सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के विवादित 2.77 एकड़ भूमि विवाद को बातचीत से सुलझाने की नई पहल की है। हालांकि पिछले तीन दशक में इस संवेदनशील धार्मिक-राजनीतिक मसले को बातचीत के माध्यम से हल करने के अनेक प्रयास हुए हैं पर विफल रहे। बावजूद इसके देश की सर्वोच्च अदालत को यकीन है कि मध्यस्थता की एक फीसद भी संभावना हो तो विवाद के समापन के लिए इसे एक अवसर दिया जाना चाहिए।
अदालत के विचार से निष्पक्ष, विवेकशील और बाचतीच के माध्यम से किसी भी विवाद का शांतिपूर्ण हल निकाले जाने पर भरोसा करने वाले लोगों को असहमति नहीं हो सकती। बातचीत और मध्यस्थता को अंतरराष्ट्रीय कानून से भी मंजूरी मिली हुई है। इस मसले की सुनवाई कर रही पांच सदस्यीय पीठ में शामिल जस्टिस एसके बोबडे ने पहली बार मध्यस्थता के जरिए विवाद सुलझाने का प्रस्ताव दिया है।
दरअसल, दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 89 के तहत सुप्रीम कोर्ट को अधिकार है कि वह अयोध्या के संवेदनशील मसले का हल निकालने के लिए मध्यस्थ की नियुक्ति कर सकता है। इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ तटस्थ रुख रखने वाले लोग आास्त हैं कि मध्यस्थ दो धार्मिक विासों के बीच विवाद का शांतिपूर्ण हल निकालने में मददगार हो सकते हैं।

जस्टिस बोबडे का मानना है कि अयोध्या का मामला मात्र संपत्ति विवाद नहीं है। संपत्ति के स्वामित्व से जुड़ा निजी संपत्तिका भी मसला नहीं है। यह दो समुदायों के बीच पूजा-उपासना के अधिकार से जुड़ा मसला है। जाहिर है कि कोर्ट का मकसद सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखना भी है, इसीलिए वह मध्यस्थता से हल निकालने के पक्ष में है। लेकिन जहां कुछ मुस्लिम पक्षकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा मध्यस्थ की नियुक्ति के सुझाव से सहमत हैं, वहीं रामलला विराजमान और अखिल भारतीय हिंदू महासभा के पक्षकार असहमत।
सच है कि 2003 में कांची के शंकराचार्य और बाद में श्रीश्री रविशंकर ने दोनों पक्षों से बातचीत से मसला सुलझाने के प्रयास किए थे, जो सफल न हो सके। लेकिन गौर करने की बात है कि इन दोनों को कोर्ट ने मध्यस्थता करने को नहीं कहा था। उम्मीद की जानी चाहिए कि कोर्ट की पहल से कोईसार्थक नतीजा सामने आएगा और इस विवाद का शांतिपूर्ण हल निकलेगा।







