्रकारिता के सम्मान की जेब काटते हैं तो बड़े-बड़े अखबारों के नामचीन, वाइट कालर पत्रकार /संपादक पत्रकारिता की इज्जत लूट कर उसकी हत्या किये दे रहे है। दिग्गज पत्रकारों के लेख पढ़िये तो उसमें से सिद्धांत टपक रहे होंगे, सुसंस्कारों की महक आ रही होगी और विचारधारा की अलख से रामराज्य लाने की क्रांति पैदा होती दिखाई दे रही होगी। ये क्रांतिवीर सोशल मीडिया पर लिख दें तो वाहवाही करने वाले चाटुकारों की कतार लग जायेगी। ये तो चर्चाओं की बात रही पर एक बड़े अखबार के मशहूर प्रधान संपादक का यूपी के खनन घोटाले में नाम आने की गंभीर कहानी कुछ इस तरह बयां की जा रही है-
     हिन्दुस्तान की पत्रकारिता के शिखर पर पंहुचने वाले इस चीफ एडीटर की अधीनस्थ एक स्थानीय संपादक से तत्कालीन मुख्यमंत्री से बेहद नजदीकी रिश्ते थे। स्थानीय संपादक ने अपने प्रधान संपादक और तत्कालीन मुख्यमंत्री के बीच कई बार मीटिंग तय करवायी। न्यूज कंटेंट से लेकर तमाम आर्थिक सौदेबाजी के दौरान खनन पट्टे में बिचौलियों की भूमिका में संपादक ने अपनी मुख्य भूमिका निभाई। बता दें कि प्रधान संपादक और तत्कालीन मुख्यमंत्री से मुलाकातें करवानी वाली अखिलेश सरकार की खास रहीं अंग्रेजी एडीशन की स्थानीय संपादक का नाम यशभारती पुरस्कार में सिफारिश को लेकर सुर्खियों में आ चुका है।

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