क्या ‘लखनऊ महोत्सव’ सबक लेगा ?

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श्याम कुमार

फिल्म-जगत की डांसर एवं गायिका सपना चौधरी 13 अक्तूबर, 2018 की रात न केवल लखनऊ की जनता एवं प्रशासन को, बल्कि ‘लखनऊ महोत्सव’ के आयोजक अफसरों को भी बहुत बड़ा सबक दे गईं। लखनऊ में आशियाना-स्थित स्मृति उपवन में ‘ग्लैमरस इण्डिया इंटरटेनमेंट’ द्वारा सपना चौधरी का ‘लाइव कन्सर्ट’ आयोजित किया गया था। प्रशासन का कहना है कि रात दस बजे तक कार्यक्रम की अनुमति थी, किन्तु चूंकि तब तक सपना चौधरी मंच पर नहीं आईं, इसलिए उनका कार्यक्रम रद्द कर दिया गया। किन्तु कतिपय सूत्रों का कहना है कि सपना चौधरी का आयोजकों से पैसे को लेेकर विवाद था, इसलिए कार्यक्रम नहीं हो सका।

रात दस बजे तक मंच पर अन्य कलाकारों के कार्यक्रम होते रहे, किन्तु सवा दस बजे के लगभग जब आयोजकों ने घोषणा की कि सपना चौधरी नहीं आ रही हैं तो कार्यक्रम-स्थल पर हंगामा मच गया। दर्शकों ने नाराज होकर तोड़फोड़ और पथराव शुरू कर दिया, जिससे भगदड़ मची और अनेक लोग घायल हो गए। यह दृश्य देखकर लोगों को ‘लखनऊ महोत्सव’ के पिछले अनेक आयोजन याद आ गए, जिनमें अफसरों ने फिल्मी कलाकारों आदि को बुलाकर भोंड़े कार्यक्रम रखे और उसके परिणामस्वरूप कार्यक्रम-स्थल पर प्रायः हमेशा हंगामा एवं तोड़फोड़ हुई। जब ‘लखनऊ महोत्सव’ का आयोजन लक्ष्मण मेला मैदान पर हुआ करता था, उस समय वहां एक बार ऋतिक रोशन को बुलाया गया था, जिसमें भयंकर हंगामा हुआ था तथा काफी लोग चोटिल हुए थे।

बहुत दिनों से यह सवाल उठ रहा है कि सार्वजनिक आयोजनों में ऐसे फिल्मी कलाकारों को बुलाया ही क्यों जाता है? लोगों का कहना है कि ऐेसे कार्यक्रमों में भ्रष्टाचार करने की अधिक गुंजाइश रहती है। पुराने समय में फिल्मों में शालीनता हुआ करती थी, इसलिए उस समय फिल्मी कलाकारों को बुलाने से आयोजन की रोचकता एवं गरिमा बढ़ा करती थी। फिल्म-जगत में आज नग्नता एवं अश्लीलता की जिस प्रकार पराकाष्ठा हो गई है, उसकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। अतः आज फिल्मी कलाकारों को सार्वजनिक आयोजनों में बुलाना ‘आ बैल मार’ वाली कहावत को चरितार्थ करना ही है।

फिल्मी कलाकारों को बुलाने से आयोजन को कई प्रकार से क्षति पहुंचती है। उन्हें दसियों-दसियों लाख का जो पारिश्रमिक दिया जाता है, उससे न तो आयोजन की गरिमा बढ़ती है और न जनता का स्वस्थ मनोरंजन होता है। उनके कार्यक्रम जनता की अभिरुचि को सुधारने के बजाय बिगाड़ने का काम करते हैं। कानून-व्यवस्था की जो गम्भीर समस्या उत्पन्न होती है, वह अलग। जोे भारीभरकम धनराशि फिल्मी कलाकारों के भोंड़े कार्यक्रमों पर बेरहमी से खर्च की जाती है, उतनी धनराशि में स्वस्थ मनोरंजन करने वाले कई रोचक कार्यक्रम सम्मिलित किए जा सकते हैं। लखनऊ ही नहीं, प्रदेश के अन्य विभिन्न जनपदों में जो मेले, महोत्सव एवं प्रदर्शनियां आयोजित होती हैं, वहां भी अफसरों की साठगांठ से इस तरह के महंगे व फूहड़ कार्यक्रमों के आयोजन किए जाते हैं तथा वहां उपद्रव होता है।

राजधानी लखनऊ सहित पूरे प्रदेश में अश्लीलता एवं भोंड़ेपन को विशेष बढ़ावा समाजवादी पार्टी के शासन में मिला। एक बार तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ‘लखनऊ महोत्सव’ का उद्घाटन करने के बाद जब सामने बैठ गए तो मंच पर मुम्बई से आए दर्जनभर फिल्मी कलाकार डांस करने मंच पर आ गए। उनमें युवक तो लगभग पूर्ण नंगे थे ही, युवतियां भी वैसी ही स्थिति में थीं। मैं सोच रहा था कि मुलायम सिंह यादव कार्यक्रम रुकवाकर आयोजक अफसरों को निलम्बित कर देंगे, लेकिन वह बड़ी प्रसन्न मुद्रा में कार्यक्रम देखते रहे। बाद में उन्होंने ‘सैफई महोत्सव’ को भी वैसा ही रूप दे दिया था। इसका फायदा योगेंद्र प्रताप सिंह सहित कई अफसरों ने उठाया। योगेंद्र प्रताप सिंह तो रामगोपाल यादव एवं अखिलेश यादव की आंख का ऐसा तारा बन गया था कि वह ‘सैफई महोत्सव’ का मुख्य कर्णधार बन गया था। चर्चा है कि इस समय वह अवनीश अवस्थी एवं उनके जरिए वर्तमान सरकार का भी आंख का तारा बन गया है।


