डॉ दिलीप अग्निहोत्री
कुछ विपक्षी दलों ने अपनी नाकामी छिपाने का नायाब तरीका निकाला है। यदि जनता की अदालत में पराजित हुए, तो ईवीएम पर हमला बोल दिया। सुप्रीम कोर्ट ने आईना दिखाया तो मुख्य न्यायधीश को हटाने पर अड़ गए। मतलब अपनी कमियों पर गौर करने को ये तैयार नहीं है। कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के एससीएसटी एक्ट संबन्धी निर्णय पर हिंसक प्रदर्शन हुआ था। जबकि मायावती सरकार के शासनादेश और सुप्रीम कोर्ट निर्णय की मूलभावना समान थी। मुख्यमंत्री के रूप में मायावती ने यह स्वीकार किया था कि दलित एक्ट के दुरुपयोग भी होता है। इसलिए उन्होंने मामूली मसलों पर तहकीकात के बाद कार्रवाई का शासनादेश जारी कराया था। वही मायावती सुप्रीम कोर्ट से नाराज है। डॉ आम्बेडकर कोर्ट के निर्णय के खिलाफ सड़क पर आंदोलन के खिलाफ थे। ऐसे आंदोलन संविधान के प्रतिकूल होते है। फिर भी मायावती और कांग्रेस ने इसका समर्थन किया था। इसका मतलब है कि ये अपनी सुविधा के अनुसार ही डॉ आम्बेडकर का नाम लेते है।विपक्ष के रुख से लगा कि ईवीएम तभी ठीक मानी जायेगी, जब वह इन्हें विजयी बनाये। लेकिन इसमें भी एक पेंच है। सभी विपक्षियों को एक साथ बहुमत नहीं मिल सकता। ऐसे में कुछ लोगों के लिए ईवीएम फिर भी खराब ही रह जायेगी।
इसी प्रकार इनके कोर्ट से भी अपने अनुकूल निर्णय चाहिए। प्रतिकूल हुआ तो ये हंगामा करेंगे। कभी सड़कों पर उतरेंगे, कभी मोमबत्ती जलाएंगे, कभी जज को हटाने का नोटिस लेकर राज्यसभा के सभापति के यहां धमक जायेगे। ये जानते है कि ऐसा प्रस्तव कहीं टिकेगा नहीं। मायावती राज्यसभा से इस्तीफा दे चुकी है। उनके एक उम्मीदवार का सपा ने सहयोग नहीं किया। वह जीत नहीं सके। लोकसभा में इस पार्टी का खाता नहीं है , फिर भी न्यायधीश को हटाने का मंसूबा है। अन्य पार्टियों की दशा भी बहुत अच्छी नहीं है।
कुछ समय पहले सोनिया गांधी ने विपक्षी एकता की रणनीति बनाने के लिए डिनर आयोजित किया था। उसमें करीब अठारह पार्टियां शामिल हुई थी। लेकिन मुख्य न्यायधीश को हटाने के नोटिस पर कांग्रेस को छह दलो का ही साथ मिला। समझदारी तो इसी में थी कि नोटिस दी ही नहीं जाती। क्योकि इसमें ईवीएम मुद्दे की भांति हो कोई दम नहीं है। जस्टिस लोया मुद्दे पर भी कांग्रेस की बदनीयत सामने आ चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने इसकी चर्चा की तो कांग्रेस बिफर गई। वैसे ईवीएम मुद्दे की हवा निकल चुकी है। इस ओर अब आमजन ने भी ध्यान देना बंद कर दिया है। लोगों ने इन नेताओं को चुनाव आयोग की चुनौती से भागते हुए देखा है। इसी प्रकार कोर्ट पर इनका हमला भी बेकार साबित होगा। इससे इनकी ही कलई उतरनी है। लेकिन कुछ दिन इनका हंगामा जरूर चलेगा।

विपक्ष ने जस्टिस लोया पर आये निर्णय के फौरन बाद मुख्य न्यायधीश पर हमला बोला है। बारह जनवरी को चार जजो की प्रेस कांफ्रेंस का उल्लेख किया गया। लेकिन इसी सुप्रीम कोर्ट के बीस जज इस प्रेस कांफ्रेंस से असहमत थे, इसकी चर्चा नहीं कि गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी जनहित याचिका न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का एक उदाहरण है।
याचिकाकर्ता न्यायाधीश की मौत को सनसनीखेज बनाना चाहते थे। इसके पीछे निहित स्वार्थ था। जज लोया की मौत प्राकृतिक थी और इसमें कोई संदेह नहीं है। एक विवाह समारोह में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हुई थी। मुख्य न्यायधीश के खिलाफ विपक्ष की मुहिम केवल राजनीतिक है। वस्तुतः विपक्ष को अपनी नाकामी पर आत्मचिन्तन करना चाहिए। जनता ने उन्हें नकारा, इसकी स्प्ष्ट वजह थी। इन्होंने उस पर विचार नहीं किया। ईवीएम के पीछे पड़ गए। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की तो उसके पीछे पड़ गए। ऐसी राजनीति इनकी विश्वसनीयता को नीचे गिरा रही है।