‘लखनऊ महोत्सव’ जिस उद्देश्य एवं गरिमा के साथ शुरू किया गया था, धीरे-धीरे उसकी समाप्ति हो गई। भगवान राम के अनुज वीरवर लक्ष्मण लखनऊ के निर्माता थे तथा उन्हें समर्पित करते हुए ‘लखनऊ महोत्सव’ आरम्भ किया गया था। उस समय उसकी स्मारिकाओं में भी लक्ष्मणजी की चर्चा की जाती थी तथा महोत्सव-प्रांगण में लक्ष्मणजी को महत्व प्राप्त होता था। लेकिन धीरे-धीरे कांग्रेस, सपा एवं बसपा के घोर हिन्दू-विरोधी रवैये एवं मुसलिम-तुष्टिकरण की भयंकर प्रवृत्ति को देखकर अफसरों ने भी अपना रवैया उसी के अनुकूल कर ‘लखनऊ महोत्सव’ को लक्ष्मणजी के बजाय नवाबों से जोड़ दिया। फिर तो ‘महोत्सव’ को तरह-तरह से नवाबों से जोड़ने की होड़ लग गई एवं पूरा ‘लखनऊ महोत्सव’ मजाक बनकर रह गया। उसमें खामख्वाह एक ‘युवा महोत्सव’ को जोड़ दिया गया, जो ‘आदाब प्रतियोगिताएं’ कराने लगा तथा ऐसा लगने लगा कि नवाबों से पहले लखनऊ कुछ था ही नहीं।

जब लालजी टण्डन उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह मन्त्रिमण्डल में नगर विकास मन्त्री थे तो उस समय गोमती तट पर मैदान में लक्ष्मण मेला का आयोजन हुआ था, जो बहुत सफल था तथा उसकी बड़ी सराहना हुई थी। इसी से उस जगह का नाम ‘लक्ष्मण मेला स्थल’ पड़ गया। मैंने उस समय लालजी टण्डन को बहुत घेरा था कि वह या तो ‘लखनऊ महोत्सव’ को समाप्त कर उसके बजाय केवल ‘लक्ष्मण मेला’ का आयोजन कराएं अथवा ‘लखनऊ महोत्सव’ में लखनऊ-निर्माता लक्ष्मणजी को भरपूर सम्मान दिलाएं। मैंने उनसे यह भी आग्रह किया था कि लखनऊ-महोत्सववाली जगह पर लक्ष्मणजी की विराट मूर्ति स्थापित कर उसके इर्द-गिर्द अत्यन्त रमणीक वाटिका निर्मित कराएं। इससे ‘लखनऊ महोत्सव’ का जुड़ाव लक्ष्मणजी के साथ हो जाएगा।

मैंने टण्डनजी से वादा लिया कि गुजरात में नरेंद्र मोदी के प्रयास से जिस प्रकार सरदार पटेल की विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति स्थापित होने जा रही है, उसी प्रकार लखनऊ में लखनऊ के निर्माता लक्ष्मणजी की अत्यन्त विशाल मूर्ति की वह स्थापना कराएंगे तथा उस मूर्ति के इर्द-गिर्द अत्यन्त भव्य एवं विशाल वाटिका का निर्माण भी होगा। उनका वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ है। मैं लखनऊ में उसके निर्माता लक्ष्मणजी को अपेक्षित महत्व व स्थान दिलाने के अभियान में अनेक वर्षों से लगा हुआ हूं। भाजपा की कर्मठ नेता कुसुम राय के पति राजेश राय भी सामाजिक कार्यों में बहुत रुचि रखते हैं तथा उन्होंने भी मेरे इस अभियान में पूरी लगन से साथ देने का वादा किया है। देखूं, कब सफलता मिलती है!

चूंकि ‘लखनऊ महोत्सव’ का उद्घाटन मुख्यमंत्री से एवं समापन राज्यपाल से कराया जाता है, इसलिए अफसर बड़ी चालाकी से ‘लखनऊ महोत्सव’ के विकृत रूप पर शीर्ष सत्ता की मुहर लगवा लिया करते हैं तथा कोई विरोध नहीं कर पाता है। गत वर्ष जब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने तो यह जोरदार मांग उठी थी कि ‘लखनऊ महोत्सव’ को या तो समाप्त कर दिया जाय अथवा उसे लखनऊ-निर्माता लक्ष्मणजी से पूरी तरह जोड़ा जाय। उस समय बिलकुल लग रहा था कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यह मांग स्वीकार कर लेंगे, लेकिन लोगों की मांग पूरी नहीं हुई तथा ‘लखनऊ महोत्सव’ अपने पुराने रूप को ही धारण किए रहा। केवल दिखावे के लिए लक्ष्मणजी को कुछ महत्व दे दिया गया, लेकिन आवश्यकता लक्ष्मणजी को ‘लखनऊ महोत्सव’ से पूरी तरह जोड़ दिए जाने की है।

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